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    हुसैनी आंदोलन-5

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    हुसैनी आंदोलन के विषय में हमारी चर्चा इस मोड़ तक पहुंची थी कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपने महान लक्ष्य तथा महान कर्तव्य का पूर्ण आभास था अतः उन्होंने जान दे देने की ठान ली। अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र, मोहम्मद इब्ने हनफ़िया और अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास यह लोग कोई आम मुसलमान नहीं थे बल्कि धर्म के बड़े ज्ञानी थे। उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को यही सलाह दी कि अभी ख़तरा है, आप आंदोलन के लिए न निकलिए। वह यह कहना चाहते थे कि जब ख़तरा हो तो कर्तव्य समाप्त हो जाता है, उसका पालन आवश्यक नहीं रहता किंतु इमाम हुसैन को यह ज्ञात था कि उनका कर्तव्य एसा नहीं है जो ख़तरा आ जाने पर स्थगित हो जाए। यह एसा कर्तव्य है जो हमेशा ख़तरों के बीच में ही पूरा किया जाता है। यह कहां सभव है कि मनुष्य एक बडी भौतिकवादी शक्ति के सामने उठ खड़ा हो और उसे कोई ख़तरा भी न हो। क्या एसा हो सकता है? इस कर्तव्य का पालन करने की स्थिति में हमेशा ख़तरों का सामना होता है। इसी प्रकार के कर्तव्य का पालन इमाम ख़ुमैनी ने भी किया। इमाम ख़ुमैनी को भी यही सलाह दी गई कि आप ने देश के नरेश की नाराज़गी मोल ली है, आप के लिए ख़तरा उत्पन्न हो गया है। क्या इमाम ख़ुमैनी नहीं जानते थे कि वह जिस रास्ते पर चल रहे हैं उसमें ख़तरा है? क्या इमाम ख़ुमैनी नहीं जानते थे कि पहली शासन की सुरक्षा एजेंसियां लोगों को गिरफ़तार करती हैं, यातनाएं देती हैं, उनकी हत्या कर देती हैं? इमाम ख़ुमैनी को इन बातों की जानकारी नहीं थी? जो काम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल में हुआ था उसका छोटा सा नमूना इमाम ख़ुमैनी के काल में भी देखने में आया।
    तो मूल लक्ष्य है इस्लामी समाज को उसकी सही डगर पर लाना। कब? उस समय जब रास्ता बदल दिया गया हो, जब कुछ लोगों की ग़द्दारी, अज्ञानता और अत्याचार से मुसलमान दिगभ्रमित होने लगे हों।
    अलबत्ता हालात करवटें बदलते रहते हैं कभी हालात अनुकूल और कभी प्रतिकूल होते हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल में परिस्थितियां अनुकूल थीं और इमाम ख़ुमैनी के काल में भी हालात अनुकूल थे।
    अगर आंदोलन का परिणाम शहादत हो तो क्या आंदोलन को लाभहीन और अर्थहीन समझा जाएगा? नहीं। आंदोलन शहादत पर जाकर समाप्त हो तब भी उसे अंजाम देना चाहिए। आगे बढ़ना चाहिए। यह वही काम था जिसे इमाम हुसैन ने अंजाम दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम वह पहली हस्ती थे जिन्होंने यह काम इस प्रकार अंजाम दिया। उनसे पहले किसी ने यह काम नहीं किया था। क्योंकि उनसे पूर्व पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज़माने में न तो एसी पथभ्रष्टता उत्पन्न हुई थी और न ही अनुकूल हालात थे। अगर कुछ स्थानों पर भ्रांति का शिकार लोग दिखाई देते थे तो हालात अनुकूल नहीं थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल में दोनों ही चीज़ें थीं। यह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहुत महत्वपूर्ण विशेषता है। अतः हम यह कह सकते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आंदोलन आरंभ किया ताकि उस महान कर्तव्य का निर्वाह करें जो इस्लामी समाज में गुमराही के विरुद्ध उठ खड़े होने के अर्थ में था।
    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मक्के से निकले तो रास्ते में सभी मंज़िलों पर उन्होंने शिक्षाप्रद बातें बयान की हैं। बैज़ा नामक स्थान पर जहां हुर बिन यज़ीद उनके साथ चल रहा था और यदि इमाम हुसैन अपनी सवारी आगे बढ़ाते थे तो हुर बिन यज़ीद भी घोड़े को एड़ा लगाकर आगे बढ़ता था और इमाम हुसैन जहां ठहरते थे हुर भी ठहर जाता था। एक स्थान पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम शत्रु की सेना को संबोधित करते हुए कहते हैं अगर कोई यह देखे कि समाज में कोई शासक सत्तासीन है और अत्याचार कर रहा है, ईश्वर ने जिन चीज़ों को हराम कर दिया है उन्हें हलाल तथा ईश्वर द्वारा हलाल घोषित की गई चीज़ों को हराम ठहराता है, ईश्वरीय आदेशों की उपेक्षा करता है अर्थात उनका पालन नहीं करता तथा दूसरों भी इन के पालन का निमंत्रण नहीं देता तो ईश्वर प्रलय के दिन उसे वही सज़ा देगा जो सज़ा उसने अत्याचारी को दी होगी। अर्थात इन दोनों को एक ही पंक्ति में खड़ा करेगा। यह पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है। इसका आदेश पैग़म्बरे इस्लाम ने दिया है। पैग़म्बरे इस्लाम ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि इस्लामी समाज विचलित हो जाए तो क्या करना चाहिए। इमाम हुसैन ने पैग़म्बरे इस्लाम के इसी कथन को पेश किया। तो कर्तव्य है कि अपने बयान और अपने व्यवहार से अत्याचारी का विरोध किया जाए। यदि इंसान एसी परिस्थितियों में पहुंच जाए तो उसका कर्तव्य है कि अत्याचारी के विरुद्ध उठ खड़ा हो फिर परिणाम जो भी निकले। मार डाला जाए, जीवित बच जाए, विदित रूप से सफल हो या न हो। इस स्थिति में हर मुसलमान को क़दम आगे बढ़ाना चाहिए। यह वह कर्तव्य है जिसका उल्लेख पैग़म्बरे इस्लाम ने किया है। इसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि समस्त मुसलमानों के बीच इस कर्तव्य के पालन की ज़िम्मेदारी मुझ पर दूसरों से ज़्यादा है। अज़यद नामक स्थान पर जहां चार लोग इमाम हुसैन के आंदोलन में शामिल हुए थे, इमाम हुसैन ने कहा कि ईश्वर ने हमारे लिए जो अंजाम भी रखा होगा वह हमारे लिए सबसे उचित होगा, अंजाम चाहे क़त्ल हो जाना हो या विजय। इसी आधार पर हम कहते हैं कि इस बात का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इस लड़ाई में हम जीतते हैं या हर जाते हैं। कर्तव्य को कर्तव्य है। उसका पालन किया जाना चाहिए।
    कर्बला पहुंचने के बाद इमाम हुसैन ने अपने पहले भाषण में कहा कि ईश्वर का निर्णय सुनिश्चित हो चुका है।
    तो यह बात स्पष्ट हुई कि इमाम हुसैन ने एक कर्तव्य पूरा करने के लिए आंदोलन किया। यही कर्तव्य समस्त मुसलमानों का भी है।
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