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    हुसैनी आंदोलन-3

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    दसवीं मोहर्रम की घटना, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन, उनका चेहलुम और अन्य धार्मिक अवसर इस्लामी इतिहास का वह महत्वपूर्ण मोड़ हैं जहां सत्य और असत्य का अंतर खुलकर सामने आ जाता है। इमाम हुसैन के बलिदान से इस्लाम धर्म को नया जीवन मिला और तथा इस ईश्वरीय धर्म के प्रकाशमान दीप को बुझा देने पर आतुर यज़ीदियत को निर्णायक पराजय मिली। इस घटना में अनगिनत सीख और पाठ निहित हैं। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने विभिन्न अवसरों पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन से मिलने वाली और नसीहतों पर प्रकाश डाला है। कार्यक्रम मार्गदर्शन के अंतर्गत हम हुसैनी आंदोलन से मिलने वाली सीख और नसीहतों को पेश करेंगे।

    आपको याद दिलाते चलें कि कार्यक्रम मार्गदर्शन इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के भाषणों से चयनित खंडों पर आधारित है।

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     इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इतिहास की महान हस्तियों के बीच सूर्य की  भांति जगमगा रहे हैं। ईश्वरीय दूत, ईश्वर के सदाचारी बंदे, सब पर नज़र डालिए। यदि यह हस्तियां चांद और तारों जैसी प्रतीत होती हैं तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उनके बीच सूर्य के समान जगमगाते हुए दिखाई देते हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मिशन में कुछ अति महत्वपूर्ण पाठ निहित हैं। सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इमाम हुसैन ने आंदोलन क्यों आरंभ किया। यह बहुत बड़ा पाठ है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से कहा गया कि मदीने और मक्के में आपका बड़ा आदर किया जाता है और यमन में शीयों की बहुत बड़ी संख्या है। किसी एसी जगह चले जाइए जहां यज़ीद से आपका कोई लेना देना ही न रहे और यज़ीद भी आपको परेशान न करे। आपके इतने चाहने वाले हैं, इतने शीया हैं, जाइए अपना जीवन गुज़ारिए। उपासना कीजिए, धर्म का प्रचार करें। इसके बावजूद इमाम ने विद्रोह क्यों किया? बात क्या थी?

    यही सबसे प्रमुख प्रश्न है। यही सबसे प्रमुख पाठ है। मैं यह नहीं कहता कि किसी ने अब तक यह बात नहीं कही। सच्चाई तो यह है कि इस बारे में बहुत काम किया गया है, बहुत मेहनत की गई है किंतु मैं एक नया दृष्टिकोण पेश करना चाहता हॅं। कुछ लोग यह कहना पसंद करते हैं कि इमाम हुसैन, यज़ीद की अधर्मी और भ्रष्ट सरकार को गिराकर अपनी सरकार बनाना चाहते थे और यही इमाम हुसैन के आंदोलन का लक्ष्य था। मेरे विचार में यह बात पूरी तरह सही नहीं है। आधी सही है। मैं यह नहीं कहता कि यह विचार पूरी तरह ग़लत है। यदि इस बात का मतलब यह है कि इमाम हुसैन ने केवल शासन पाने के लिए आंदोलन छेड़ा था तो यह ग़लत हैं। क्योंकि जब कोई शासन पाने के लिए आगे बढ़ता है वह वहीं तक जाता है जहां तक उसे लगता है कि लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा। जैसे ही उसे महसूस होता है कि यह काम हो नहीं पाएगा उसका यही दायित्व बनता है कि क़दम पीछे खींच ले। यदि प्रमुख लक्ष्य शासन था तो वहीं तक आगे बढ़ना जायज़ है जहां तक इस लक्ष्य की प्राप्ति संभव लगे और जब यह लक्ष्य असंभव प्रतीत होने लगे तो फिर और आगे जाना सही नहीं है। अब जो लोग यह कहते हैं कि इमाम कि आंदोलन का लक्ष्य सत्य पर आधारित अलवी शासन की स्थापना करना था, यदि उनका तात्पर्य यही है तो यह दुरुस्त नहीं है। क्योंकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पूरे आंदोलन में यह चीज़ नहीं दिखाई देती।

    दूसरी ओर कुछ लोग यह विचार रखते हैं कि शासन क्या चीज़ है, इमाम तो जानते ही थे कि वह शासन प्राप्त नहीं कर सकेंगे बल्कि उन्हें क़त्ल कर दिया जाएगा और वह शहीद होने के लिए कर्बला गए थे। यह विचार बहुत दिनों तक आम रहा और शायरों ने अपने शेर में भी इसे पेश किया है। यह कहना कि इमाम हुसैन ने शहीद होने के लिए आंदोलन आरंभ किया था कोई नई बात नहीं है। उन्होंने सोचा कि अब जब ठहर कर कुछ नहीं किया जा सकता तो चलो चलकर शहीद हो जाते हैं।

    हमारी धार्मिक पुस्तकों में कहीं यह नहीं कहा गया है कि इंसान जारक मौत के मुंह में कूद जाए। हमारे धर्म में एसा कुछ नहीं है। इस्लामी नियमों और क़ुरआन के भीतर जहां शहादत की बात कही गई है वहां तात्पर्य यही है कि मनुष्य किसी महान लक्ष्य के लिए निकले और इस मार्ग में मौत को गले लगाने के लिए भी तैयार रहे। यही सही इस्लामी विचारधारा है। किंतु यह सोच कि मनुष्य निकल पड़े ताकि मारा जाए और शायरों की ज़बान में उसका ख़ून रंग लाए और उसकी छींटें क़ातिल के दामन पर पड़ें तो यह एसी बात नहीं है जिसका इस महान आंदोलन से कोई संबंध हो। इस विचार में भी किसी हद तक सच्चाई है किंतु पूर्ण रूप से यह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का लक्ष्य नहीं है।

    संक्षेप में यह कि जो लोग कहते हैं कि लक्ष्य शासन था या लक्ष्य शहादत थी वह लोग वास्तव में लक्ष्य और परिणाम को आपस में गडमड कर देते हैं। लक्ष्य यही नहीं था। लक्ष्य कुछ और था और इस महान लक्ष्य तक पहुंचने का दो में से एक परिणाम सामने आना था। एक था शासन और दूसरे शहादत। इमाम हुसैन दोनों परिणामों के लिए तैयार थे।

    अगर हम इमाम हुसैन के लक्ष्य को बयान करना चाहें तो हमें इस तरह कहना चाहिए कि उनका लक्ष्य अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य का पालन करना था। वह धार्मिक कर्तव्य एसा था जिसे पहले कभी किसी ने अंजाम नहीं दिया था। यह एसा कर्तव्य था जिसका इस्लामी मूल्यों, नियमों, विचारों तथा ज्ञान के ढांचे में अति महत्वपूर्ण स्थान है।  यह अति महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य था किंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल तक इस पर अमल नहीं हुआ। इमाम हुसैन को इस कर्तव्य का पालन करना था ताकि दुनिया के लिए यह पाठ बन जाएं उदाहरण स्वरूप पैग़म्बरे इस्लाम ने शासन स्थापित किया और सरकार का गठन पूरे इस्लामी इतिहास के लिए उदाहरण बन गया। इसी प्रकार इस कर्तव्य पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के माध्यम से अमल होना था ताकि मुसलमानों और पूरे इतिहास के लिए यह व्यवहारिक पाठ बन जाए। अब प्रश्न यह है कि इस कर्तव्य का पालन इमाम हुसैन ही क्यों करें। तो इसका उत्तर यह है कि इसके पालन की परिस्थितियां इमाम हुसैन के काल ही में उत्पन्न हुईं। यदि यह परिस्थितियां किसी अन्य इमाम के काल में उत्पन्न हुई होतीं तो वह भी इसी प्रकार कर्तव्य का पालन करे। इमाम हुसैन से पहले तथा उनके बाद में कभी भी यह परिस्थितियां उत्पन्न नहीं हुईं। तथ लक्ष्य था इस महान कर्तव्य का पालन करना। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वह कर्तव्य क्या था जिसका पालन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने किया। श्रोताओ इस कर्तव्य के बारे में हम अगले कार्यक्रम में बात करेंगे। सुनना न भूलिएगा। http://hindi.irib.ir/