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    4- इमामत

    4- इमामत
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    इमामत का शब्दार्थ है, कि कोई किसी के सामने था और वह उन लोगों को सही पथ निर्दशन कर रहा था। या उन लोगों को दिनी, राजनिती, या एक समाजिक़ काम का दायित्व लिया था और दूसरों ने उन को अनुशरण किया था।

    इस कथा पर ध्यान देना बहूत अबशक है, कि इमाम शब्दार्थ (इमाम) शियों के दृष्ट में एक मंसवी है, यानी इसका ततपर्य अल्लाह की तरफ़ से इन्तेसाब, ना लोगों की तरफ़ से। इन्तेंख़ाब. जैसा ख़ुदा वन्दे आलम पैग़म्बरे अकरम (स.) को परिचित किया है। और यह विशेष स्थान अल्लाह की तरफ़ से आपने विशेष वन्दे को दायित्व देता है। इस अध्याय में मात्र दो विषय की तरफ़ इगींत किया जाए गा।

    1- इमाम का होना ज़रुरी है।

    2- इमाम अल्लाह की तरफ़ से निर्वाचन होता है।

    इमाम का होना ज़रुरी है

    बड़ी दिक़्कत और गौर फ़िक्र करने के बाद मालूम हुआ है कि अमंबिया व नबीयों को भेजना बहूत ज़रुरी है। और इस के साथ साथ हम सब को इमाम (अ) की अबशक के लिए आगाह कराता हैं।

    क्योंकि यह कथा परिष्कार है कि प्रत्येक चीज़ को चलाने के लिए चाहे वह मद्दि हो या मानबी, एक नेता का होना बहूत ज़रुरी है। और वह नेता व इमाम समस्त प्रकार चीजों के सम्पर्क में ज्ञान रख़ता हो, क्योंकि एक चीज़ चलाने के लिए अगर सही तरीके चलाने ना पाए या सही रह्बर न हो. संम्भव है की एक ख़राब और पथ भ्रष्ट की रास्ते की तरफ़ लोगों को पथ प्रदर्शन करे जिस कारण पर एक कौमी शक्ति को ख़ुबैठे और आपने अस्ल मक़सद में पहूँच ना पाए। अगरचे ख़ुदा वन्दे आलम आपने वन्दों को एक क़ुवती फिक्र के माध्यम इंसान को तैयार किया है। और पैग़म्बरे व आम्बिंया को उस इंसान के लिए भेजा गया है। लेकिन इंसानों को आपने सही रास्ते से हट जाना और उस के उपर किसी चीज़ का प्रभाब फ़ैलना एक विशेष शर्त व शरायेत के साथ होता है. ज़मान व मकान, और ज़ालिम व जाबिर हाकिम का एक कारण बनना है। जिस कारण से वह आपने सही रास्ता को ख़ो बैठ कर साअदत व कामियाबी का पथ भूल कर एक पराजय पथ को क़बूल करने पर असहाय हो जाता है। (14)

    फक़त व फक़त मासूम (अ) के लिए संभव है कि एक समाज को गुमराही से परीत्रान दिला कर सही पथ की तरफ़ निर्देश प्रदान करे।

    इमाम व मासूम (अ) का उपस्थित होना मिसले पैग़म्बरे अकरम (स.) की तरह एक मुकम्मल खल्क़ है। छोटे श्बदों में यह कहा जाएं कि इमाम एक ऐसा नेता और रह्बर है जो समस्त प्रकार मुस्लमानों के नेता, दीनी रह्बरी, राजनिती और समाज व मुआशिरा के लोगों के लिए एक उलगू और इंसानों के लिए पृथ्वी व आख़रत की उन्नती का कारण है। चूकीं इमाम (अ) का उपस्थित होना मद्दि व मानबी का उन्नती की पहचान है, और पृथ्वी व आखिरत में साआदत व विजयी का दायित्व है, क्योंकि इमाम (अ) अल्लाह के फै़ज़ से सम्पर्क रख़ते है।