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    हुसैनी आंदोलन-4

    हुसैनी आंदोलन-4
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    दसवीं मोहर्रम की घटना, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन, उनका चेहलुम और अन्य धार्मिक अवसर इस्लामी इतिहास का वह महत्वपूर्ण मोड़ हैं जहां सत्य और असत्य का अंतर खुलकर सामने आ जाता है। इमाम हुसैन के बलिदा से इस्लाम धर्म को नया जीवन मिला और तथा इस ईश्वरीय धर्म के प्रकाशमान दीप को बुझा देने पर आतुर यज़ीदियत को निर्णायक पराजय मिली। इस घटना में अनगिनत सीख और पाठ निहित हैं। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने विभिन्न अवसरों पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन से मिलने वाली और नसीहतों पर प्रकाश डाला है। इससे पहले हमने बताया कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अत्यंत महान लक्ष्य के लिए बलिदान किया। अब हम इमाम हुसैन के लक्ष्य को बयान करना चाहें तो हमें इस तरह कहना चाहिए कि उनका लक्ष्य अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य का पालन करना था। वह धार्मिक कर्तव्य एसा था जिसे पहले कभी किसी ने अंजाम नहीं दिया था। यह एसा कर्तव्य था जिसका इस्लामी मूल्यों, नियमों, विचारों तथा ज्ञान के ढांचे में अति महत्वपूर्ण स्थान है। यह अति महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य था किंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल तक इस पर अमल नहीं हुआ। इमाम हुसैन को इस कर्तव्य का पालन करना था ताकि दुनिया के लिए यह पाठ बन जाएं उदाहरण स्वरूप पैग़म्बरे इस्लाम ने शासन स्थापित किया और सरकार का गठन पूरे इस्लामी इतिहास के लिए उदाहरण बन गया। इसी प्रकार इस कर्तव्य पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के माध्यम से अमल होना था ताकि मुसलमानों और पूरे इतिहास के लिए यह व्यवहारिक पाठ बन जाए। अब प्रश्न यह है कि इस कर्तव्य का पालन इमाम हुसैन ही क्यों करें। तो इसका उत्तर यह है कि इसके पालन की परिस्थितियां इमाम हुसैन के काल ही में उत्पन्न हुईं। यदि यह परिस्थितियां किसी अन्य इमाम के काल में उत्पन्न हुई होतीं तो वह भी इसी प्रकार कर्तव्य का पालन करे। इमाम हुसैन से पहले तथा उनके बाद में कभी भी यह परिस्थितियां उत्पन्न नहीं हुईं। तथ लक्ष्य था इस महान कर्तव्य का पालन करना। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वह कर्तव्य क्या था जिसका पालन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने किया।
    ईश्वर ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जैसी महान हस्तियों को एसा बनाया कि उनमें शहादत जैसे महान दायित्व के निर्वाह की क्षमता थी। अतः उन्होंने यह कारनामा कर दिखाया।
    पैग़म्बरे इस्लाम या अन्य पैग़म्बरों का जब आगमना हुआ तो वह अपने साथ कुछ शिक्षाएं और धार्मिक आदेश लेकर आए। जो शिक्षाएं, नियम और आदेश पैग़म्बर अपने साथ लाते हैं उनमें कुछ तो व्यक्तिगत जीवन से संबंधित होते हैं और उनका लक्ष्य यह होता है कि मनुष्य अपने भीतर सुधार लाए जबकि कुछ नियम सामाजिक और सामूहिक होते हैं जिनका लक्ष्य यह होता है कि उनके माध्यम से मुनष्य संसार को संवारे, उसका संचालन करे और मानवीय समाजों के आधारों को मज़बूत करे।
    पैग़म्बरे इस्लाम अपने साथ नमाज़ लाए, रोज़ा लाए, ज़कात का आदेश लेकर आए, हज के संस्कार लेकर आए, पारिवारिक क़ानून लाए, व्यक्ति संबंधों के नियम लेकर आए, ईश्वर के मार्ग में जेहाद, इस्लामी सरकार के गठन, इस्लामी अर्थ व्यवस्था, जनता और अधिकरियों के आपसी संबंध तथा सरकार के संबंध में आम लोगों के दायित्वों से संबंधित नियम लेकर आए। इस्लाम ने यह सारी चीज़ें मानव समाज के सामने पेश कीं। पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि मनुष्य और मानव समाज का कल्याण करने वाली और उसे भाग्यशाली बनाने वाली कोई भी एसी चीज़ नहीं है जिसे मैंने बयान न कर दिया हो और केवल बयान नहीं किया है बल्कि उस पर अमल करके दिखाया है। पैग़म्बरे इस्लाम के ज़माने में इस्लामी सरकार का गठन हुआ, इस्लामी अर्थ व्यवस्था के नियमों का व्यवहारिक रूप से पालन हुआ, जेहाद किया गया और इस्लामी ज़कात ली गई। एक इस्लामी देश और एक इस्लामी व्यवस्था बनी। इस व्यवस्था के संचालक तथा इस कारवां के मार्गदर्शक पैग़म्बरे इस्लाम और उनके बाद वह हस्ती है जो उनका स्थान लेने के योग्य है। इस्लामी समाज को इस मार्ग पर इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। यदि एसा हो जाए तो मनुष्य परिपूर्णता के शिखर बिंदु पर पहुंच जाएगा। समाज से बुराई और भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा।
    इस्लाम ने पैग़म्बरे इस्लाम के माध्यम से यह व्यवस्था पेश की तथा उस युग के लोगों के बीच इसे व्यवहारिक बनाकर दिखाया। उस जगह पर जिसे मदीना कहा जाता था। फिर मक्के तथा कुछ अन्य नगरों में यह व्यवस्था फैल गई। यहां पर एक सवाल बाक़ी रहता है कि यदि यह गाड़ी जिसे पैग़म्बरे इस्लमा ने पटरी पर पहुंचाया है, जन बूझकर या अनजाने में पटरी से उतार दी जाए तब क्या होगा? यदि इस्लामी समाज विचिलत और दिगभ्रमित हो गया। यदि यह गुमराही इतनी बढ़ गई कि पूरे इस्लाम और इस्लामी शिक्षाओं के विनाश का ख़तरा उत्पन्न हो गया तो क्या किया जाए?
    गुमराही की दो क़िस्में होती हैं। कभी जनता गुमराह हो जाती है जिसके उदाहरण ज़्यादा देखने में आते है किंतु इससे धर्म के विनाश का ख़तरा नहीं रहता। कभी यह होता है कि सरकार भी गुमराह हो जाता है, धर्मकि और सामाजिक नेता भी गुमराह हो जाते हैं। गुमराह व्यक्ति से सही धार्मिक शिक्षाएं प्राप्त नहीं की जा सकतीं। धार्मिक शिक्षाओं में फेर बदल होने लगता है। अच्छाई को बुराई, बुराई को अच्छाई, अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा बताया जाने लगाता है। धर्म ने यदि एक रेखा खींच दी है तो उसके ठीक विपरीत दिखा में रेखा खींचने का प्रयास किया जाता है। यदि धर्म और धार्मिक शासन इस प्रकार की स्थिति में पहुंच जाए तो फिर क्या किया जा सकता?
    एसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाने पर समाज को पटरी पर लाने का दायित्व नास्तिकों से जेहाद करने और धार्मिक सरकार का गठन करने से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां तक कहा जा सकता है कि इसका महत्व हज और अन्य इबादतों से भी ज़्यादा है। इस लिए कि यह कार्य इस्लाम को नया जीवन देने वाला है।
    तो अब प्रश्न यह है कि इस कर्तव्य का पालन कौन करेगा? इस कर्तव्य का निर्वाह किसका दायित्व है?
    यह दायित्व पैग़म्बरे इस्लाम उस उत्तराधिकारी का है जिसके युग में यह बुरी स्थिति उत्पन्न हुई है। लेकिन इसके लिए यह शर्त है कि इसकी परिस्थितियां भी अनुकूल हों क्योंकि ईश्वर ने एसा कोई काम वाजिब नहीं किया है जिसका कोई लाभ न हो। यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों तो आप जो काम भी करें उसका कोई लाभ और प्रभाव नहीं होगा। परिस्थितियों का अनुकूल होना आवश्यक है। अलबत्ता परिस्थितियों के अनुकूल होने के भी कुछ और अर्थ हैं। किंतु यह नहीं कि हम कहने लगें कि ख़तरा है अतः परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, यहां यह तात्पर्य नहीं है। परिस्थितियों के अनुकूल होने का अर्थ यह है कि यह ज्ञान हो कि वह जो काम करने जा रहा है इसके परिणाम निकलेंगे, लोगों तक उसका संदेश पहुंचेगा, बात लोगों की समझ में आ जाएगी और वह किसी ग़लतफ़हमी में नहीं रहेंगे। यह वही दायित्व हे जिसे किसी एक को पूरा करना था।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल में गुमराही की यही स्थिति थी तथा कर्तव्य के पालन के लिए परिस्थितियां भी अनुकूल थीं अतः इमाम हुसैन के लिए उठ खड़े होना और आंदोलन चलाना अनिवार्य हो गया था। इसलिए कि गुमराही फैल चुकी थी, मुआविया के बाद शासन जिसने संभाला था वह एसा व्यक्ति था जो दिखावे के लिए भी इस्लामी नियमों का पालन नहीं करता था। खुले आम शराब पीता था और हर बुरा काम करता था। खुले आम यौन भ्राष्टाचार में लिप्त था, क़ुरआन के विरुद्ध बात करता था, धर्म के विरुद्ध शेर पढ़ता था और खुलकर इस्लाम का विरोध करता था। किंतु चूंकि उसका नाम मुसलमानों के सरदार के रूप में लिया जाता था इस लिए इस्लाम के नाम को हटाना नहीं चाहता था। वह न तो इस्लाम का पालन करता था और न ही उसके दिल में इस्लाम के प्रति कोई हमदर्दी थी बल्कि वह उस गड्ढे की भांति जिससे हमेशा गंदा पानी निकलता है और परिसर को गंदा करता रहा है, इस्लाम को दूषित करने में लगा हुआ था। शासक चूंकि समाज की चोटी पर होता है अतः उससे यदि कोई चीज़ निकलती है तो वहीं नहीं रूकती बल्कि नीचे गिरती है और हर जगह फैल जाती है।
    एसा व्यक्ति मुआविया के बाद पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी बन बैठा था। इससे बड़ी गुमराही और क्या हो सकती है। इमाम हुसैन ने यह देखा तो उन्हें आभास हो गया कि अब कर्तव्य पूरा करना अनिवार्य हो गया है और इसके लिए परिस्थितियां भी अनुकूल हैं।
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