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    हुसैनी आंदोलन-2

    हुसैनी आंदोलन-2
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    इमाम हुसैन के आंदोलन में शामिल न होने वालों में कुछ एसे लोग भी थे जो धर्म का पालन करते थे। एसा नहीं था कि वह सारे लोग दुनिया परस्त थे। उस समय के इस्लामी जगत में एसे महत्वपूर्ण लोग थे जो अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहते थे किंतु कर्त्वय की उन्हें पहिचान नहीं थी, परिस्थितियों की समझ नहीं थी, उसली दुशमन को पहचान नहीं पा रहे थे, वह सबसे महत्वपूर्ण तथा प्राथमिक काम को छोड़ कर दूसरे दर्जे के कार्यों और दायित्वईं लीन थे। यह इस्लामी जगत के सामने बहुत बड़ा संकट था। आज भी हम इस प्रकार के संकट में फंस सकते हैं और अधिक महत्व वाले कामों को छोड़कर महत्वहीन कार्यों में उलझ सकते हैं। मूल कार्यों पर जिन पर समाज टिका हुआ हो ध्यान देना और उन्हें चिन्हिंत करना चाहिए। कभी हमारे इसी देश में साम्राज्यवाद और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष की बातें होती थीं किंतु कुछ लोग इसे अपना दायित्व मानने को तैयार नहीं थे अतः दूसरे कार्यों में व्यस्त थे। यदि कोई व्यक्ति स्कूल चला रहा होता था या इसी प्रकार का कोई कल्याणकारी काम कर रहा होता था तो उसकी यह धारणा होती थी कि यदि उसने क्रान्तिकारी संघर्ष में हाथ बटाना शुरू कर दिया तो फिर उसका काम कौन करेगा। वह इतने महान संघर्ष को इन साधारण कार्यों के नाम पर छोड़ देता था ताकि अपने यह काम पूरे कर ले। अर्थात अनिवार्य तथा प्राथमिकता प्राप्त कार्य की पहिचान में वह ग़लती कर रहा था।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने व्याख्यानों से यह समझा दिया कि इन परिस्थितियों में इस्लामी जगत के लिए अत्याचारी शक्तियों और शैतानी हल्क़ों के विरुद्ध संघर्ष करके मनुष्यों को मुक्ति दिलाना सबसे अधिक महत्वपूर्ण और अनिवार्य है। स्पष्ट सी बात है कि यदि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मदीने में ही रुके रहते तथा आम जन मानस के बीच इस्लामी नियमों और आस्था संबंधी सिद्धांतों की शिक्षा दीक्षा करते रहते तो निश्चित रूप से कुछ लोगों का प्रशिक्षण हो जाता किंतु जब अपने मिशन पर वह इराक़ की ओर बढ़े तो यह सारे काम छूट गए। अब वह लोगों को नमाज़ की शिक्षा नहीं दे सकते थे, पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों से उन्हें अवगत नहीं करा सकते थे, अब वह अनाथों और विधवाओं की सहायता भी नहीं कर सकते थे। यह सारे एसे काम थे जिन्हें इमाम हुसैन अंजाम देते थे किंतु उन्होंने इन समस्त कार्यों को एक बहुत बड़े लक्ष्य पर क़ुरबान कर दिया। यहां तक कि हज जैसे महान संस्कार को भी जिसके बारे में सभी उपदेशक और प्रचारक बात करते हैं अपने इस मिशन पर निछावर कर दिया। वह मिशन क्या था? इमाम हुसैन ने स्वयं ही अपने इस मिशन के बारे में बताया कि मैं अच्छाइयों का आदेश देना, बुराइयों से रोकना तथा अपने नाना के मार्ग पर अग्रसर होना चाहता हूं। इमाम हुसैन ने अपने एक अन्य ख़ुतबे में कहा है कि हे लोगो पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि जो व्यक्ति किसी अत्याचारी राजा को देखे जो ईश्वर की हराम की हुई चीज़ों को हलाल घोषित कर रहा हो, ईश्वर से किए गए वचन को तोड़ रहा हो और वह व्यक्ति अपने कथन अथवा व्यवहार से इस स्थिति को बदलने का प्रयास न करे तो ईश्वर को यह अधिकार है कि उस व्यक्ति को उसी अत्याचारी शासक के ठिकाने पर पहुंचाए। परिवर्तन से तात्पर्य यह है कि अत्याचारी शक्ति भ्रष्टाचार फैला रही है और मनुष्यों को भौतिक एवं आध्यात्मिक पतन की ओर ले जाना चाहती है। यही कारण है कि इमाम हुसैन के आंदोलन का। यही कारण था कि इमाम हुसैन ने अधिक महत्वपूर्ण दायित्व के निर्वाह का चयन किया तथा कम महत्व वाले दायित्वों को इस महान दायित्व पर निछावर कर दिया। आज भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि अधिक महत्वपूर्ण काम क्या हैं? हर काल में इस्लामी समाज के विरुद्ध एक मोर्चा गतिविधियों में व्यस्त रहता है। शत्रु है, शत्रु का एक मोर्चा है जो इस्लामी जगत के लिए हमेशा ख़तरे उत्पन्न करता रहता है। इस मोर्चे की पहचान आवश्यक है। यदि हमनें शत्रु को पहचानने में ग़लती की तो, यदि हमने उन स्थानों के चिन्हिंत करने में ग़लती की जहां से हम पर हमले हो रहे हैं तो हमें एसा नुकसान पहुंच सकता है जिसकी पूर्ति संभव नहीं है, हम बहुत महत्वपूर्ण अवसरों से हाध धो सकते हैं।

    मशहूर वाक्य है जिसके बारे में कहा जाता है कि इमाम हुसैन का कथन है कि जीवन का अर्थ है किसी लक्ष्य के लिए समर्पित हो जाना और फिर उसके लिए संघर्ष करना। इस्लाम मनुष्य को महान लक्ष्य से परिचित कराने और उन्हें महान लक्ष्यों के मार्ग पर अग्रसर करने के लिए आया है। अब यदि मनुष्य इस मार्ग पर एक क़दम भी आगे बढ़ाता है, निष्ठा के साथ संघर्ष करता है, बलिदान करता है तो यदि उसे कठिनाइयों का भी सामना करना पड़े तो भी वह खुश होता है। क्योंकि उसे यह आभास होता है कि उसने अपने दायित्व के अनुसार महान लक्ष्य की ओर क़दम बढ़ाया है और इस मार्ग पर चलते हुए संघर्ष किया है, यह प्रयास अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है जो उसे हमेश लक्ष्य के निकट ले जाता है। यह वही चीज़ है जिसने ईरानी जनता के आंदोलन को अस्तित्व दिया और आज भी यह संघर्ष जारी है। इस क्रान्ति और इस संघर्ष ने जिस लक्ष्य का निर्धारण किया था वह एसा था जिस का फ़ायदा पूरी मानवता को प्राप्त होता है। वह लक्ष्य विश्व स्तर पर और सीमित क्षेत्र में एक देश के स्तर पर अत्याचार और भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष था और इसका लक्ष्य यह भी था कि मानवता के सामने महान लक्ष्य रखे जाएं।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की घटना हमें यह भी बताती है कि उन्होंने कितना महान कारनामा अंजाम दिया और साथ ही यह सीख भी देती है कि हमें भी एसा ही करना चाहिए। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पूरी मानवता को बहुत महान सीख दी है जिसकी महानता सबके समक्ष स्पष्ट है।

    बड़ी विचित्र बात है कि हमारा पूरा जीवन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के नाम से सुसज्जित है, इस पर हम ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं। इस महान हस्ती के आंदोलन के बारे में बहुत सी बातें कही जा चुकी हैं किंतु इसके साथ ही मनुष्य इस बारे में जितना चिंतन करे उसे शोध और अध्ययन का मौदान उतना ही बड़ा दिखाई देता है। इस महान और विचित्र घटना के बारे में आज भी सोचने और चिंतन करने के अनेक अछूते पहलू हैं। यदि ध्यानपूर्वक इस घटना की समीक्षा की जाए तो शायद यह कहा जा सके कि इंसान इमाम हुसैन के कुछ महीनों पर फैले आंदोलन से जिसकी शुरूआत मदीना नगर से मक्के की ओर प्रस्थान से हुई और इसका अंत कर्बला के मैदान में शहादत का जाम पीने पर हुआ सौ पाठ लिए जा सकते हैं, वैसे तो सौ ही नहीं हज़ारों पाठ मिल सकते हैं किंतु मैं सौ पाठ इस लिए कह रहा हूं कि उससे तात्पर्य यह है कि यदि हम सूक्ष्मता से जायज़ा लें तो सौ अध्याय निकल सकते हैं जिनमें हर अध्याय किसी भी राष्ट्र, किसी भी इतिहास और देश के लिए शासन व्यवस्था चलाने तथा ईश्वर का सामिप्य पाने का पाठ हो सकता है।