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    15 रजब हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की वफ़ात

    15 रजब हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की वफ़ात
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    पंद्रह रजब, पैग़म्बरे इसलाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की नवासी और हज़रत अली व फ़ातेमा अलैहिमस्सलाम की सुपुत्री हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के स्वर्गवास की तारीख़ है।
    हज़रत ज़ैनब अलैहस्सलाम का जन्म वर्ष छः हिजरी क़मरी में पवित्र नगर मदीना में हुआ। उन्होंने एक ऐसे परिवार में आंखें खोलीं जो ईश्वर के विशेष संदेश वहि का साक्षी रहा था और ईश्वर से लोगों के संपर्क का माध्यम था। उस परिवार के सदस्य, क़ुरआने मजीद के अनुसार, सबके सब पवित्र और हर प्रकार की बुराई से दूर थे। उनके परिवार के सदस्य थे, उनके नाना पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम, उनके पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम, उनकी माता हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अलैहस्सलाम, उनके भाई हज़रत इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम। प्रिय श्रोताओ इस्लाम की इस महान हस्ती के स्वर्गवास के दिन के अवसर पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक संवेदना प्रकट करते हैं। इस विशेष कार्यक्रम में हम इस साहसी, त्यागी एवं बलिदानी महिला के दुखों भरे जीवन पर एक दृष्टि डालने का प्रयास करेंगे।
    हज़रत ज़ैनब अलैहस्सलाम, बाल्याकाल से ही अपने सद्गुणों, विशेषताओं और कथनी व करनी में सच्चाई के कारण अपने पिता की शोभा बन गईं। ज़ैनब शब्द का अर्थ होता है अपने पिता की शोभा। हदीसों में आया है कि वे प्रतिष्ठा में अपनी नानी हज़रत ख़दीजा, पवित्रता में अपनी माता हज़रत फ़ातेमा, वाकपटुता व शब्दालंकार में अपने पिता हज़रत अली, संयम व विनम्रता में अपने भाई इमाम हसन और साहस व दृढ़ता में अपने भाई इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से मिलती जुलती थीं। मानो पैग़म्बर के घराने के समस्त गुण एवं विशेषताएं सिमट कर हज़रत ज़ैनब के अस्तित्व में एकत्रित हो गई थीं। ईश्वर की ओर से उनके नसीब में यह लिख दिया गया था कि वे अपने जीवन के आरंभ से ही विभिन्न प्रकार के दुखों व पीड़ाओं का सामना करें ताकि अपने आपको, भौतिक मोह माया में ग्रस्त और सत्तालोलुप लोगों की आंतरिक इच्छाओं के चलते उत्पन्न होने वाले सामाजिक तूफ़ानों का दृढ़ता से मुक़ाबला करने के लिए तैयार कर सकें। अभी उनकी आयु पांच वर्ष की भी नहीं थी कि उनके नाना का स्वर्गवास हो गया जो उन्हें बहुत अधिक चाहते थे। यह बचपन में ही हज़रत ज़ैनब पर पड़ने वाली सबसे पहली मुसीबत थी जिसने उनके कोमल हृदय को तोड़ कर रख दिया। यह दुख उनकी और उनकी माता हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के लिए बड़ा ही हृदय विदारक था।
    हज़रत ज़ैनब ने इस बात को भी देखा कि नाना के स्वर्गवास के बाद उनकी माता पर ढाए जाने वाले अत्याचारों के कारण वे अत्यधिक बीमार पड़ गईं। हज़रत फ़ातेमा पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद तीन महीने से अधिक जीवित नहीं रह सकीं और इस प्रकार हज़रत ज़ैनब पांच वर्ष की आयु में ही अपनी माता की छत्रछाया से भी वंचित हो गईं। यह छोटा सा समय भी ऐसे उतार-चढ़ाव और कटु एवं मधुर घटनाओं से भरा हुआ है जो ईश्वर के मार्ग में संघर्ष करने और जीवन की कठिनाइयों व दुखों का मुक़ाबला करने के लिए हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा को तैयार कर रही थीं। वे पैग़म्बर के परिजनों के अधिकारों की रक्षा हेतु अपनी माता हज़रत फ़ातेमा द्वारा मस्जिदे नबी में दिए गए भाषण की साक्षी थीं और उन्हें अपने माता के भाषण का हर शब्द याद था, इस प्रकार से कि उन्होंने अन्य लोगों तक स्वयं यह भाषण और इसके संदेश को पहुंचाया।
    पैग़म्बर के स्वर्गवास के कुछ ही दिन बाद माता के बिछड़ने का दुःख अल्पायु की ज़ैनब के लिए बहुत हृदय विदारक था किंतु उन्होंने शीघ्र ही पूरी दृढ़ता के साथ स्वयं पर नियंत्रण किया और अपनी माता का स्थान ले लिया और पिता एवं भाइयों के दुखों पर मरहम रख दिया। यद्यपि वे अपने भाइयों से छोटी थीं किंतु वे फ़ातेमा की सुपुत्री और उनकी छत्रछाया में पली थीं इस लिए फ़ातेमा के स्नेह व प्रेम की ख़ुशबू उनके पूरे अस्तित्व में मौजूद थी और हसन व हुसैन को उनमें अपनी माता का प्रतिबिंब दिखता था। हज़रत ज़ैनब व उनके भाइयों में जो प्रेम था उसका वर्णन संभव नहीं है और वे क्षण भी एक दूसरे से दूर नहीं रह सकते थे।
    हज़रत ज़ैनब, माता के स्वर्गवास के बाद पचीस वर्षों तक अपने पिता के उत्तराधिकार के हक़ के रौंदे जाने और पिता के कटु मौन की साक्षी रहीं। उसके बाद उन्होंने हज़रत अली के पाँच वर्ष के उतार-चढ़ाव से भरे ख़िलाफ़त के काल को भी देखा यहां तक कि उन्नीस रमज़ान वर्ष 40 हिजरी क़मरी को भोर समय, कूफ़े के वातावरण में एक ऐसी आवाज़ गूंजी जिसने न्याय व सच्चाई के इमाम को सज्दे की स्थिति में शहीद कर दिए जाने की सूचना दी। हज़रत ज़ैनब के लिए अपने पिता की शहादत और उनका विरह सहन करना बहुत कठिन था क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम और माता के स्वर्गवास के बाद वही उनका मज़बूत सहारा थे। हज़रत अली का स्नेहमयी अस्तित्व, इस दुखियारी बेटी के लिए शांति की छाया बना हुआ था किंतु संसार ने उनसे यह सहारा भी छीन लिया। लेकिन हज़रत अली के मत की प्रशिक्षित ज़ैनब ने जो ईश्वर की प्रसन्नता के अतिरिक्त कुछ और नहीं सोचती थीं, धैर्य व संयम से काम लिया। वे संयम व प्रतिरोध का आदर्श थीं, वे अपने प्रियजनों के दुःख में टूटने के लिए नहीं आई थीं बल्कि वे पूरे संसार की महिलाओं के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने, अपने परिजनों की सच्चाई सिद्ध करने, प्रतिरोध का पाठ सिखाने और अपने समय के हर अत्याचार को पराजित करने के लिए आई थीं।
    हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा अपने भाई इमाम हसन के काल में भी पिता हज़रत अली के काल की भांति शत्रुओं के षड्यंत्रों, मुआविया के विषैले कुप्रचारों और अंततः इमाम हसन के अकेले रह जाने की साक्षी रहीं। वे इस पूरे काल में अपने बड़े भाई के साथ रहीं और उन्होंने वह समय भी देखा जब इमाम हसन को विष के द्वारा शहीद कर दिया गया। उन्होंने इस मुसीबत पर भी संयम से काम लिया। अंततः वर्ष साठ हिजरी में वे अपने दूसरे भाई इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ कर्बला की यात्रा के लिए रवाना हुईं। अब तक उन पर जितनी भी मुसीबतें पड़ी थीं, कर्बला उनकी चरम सीमा थी। कुछ ही घंटों में उनके पुत्रों और भाइयों सहित उनके अट्ठारह निकटवर्ती परिजन कर्बला में शहीद कर दिए गए और फिर उन्हें अपनी जान से भी ज़्यादा प्रिय अपने भाई इमाम हुसैन का दाग़ भी सहना पड़ा। यह वह पीड़ा थी जिसे सहन करना आकाश और धरती के भी बस की बात नहीं थी किंतु ज़ैनब को इस असहनीय दुःख को भी बर्दाश्त करना था। उन्हें इस मानसिक स्थिति में, बंदी बन कर शत्रुओं के बीच, सबसे बड़ा धार्मिक, राजनैतिक व सामाजिक दायित्व निभाना था।
    इमाम हुसैन की शहादत के बाद हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा पर कई महत्वपूर्ण दायित्व थे, शत्रुओं के आक्रमणों से अपने भतीजे इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की रक्षा, बच्चों व महिलाओं की देख-भाल, शहीदों के ख़ून का संदेश हर जगह पहुंचाना, मुसलमानों की जागरूकता और यज़ीद की अत्याचारी सरकार का कच्चा चिट्ठा खोलना उनके इन्हीं दायित्वों में शामिल थे जिनमें से प्रत्येक को उन्होंने सर्वोत्तम ढंग से पूरा किया। यज़ीद और उसके लोग चाहते थे कि अपने व्यापक कुप्रचारों द्वारा इमाम हुसैन के आंदोलन को धर्म, इस्लामी समाज और मुसलमानों के हितों के विरुद्ध होने वाली एक कार्यवाही दर्शाएं अतः वे इस आंदोलन को भौतिकता व सांसारिकता से जोड़ कर इस क्रांतिकारी आंदोलन को अपने विरोधियों के दमन के लिए अधिक से अधिक प्रयोग करने का प्रयास कर रहे थे किंतु हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने न केवल यह कि इन कुप्रचारों पर अंकुश लगा दिया बल्कि यज़ीद व उसके साथियों के अपराधों व अत्याचारों पर से पर्दा भी उठा दिया।
    उन्होंने अपने भाषणों से जनमत को परिवर्तित कर दिया। कूफ़े के लोग, जिन्होंने लगभग बीस साल से हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आवाज़ नहीं सुनी थी, हज़रत ज़ैनब की आवाज़ से, जिसमें अली के स्वर की प्रतिध्वनि थी, जागृत हो गए। हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के भाषण इतने प्रभावी और भाषा के गुणों से ओत प्रोत थे कि हज़लम बिन कसीर, जो स्वयं अरबों के भाषा विदों व शब्दालंकार विशेषज्ञों में से एक है, हज़रत ज़ैनब के साहस और उनके असाधारण भाषणों पर आश्चर्य प्रकट करता है और कहता है कि उनके भाषणों का उदाहरण केवल उनके पिता के भाषणों से ही दिया जा सकता है। वह कहता है। ज़ैनब, मानो अली की ज़बान से बोल रही थीं। किंतु हज़रत ज़ैनब के शब्दालंकार और वाकपटुता के साथ ही एक मुसलमान महिला की शर्म व पवित्रता भी उनकी कथनी व करनी में पूर्ण रूप से देखी जा सकती थी। कूफ़े में उनके भाषणों का उल्लेख करने वाले एक व्यक्ति का कहना है कि ईश्वर की सौगंध मैंने उनके जैसी पवित्रा वाली कोई महिला नहीं देखी जो इतनी बौद्धिकता से भाषण दे सके।
    हज़रत ज़ैनब ने यथासंभव अल्पावधि में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर किए जाने वाले अत्याचार और उनकी सच्चाई, अत्याचार से संघर्ष, धर्म की रक्षा और न्याय प्रेम की आवाज़ लोगों के कानों तक पहुंचा दी। इस प्रकार से कि थोड़े ही समय में बनी उमय्या के अत्याचारी व अपराधी ख़लीफ़ा यज़ीद की समझ में आ गया कि वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद और पैग़म्बर के परिजनों को क़ैद करवा के न केवल यह कि अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सका है बल्कि उसने स्वयं को अधिक अपमानित व घृणित बना लिया है। यही कारण था कि वह इमाम हुसैन के आंदोलन के संबंध में अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करने पर विवश हो गया और उसने इसका सारा दायित्व, कूफ़े के गवर्नर उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद के सिर मढ़ दिया और स्वयं को उनकी हत्या से दूर बताया किंतु पैग़म्बर के परिजनों ने यज़ीद के सभी प्रयासों को विफल बनाते हुए उसे सदा के लिए इतिहास में अपमानित कर दिया। इस प्रकार से कि यज़ीद की राजधानी, जो पैग़म्बर के परिजनों से मुआविया के द्वेष के कारण हज़रत अली व उनकी संतान से शत्रुता लिए कुख्यात थी, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम व उनके साथियों की शहादत का शोक मनाने लगी और उसके गली कूचों में हज़रत अली के परिवार के गुणगान और उन पर ढाए जाने वाले अत्याचारों के वर्णन की सभाएं आयोजित होने लगीं।