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    मानवाधिकार-2

    मानवाधिकार-2
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    मानवाधिकार का विषय एसा है जिसपर राजनैतिक, प्रचारिक और सामाजिक गलियारों में बहुत बढ़ चढ़कर चर्चा होती है किंतु यह विषय भी दूसरे बहुत से विषयों की भांति अलग अलग परिभाषाओं में पेश किया जाता है जिसके कारण भ्रांतियां भी उत्पन्न हो जाती हैं। कार्यक्रम मार्गदर्शन में हम विभिन्न विषयों पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता का विचार पेश करते हैं। इस चर्चा में हम मानवाधिकार के विषय पर इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के विचार पेश कर रहे हैं। यह चर्चा इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के विभिन्न भाषणों से चयनित खंडों पर आधारित है।

    इस्लाम मानवता के उत्थान पर बल देता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस्लाम के निकट महिला और पुरुष में कोई अंतर नहीं है। महिला और पुरुष मानवता के दो स्तंभ हैं। मानवीय एवं आध्यात्मिक दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं है। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा से इस्लाम का उद्देश्य यह है कि महिलाओं पर अत्याचार न हो और पुरुष स्वयं को महिलाओं का मालिक न समझें। पारिवारिक जीवन में कुछ सीमाएं और अधिकार होते हैं। पुरुष के अधिकार हैं तो महिला के भी कुछ अधिकार हैं और यह अधिकार बड़े न्यायपूर्ण और संतुलित ढंग से बयान और निर्धारित किए गए हैं। इस्लाम में मानव चरित्र को महत्व दिया गया है। योग्यताओं को महत्व दिया गया है, योग्यताओं को प्राथमिकता दी गई है। मानव समाज के हर सदस्य के लिए कुछ दायित्व रखे गए हैं। अतः स्वभाव को पहचानना बहुत आवश्यक है। इस्लाम महिला और पुरुष के स्वभाव एवं प्रवृत्ति पर पूरा ध्यान देता है। अर्थात मनुष्यों के बीच न्याय को ध्यान में रखता है। यह संभव है कि कुछ स्थानों पर महिलाओं और पुरुषों के लिए आदेश अलग अलग हों क्योंकि कुछ चीज़ों की दृष्टि से महिला और पुरुष का स्वभाव भिन्न होता है। अतः महिला और पुरुष के संबंध में स्वभाव और प्रवृत्ति की सबसे अधिक जानकारी इस्लामी शिक्षाओं में निहित है।

    अमरीका के नेतृत्व में साम्राज्यवाद तथा दूसरे छोटे बड़े शत्रुओं की ओर से विश्व के हर कोने में ईरान का विरोध किया जाता है। इसका कारण यह है कि वह इस्लाम के विरुद्ध मोर्चा खोल देना चाहते हैं। यह  लोग इस्लमा के विरोधी हैं क्योंकि इस्लाम को अपनी लूट खसोट के मार्ग में रुकावट के रूप में देखते हैं, इस लिए इस्लाम के दुशमन बन गए हैं। दूसरे देशों की दौलत लूटने वाले दरिंदों के विरुद्ध इस्लाम की शिक्षाओं को देखते हैं तो इस्लाम का विरोध करने लगते हैं। उनका प्रयास है कि इस्लाम लोगों की निगाहों में गिर जाए। जबकि इस्लाम तो मानवाधिकार का ध्वजवाहक है। मानवाधिकार कहते किसे हैं? क्या वह फ़िलिस्तीनी जो कड़ाके की ठंड में दुष्ट ज़ायोनियों के हाथों बेघर कर दिए गए, मनुष्य नहीं हैं?! क्या उनका कोई अधिकार नहीं है?! उनके संबंध में मानवाधिकारो के नियम लागू नहीं होते?! मानवाधिकार घोषणापत्र जिसका यह शक्तियां बड़ा दंभ भरती हैं क्या उसका सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद यह नहीं है कि हर मनुष्य अपने आवास के चयन के संबंध में आज़ाद है और अपने आवास का चयन कर सकता है?! तो क्यों इन फ़िलिस्तीनियों के घर में ज़ायोनी घुस गए और उन्हें उन्हीं के घरों से निकाल दिया। क्या फ़िलिस्तीन फ़िलिस्तीनियों का नहीं है?! क्या इसी को मानवाधिकार कहते हैं। आज कौन है जो मानवाधिकार के दावेदारों के इन झूठे और शैतानी हथकंडों से अवगत न हो?

    कुछ लोग विश्व स्तर पर अहिंसा और मानवाधिकार के पालन के बड़े दावे करते हैं वही बड़े निंदनीय ढंग से मनुष्यों का नरसंहार करते हैं और फिर अहिंसा तथा कोमल स्वभाव की बातें भी शुरू कर देते हैं। हिंस और हिंसा के बारे में बड़ा दिखावा होता है। सच्चाई तो यह है कि आवश्यकता पड़ने पर कठोर बर्ताव भी करना पड़ता है। कुछ चीज़ें एसी हो जाती हैं कि उनको  उपेक्षित नहीं किया जा सकता। कुछ अवसर एसे होते हैं जहां नर्मी से पेश आना आवश्यक होता है। यह दोनों ही चीज़ें मौजूद होना चाहिए।

    जारी है…..  (http://hindi.irib.ir)