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    औरत इस्लाम की नज़र में (1)

    औरत इस्लाम की नज़र में (1)
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    अरब के उस ज़माने में जब हर तरफ़ जिहालत और गवार पन था और औरत सुसाइटी के लिये एक कलंक समझी जाती थी। रसूले इस्लाम स. नें आकर दुनिया को औरत की हैसियत

     

    और उसकी श्रेष्ठता बताई और एक बेटी का इस तरह पालन पोषण किया कि वह दुनिया की सबसे महान औरत बन गई और उसे, “सारी दुनिया की औरतों का सरदारकहा गया। यह बेटी वह औरत है जिसका आदर अल्लाह का रसूल भी करता है। एक बाप का अपनी बेटी के सम्मान के लिये खड़े होने का क्या मतलब है? क्या दुनिया में कहीं ऐसा होता है कि बाप बेटी का इस तरह आदर करे फिर अगर रसूल जैसा महान इन्सान बेटी का सम्मान करे तो इसका मतलब यह है कि यह आदर बेटी होने के कारण नहीं किया जा रहा है बल्कि उस औरत के अन्दर कुछ ऐसा है जो कि इस बात का कारण बन रहा है कि रसूल भी आदर करे, रसूल का यह आदर एक ऐसी औरत का सम्मान है जो इन्सानियत, ख़ुदा की इबादत, उसके आज्ञा पालन और आध्यात्मिकता की चोटी पर पहुँची हुई है। इस्लाम की नज़र में इन चीज़ों में मर्द और औरत के बीच कोई अन्तर नहीं है एक औरत भी वहाँ तक पहुँच सकती है कि रसूल जैसा इन्सान उसका आदर करे।

    इसी लिये अल्लाह तआला नें क़ुरआने मजीद में कुछ औरतों को सबके लिये, मर्दों के लिये आईडियल बनाया है जैसा फ़िरऔन की बीवी जनाब आसिया और जनाबे ईसा की माँ जनाबे मरियम, जनाबे आसिया के बारे में फ़रमाता है:

    ’’وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا لِّلَّذِينَ آمَنُوا اِمْرَأَةَ فِرْعَوْنَ إِذْ قَالَتْ رَبِّ ابْنِ لِي عِندَكَ بَيْتًا فِي الْجَنَّةِ وَنَجِّنِي مِن فِرْعَوْنَ وَعَمَلِهِ وَنَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ‘‘

    और ख़ुदा नें ईमान लाने वालों के लिये फ़िरऔन की बीवी को मिसाल (आइडियल) बनाकर पेश किया कि उसनें कहा मेरे पालने वाले मेरे लिये अपने यहाँ जन्नत में एक घर बना दे और मुझे फ़िरऔन उसके कामों से बचा ले और मुझे उस ज़ालिम क़ौम से बचा लेऔर इसी तरह जनाब मरियम के बारे में कहा:

    ’’وَمَرْيَمَ ابْنَتَ عِمْرَانَ الَّتِي أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا‘‘

    और इमरान की बेटी (को ईमान वालों के लिये मिसाल बनाया) जिन्होंनें अपने आपको पवित्र रखा

    अल्लाह तआला नें यहाँ उन दो महान औरतों को केवल औरतों के लिये नहीं बल्कि सारे ईमान वालों के लिये आईडियल बनाया है चाहे वह मर्द हों या औरतें हों इसका मतलब यह है कि ईमान, तक़वा, अल्लाह की इताअत, इबादत, पवित्रता और इस तरह की चीज़ों में मर्द और औरत बराबर हैं बल्कि कभी औरत इतने आगे निकल जाती है कि वह मर्दों के लिये भी आइडियल बन जाती है।

    यहाँ एक और बात की तरफ़ ध्यान देना ज़रूरी है कि इस्लाम औरत को केवल एक औरत की नज़र से नहीं देखता बल्कि उसे एक इन्सान की नज़र से देखता है, हालांकि ख़ुद औरत होना भी उसके लिये काफ़ी महत्वपूर्ण है और उसे भी ख़ुद को औरत समझते हुए वही काम करने चाहिये जो उसकी विशेषता से मेल खाते हों उसे मर्द बनने की कोशिश नहीं करना चाहिये जिस तरह मर्द को मर्द होना चाहिये औरत बनने की कोशिश नहीं करना चाहिये, औरत होने के हिसाब से वह मर्द से अलग है, उसकी सृष्टि उसकी आकृति अलग है इसी लिये उसकी ज़िम्मेदारियां भी मर्द से अलग हैं लेकिन इन्सान होने के लिहाज़ से उसमें और मर्द में कोई अन्तर नहीं है ऐसा नहीं है कि मर्द इन्सान है, औरत इन्सान नहीं है या मर्द ज़्यादा इन्सान है और औरत कम इन्सान है।

    क़ुरआने मजीद की बहुत सी आयतों में इस उसूल को बिल्कुल साफ़ बयान किया गया है। जैसा कि फ़रमाता है:

    ’’إِنَّ الْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِتِينَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِقِينَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِرِينَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِعِينَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّقِينَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّائِمِينَ وَالصَّائِمَاتِ وَالْحَافِظِينَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاكِرِينَ اللَّهَ كَثِيرًا وَالذَّاكِرَاتِ أَعَدَّ اللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا‘‘

    बेशक मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें, मोमिन मर्द और मोमिन औरतें, इबादत करने वाले मर्द और औरतें, सच्चे मर्द और सच्ची औरतें, सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें, अल्लाह के सामने झुकने वाले मर्द और औरतें, सदक़ा देने वाले मर्द और औरतें, रोज़ा रखने वाले मर्द और औरतें, पवित्र मर्द और औरतें, अल्लाह को याद करने वाले मर्द और औरतें ख़ुदा नें उन सबके लिये माफ़ी और बहुत बड़ा बदला रखा है।

    इस आयत में दस चीज़ें गिनवाई गई हैं: इस्लाम, ईमान, इबादत, सच बोलना, सब्र, अल्लाह के आगे झुकना, सदक़ा देना, रोज़ा, पवित्रता और अल्लाह को याद करना, इनमें से कोई एक चीज़ भी केवल मर्दों के लिये नहीं है बल्कि मर्दों और औरतों दोनों के लिये बयान की गई हैं, मर्दों के साथ औरतों को भी शामिल किया गया है।

    एक दूसरी आयत में फ़रमाता है:

    ’’مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَى وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُواْ يَعْمَلُونَ‘‘

    तुम में जो भी अच्छे काम करेगा चाहे वह मर्द हो या औरत हो अगर वह मोमिन है तो हम उसे एक पाक ज़िन्दगी भेंट करेंगे और उनको उनके कामों से अच्छा बदला देंगे

    क़ुरआन की नज़र में यहाँ मर्द और औरत दोनों बराबर हैं शर्त केवल एक है और वह है ईमान। (http://www.taqrib.info/hindi/)