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    4- इमाम हज़रत ज़ैनुल अबेदीन (अ)

    4- इमाम हज़रत ज़ैनुल अबेदीन (अ)
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    हज़रत अली इब्नूल हुसैन ज़ैनुल अबेदीन (अ) इमाम हुसैन (अ) के पुत्र, आपकी माता (शहर बानो) बादशाह यज़्द गिर्द ईरान की पुत्रि थीं, जैसा कहा जाता है कि आप जुमेंरात के दिन 5शाबान. हिजरी सन 38 या जुमेंरात 15 जमादिउल अव्वल 36 हिजरी सन, जिस दिन हज़रत अली (अ) ने बस्रा को विजय के प्राप्त किया, उसी दिन आपने मदीना मनव्वरह में क़दम रखा और 12 मुहर्रम या कुछ रिवायेत के मुताबिक 25 मुहर्रम 95 हिजरी सन, ज़हर से शहीद कीए गये। (18) हलाकिं आपकी उम्र मुबारक मात्र 57 या कुछ रिवायत के मुताबिक़ 59 साल थे।

    आपके मुबारक देह मुतह्हर को इमामें वक़्त, मासूम, हज़रत इमाम बाक़िर (अ) के ज़रीए शहरे मदीना क़बरस्ताने बक़ी में आप के चाचा इमाम हसने मुज़्तबा (अ) के निकट दफ़न किया गया।

    आप ज्ञानीयों में ज्ञानी- फज़ीलत व गुणावली में आप आपने यूग के बिनज़ीर थें। हमारे बहुत सारे बड़े बड़े आलिमों ने बहुत सारी रिवायेत व दोआऐं नक़ल की है। (19) कि अन्धेरी रात में अपना चेहरा-ए मुबारक को कपड़े से छुपाते थे ताकि कोई आपके चेहरेए मुबारक को देख़ न पाए। और सोने व चांदी या ख़ाने का थैला भर कर काधों पर उठा कर ग़रीब व नचार व्यक्तियों के दर्वाज़े पर रखके आते थे. आपकी शहादत के बाद मदीने के समस्त प्रकार व्यक्ति व आपके चाहने वाले समझ गये कि चेहरे पर निक़ाब देने वाला और काधों पर ख़ाने का थैला उठाने वाला ग़रीब-दुखी-यतीम के दस्तरख़ान पर बैठने वालें कौन थें।

    आपके सदाचार में से एक आचरण यह है. कि आप प्रत्येक महीने में एक बार आपने प्रत्येक ग़ुलामों को बुला कर एक स्थान पर जमा करते थे और उन लोगों से कहते थे, कि अगर तुम में से कोई बिवाह करना चाहे तो उस का बिवाह करा दुँगां, और कोई दूसरों के निकट आपने को बेचना चाहता हो तो बेचं दुँगां, अगर कोई आज़ाद होना चाहता हो तो कर आज़ाद कर दुंगा, अगर कोई आप से आज़ाद होने के लिए अवेदन करता तो आप फरमाते थें शाबास तुम मुझ को जन्नत में पहुंचाओ गे।

    हज़रत इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ) सिजदा को इस क़द्र तूल देते थें कि आपकी उपाधी पड़ गया था (سجاد) यानी बहुत ज़्यादा सिजदा करने वाला. और सिजदा करने के कारण आपकी पेशानीये मुबारक पर सिजदे का एक गठ्ठा पड़ गया था और आप के दोनों हाथ की हाथेली और दोनों ज़ानु से सूजनआ फुल गयी थी, आप इस तरह से इबादत किया करते थें कि आप को (زين العابدين) ज़ैनुल अबेदीन कहा जाता था यानी इबादत करने वालों की ज़ीनत।

    जब आप नमाज़ पढ़ने के लिए मुसल्ले पर ख़ड़े होजाते थे तो अल्लाह के डर से शरीर काँप लादता था और चेहरा-ए मुबारक लाल हो जाते थे।

    एक व्यक्ति आप को कुछ बुरे नाम से पूकारा, आप ख़ामोश रहे और कुछ देर के बाद आप उसकी तरफ गये सभा के उपस्थित रहने वालों ने गुमान किया कि आप उसका उत्तर देगें,लेकिन आपने उस भाषा की विरोध में क़ुरआन मजीद की एक अयेत पढ़ी, जिसमें कहा गया है

    والکاظمين الغيظ والعافين عن الناس والله يحب المحسنين

    जो व्यक्ति आपने गुस्से को पी जाता है, और लोगों की ग़लतीयों को क्षमा करता है, अल्लाह उन सदाचार काम करने वालों को दोस्त रख़ता है।

    उस के बाद आपने उस व्यक्ति से कहाः ऐ भाई तुम हमारे सामने ख़ड़े हो और तुम ने कहा….. और कहा…… अगर तुम सच बोलते हो इस का माना यह है कि यह गुणावली हमारे भीतर उपस्थित है, और मैं ख़ुदा से क्षमा मांगता हुँ। और अगर झूट बोलते हो जो हमारे अन्दर उपस्थित नहीं है, तो मैं तुमहारे लिए ख़ुदा से क्षमा प्रर्थना करता हूँ।