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    हुसैनी आंदोलन-6

    हुसैनी आंदोलन-6
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    इससे हमने बताया था कि किन परिस्थितियों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने कर्तव्य के पालन का निर्णय किया था और यह कि इस प्रकार की परिस्थितियां उत्पन्न हो जाएं तो फिर कर्तव्य के पालन से पीछे नहीं हटा जा सकता। अलबत्ता इसके लिए शर्त यह है कि व्यक्ति को ज्ञान हो कि उसका आंदोलन परिणामदायक सिद्ध होगा। परिणाम तक पहुंचना शर्त है। अब इस मार्ग में कठिनाइयां हों, ख़तरे हों समस्याएं हों तो कोई बात नहीं है। यही कारण है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आंदोलन आरंभ किया और अपने कर्तव्य का पालन किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का यह क़दम सबके लिए पाठ बन गया। अब इतिहास में जब कभी भी विशेष परिस्थितियां उत्पन्न होंगी तो एक आदर्श मौजूद होगा। यह अलग बात है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बाद किसी भी इमाम के काल में इस प्रकार की परिस्थितियां सामने नहीं आईं। किंतु यदि इस समय देखा जाए तो शायद कई स्थान एसे मिल जाएंगे जहां इस प्रकार की परिस्थितियां मौजूद हैं और जहां लोगों को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यदि वह यह काम कर लेते हैं तो निश्चित रूप से उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन किया है। यह भी संभव है कि इस कर्तव्य निर्वाह में एक दो लोगों को विफलता का भी सामना करना पड़े।
    यदि परिवर्तन सुधार और आंदोलन को बार बार दोहराया जाएगा तो निश्चित रूप से इससे समाज में फैली त्रुडियां दूर होंगी। इस मार्ग का पहले किसी को ज्ञान नहीं था क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में तो एसा हुआ नहीं था। पहले ख़लीफ़ा के काल में भी इस कर्तव्य का निर्वाह नहीं हुआ, हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी इस काम को अंजाम नहीं दिया था। अतः यह कहना चाहिए कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पूरे इतिहास को यह सीख दी और इस्लाम को अपने काल में भी तथा आने वाले कालों में भी सुरक्षित बना दिया। अब जहां भी इस प्रकार इस प्रकार का भ्रष्टाचार होगा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का चरित्र वहां जीवित होगा और वह हमें बताएगा कि हमें क्या करना चाहिए। यही कारण है कि हमें इमाम हुसैन और कर्बला को हमेशा याद रखना चाहिए उनकी याद को जीवित रखना चाहिए क्योंकि कर्बला की घटना इस पाठ का व्यवहारिक रूप हमारे सामने पेश करती है। खेद की बात यह है कि दूसरे इस्लामी देशों में आशूर से मिलने वाले पाठ को उस प्रकार नहीं समझा गया है जैसा कि समझा जाना चाहिए। हालांकि यह काम बहुत आवश्यक है। हमारे देश में इस घटना का बोध था। हमारे देश की जनता इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की महानता से अवगत थी और उसे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन का परिचय था। लोगों में हुसैनी भावना थी इसी लिए जब इमाम ख़ुमैनी ने कहा कि मोहर्रम एसा महीना है जिसमें ख़ून को तलवार पर विजय प्राप्त होती है तो लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ। वास्तव में यही हुआ भी कि ख़ून को तलवार पर विजय मिली। मैंने कई वर्ष पहले एक बैठक में यही बात कही थी। यह क्रान्ति से पहले की बात है। एक उदाहरण मेरे मन में आया जिसे मैंने उस बैठक में बयान किया। यह उदाहरण इस तोते का है जिसका उल्लेख मौलाना रोम ने अपनी काव्य रचना में किया है।
    एक आदमी के घर में एक तोता था। जब वह व्यापार के लिए हिंदोस्तान जाने लगा तो उसने घर वालों से विदा लेने के बाद तोते से भी विदाई ली। उसने तोते से कहा कि मैं तुम्हारे देश हिंदोस्तान जा रहा हूं। तोते ने कहा कि फ़लां स्थान पर जाना, वहां मेरे दोस्त और रिश्तेदार मिलेंगे। तुम उनसे कहना कि तुम्हारा एक साथी मेरे घर में है। तुम उनसे मेरी दशा बयान करना कि मैं तुम्हारे घर में एक पिंजरे में बंद हूं। बस तुमसे मुझे और कुछ नहीं चाहिए। वह व्यापारी सफ़र पर रवाना हो गया और जब उस जगह पहुंचा तो उसने देखा कि बहुत से तोते पेड़ों की डालियों पर बैठे हुए हैं। उसने उन्हें पुकार कहा कि हे मीठी वाणी वाले प्यारे तोतो! मैं तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं। तुम्हारा एक साथी हमारे घर में है। वह बहुत अच्छी हालत में है। पिंजरे में है लेकिन बड़ी अच्छी हालत में रहता है और बड़े अच्छे खाने उसे मिलते हैं। उसने तुम्हें सलाम कहलवाया है। उस सौदागर की बात जैसे ही पूरी हुई उसने देखा कि डालियों पर बैठे सारे तोते पटापट ज़मीन पर गिर गए। उसने आगे बढ़कर देखा तो वह सब मरे हुए दिखाई दिए। उसे बड़ा दुख हुआ। वह सोचने लगा कि मैंने आख़िर क्या कह दिया कि यह सब बेचारे मर गए। लेकिन अब तक समय गुज़र चुका था और कुछ नहीं किया जा सकता था।
    ताजिर वापस चल पड़ा और जब अपने घर पहुंचा तो सीधे पिंजरे के पास गया और तोते से कहा कि मैंने तुम्हारा संदेश पहुंचा दिया। उसने कहा कि उन लोगों ने क्या जवाब दिया? सौदागर ने कहा कि तुम्हारा संदेश सुनते ही सारे तोते फड़फड़ाने लगे और फिर पटापट ज़मीन पर गिरकर मर गए। जैसे ही सौदागर की बात पूरी हुई उसने देखा कि उसका तोता भी फड़फड़ाकर पिंजरे में गिरा और मर गया। सौदागर ने पिंजरा खोला और तोते का पैर पकड़कर उसे बाहर निकाला और छत पर फेंक दिया। छत पर गिरने से पहले ही तोता फड़फड़ार उड़ गया और दीवार पर जा बैठा। उसने सौदागर से कहा कि हे मेरे प्यारे मित्र तुम्हारा बहुत बहुत आभार! तुमने मेरी मुक्ति का मार्ग मुझे सुझाया। मैं मरा नहीं था। मैंने मरने का केवल दिखावा किया था और यह वह पाठ था जो उन तोतों ने मुझे सिखाया। वह समझ गए कि मैं यहां पिंजरे में कैद हूं लेकिन वह किस तरह मुझे बताते कि मैं रिहाई के लिए क्या करूं? उन्होंने व्यवहारिक रूप से मुझे बता दिया कि मैं क्या करूं जिससे मुझे रिहाई मिल जाए।
    मैंने उस समय अपने भाषण में कहा था कि इमाम हुसैन किस ज़बान में बताते हुए कि तुम्हारा कर्तव्य क्या है। इमाम हुसैन ने व्यवहारिक रूप से हमें सीख दे दी और हमें बता दिया कि कैसे अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए।
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