islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. (2) जिमाअ-

    (2) जिमाअ-

    (2) जिमाअ-
    5 (100%) 1 vote[s]

    जिमाअ रोज़े को बातिल कर देता है चाहे अज़वे तनासुल(लिंग) सुपारी तक ही दाखिल हो और मनी(वीर्य) भी ख़ारिज न होई हो।

    (1594) अगर आला-ए-तनासुल(लिंग) सुपारी से कम दाखिल हो और मनी भी खारिज न हो तो रोज़ा बातिल नही होता लेकिन जिस शख़्स कि सुपारी कटी हुई हो अगर वह सुपारी की मिक़दार से कम मिक़दार में दाख़िल करे तो अगर यह कहा जाये कि उस ने हम बिस्तरी(सम्भोग) की है तो उस का रोज़ा बातिल हो जायेगा।

    (1595) अगर कोई अमदन(जान बूझ कर) जिमाअ का इरादा करे और फ़िर शक करे कि सुपारी के बराबर दाख़िल हुआ था या नहीं तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उस का रोज़ा बातिल है और ज़रूरी है कि उस रोज़े की क़ज़ा बजा लाये लेकिन कफ़्फारा वाजिब नही हैं।

    (1596) अगर कोई भूल जाये कि रोज़े से है और जिमाअ करे या उसे जिमाअ पर इस तरह मजबूर किया जाये कि उस का इख़्तियार बाक़ी न रहे तो उस का रोज़ा बातिल नही होगा अलबत्ता अगर जिमाअ की हालत में उसे याद आ जाये कि रोज़े से है या मजबूरी ख़त्म हो जाये तो ज़रूरी है कि फ़ौरन तर्क कर दे और अगर ऐसा न करे तो उस का रोज़ा बातिल है।