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    सूरए आराफ़, आयतें 132-135, (कार्यक्रम 260)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 132 की तिलावत सुनते हैंوَقَالُوا مَهْمَا تَأْتِنَا بِهِ مِنْ آَيَةٍ لِتَسْحَرَنَا بِهَا فَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ (132)और उन्होंने कहा, (हे मूसा!) तुम कोई भी निशानी (और चमत्कार) लाकर उसके द्वारा हम पर जादू करो, हम तुम पर ईमान लाने वाले नहीं हैं। (7:132)यह आयत और पवित्र क़ुरआन में मौजूद इस जैसी अनेक आयतें दर्शाती हैं कि अनेक काफ़िरों के कुफ़्र का कारण सत्य और वास्तविकता को न पहचानना नहीं बल्कि उनका अहंकार और हठधर्म होता है। अर्थात अनेक लोग सत्य और वास्तविकता को समझते हैं किन्तु उसे स्वीकार नहीं करना चाहते।इस आयत में भी काफ़िर, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कहते हैं कि तुम इस बात का विश्वास रखो कि तुम चाहे जो भी तर्क और चमत्कार लाओ हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे। अर्थात हम तुम पर ईमान लाना ही नहीं चाहते।इसके मुक़ाबले में कुछ सत्य प्रेमी और वास्तविकता की खोज में रहने वाले लोग हैं जो यह कहते हैं कि यदि तुम कोई ठोस तर्क पेश कर दो तो हम ईमान ले आएंगे। जिस प्रकार से कि फ़िरऔन के दरबार के जादूगर ईमान ले आए, चूंकि वे स्वयं जादू में दक्षता रखते थे और हठधर्मी नहीं थे, अतः यह समझते थे कि हज़रत मूसा का काम जादू नहीं है अतः वे ईमान ले आए परंतु फ़िरऔन के लोग जिन्हें जादू में निपुणता भी प्राप्त नहीं थी, ईमान नहीं लाए और हज़रत मूसा पर जादू का आरोप लगाते रहे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय पैग़म्बरों पर जादू का आरोप लगाना, उस समय के सबसे अधिक प्रचलित आरोपों में से था परंतु पैग़म्बर मैदान छोड़कर भागे नहीं बल्कि अपने दायित्वों का निर्वाह करते रहे।घमंड और हठधर्म जैसे मानसिक रोग, सत्य के मार्ग अर्थात धर्म के समक्ष नतमस्तक होने में बाधा डालते हैं।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 133 की तिलावत सुनते हैं।فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ الطُّوفَانَ وَالْجَرَادَ وَالْقُمَّلَ وَالضَّفَادِعَ وَالدَّمَ آَيَاتٍ مُفَصَّلَاتٍ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا مُجْرِمِينَ (133)फिर हमने उन पर तूफ़ान, टिड्डी, जूं, मेंढक और रक्त (के दंड) को अलग-अलग निशानियां बनाकर भेजा परंतु उन्होंने फिर भी घमंड से काम लिया और (वस्तुतः) वे लोग अपराधी थे। (7:133)हठधर्मी पर आधारित काफ़िरों का व्यवहार इस बात का कारण बना कि ईश्वर का प्रकोप उन्हें अपनी लपेट में ले ले और उनका जीवन कठिनाई में पड़ जाए। पहले तो अत्याधिक वर्षा हुई जिसने अनेक क्षेत्रों को तबाह कर दिया फिर विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकोड़ों ने उनकी फ़स्ल बर्बाद कर दी और अंततः वहां का पानी ख़ून में परिवर्तित हो गया।ये सारे दंड उन लोगों के पाप, अपराध और अहंकार के कारण ही उन्हें भोगने पड़े थे। तौरैत के विभिन्न भागों में भी इन सारी बातों का उल्लेख हुआ है जिन्हें क़ुरआन ने इस आयत में बयान किया है।इस आयत से हमने सीखा कि पशु-पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं, कभी उस मकड़ी की भांति ईश्वरीय दया के प्रतिनिधि जिसने शत्रुओं से पैग़म्बर की जान बचाने के लिए गुफ के मुहाने पर जाल बना दिया या कभी उस टिड्डी दल की भांति ईश्वरीय कोप के प्रतिनिधि को पूरी फ़सल तबाह कर देता है।पाप और अहंकार, सत्य के इन्कार और उसके मुक़ाबले में आने की भूमि प्रशस्त करता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 134 और 135 की तिलावत सुनते हैंوَلَمَّا وَقَعَ عَلَيْهِمُ الرِّجْزُ قَالُوا يَا مُوسَى ادْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِنْدَكَ لَئِنْ كَشَفْتَ عَنَّا الرِّجْزَ لَنُؤْمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرْسِلَنَّ مَعَكَ بَنِي إِسْرَائِيلَ (134) فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ الرِّجْزَ إِلَى أَجَلٍ هُمْ بَالِغُوهُ إِذَا هُمْ يَنْكُثُونَ (135)और फिर जब उन पर दंड आया तो उन्होंने कहा कि हे मूसा! हमारे लिए अपने पालनहार से उस वचन के अंतर्गत जो उसने तुम्हें दिया है, प्रार्थना करो। यदि तुमने इस पर से यह दंड हटा दिया तो हम अवश्य ही तुम पर ईमान ले आएंगे और बनी इस्राईल को निश्चित रूप से तुम्हारे साथ भेज देंगे। (7:134) तो जब हमने एक नियत समय के लिए, जिस तक उन्हें पहुंचना ही था, उन पर से दंड हटा लिया तो वे फिर अपने वचन से फिर गए। (7:135)फ़िरऔन के मानने वालों पर आने वाली विभिन्न आपदाओं और मुसीबतों से वे लोग समझ गए थे कि यह प्राकृतिक आपदाएं नहीं हैं और इन्हें समाप्त करवाने के लिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास जाना चाहिए। अतः वे उनेक पास गए और उनसे निवेदन किया कि वे इन मुसीबतों की समाप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें।उन्होंने वचन दिया कि यदि मुसीबतें समाप्त हो गई तो हम आप पर ईमान ले आएंगे और बनी इस्राईल को यातनाएं देना भी छोड़ देंगे। बल्कि हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे ताकि वे आप के साथ चले जाएं।हज़रत मूसा ने भी, जो उन्हें पहले ही बता चुके थे कि यह दंड कब तक जारी रहेगा ताकि वे समझ जाएं कि यह कोई प्राकृतिक बात नहीं बल्कि ईश्वरीय दंड है, प्रार्थना की और दंड समाप्त हो गया परंतु फ़िरऔन के अनुयाइयों ने पुनः अपना वचन तोड़ दिया और कुफ़्र अपनाया।इन आयतो से हमने सीखा कि दंड और मुसीबतों से मुक्ति के लिए ईश्वर के प्रिय बंदों को माध्यम बनाना प्रभावी है। काफ़िरों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से निवेदन किया कि वे दंड से उनकी मुक्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें।जीवन की कटु व मधुर घटनाएं संयोग नहीं बल्कि एक स्पष्ट तथा निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत हैं जिसका क़ुरआन ने वर्णन किया है।अत्याचारी शासकों के चंगुल से लोगों की स्वतंत्रता, ईश्वरीय पैग़म्बरों के दायित्वों में से एक है।