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    (4) ख़ुदा और रसूल पर बोहतान बाँधना-

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    (1605) अगर रोज़े दार ज़बान से या लिख कर या इशारे से या किसी और तरीउल्टी से अल्लाह तआला या रसूल अकरम (स0) या आपके (बरहक़) जानशीनों में से किसी से भी जान बूझ कर कोई झूटी बात मंसूब करे तो अगरचे वह फ़ौरन कह दे कि मैं ने झूट कहा है या तोबा कर ले तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर उस का रोज़ा बातिल है और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स0) और तमाम अम्बिया व मुर्सलीन और उन के जानशीनों से भी कोई झूटी बात मंसूब करने का यही हुक्म है।

    (1606) अगर (रोज़े दार ) कोई ऐसी रिवायत नक़्ल करना चाहे जिस के क़तई होने की दलील न हो और उस के बारे में उसे इल्म न हो कि यह सच है या झूट तो एहतियाते वाजिब की बिना ज़रूरी है कि जिस शख़्स से वह रिवायत हो या जिस किताब में लिखी देखी हो उस का हवाला दे।

    (1607) अगर रोज़े दार किसी चीज़ के बारे में एतेक़ाद रखता हो कि वह वाउल्टीई क़ौले ख़ुदा या क़ौले पैग़म्बर (स0) है और उसे अल्लाह तआला या पैग़म्बर (स0) से मंसूब करे और बाद में मालूम हो कि यह निसबत सही नही थी तो उस का रोज़ा बातिल नही होगा।

    (1608) अगर रोज़े दार किसी चीज़ के बारे में यह जानते हुये कि झूट है उसे अल्लाह और रसूले अकरम (स.) से मंसूब करे और बाद में पता चले कि जो कुछ उस ने कहा था वह दुरुस्त था तो एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि रोज़े को तमाम करे और उस की क़ज़ा भी बजा लाये।

    (1609) अगर रोज़े दार किसी ऐसे झूट को जो किसी रोज़े दार ने नही बल्कि किसी दूसरे ने घड़ा हो जान बूझ कर अल्लाह तआला या रसूले अकरम (स0) या आपके (बर हक़) जानशीनों से मंसूब कर दे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उस का रोज़ा बातिल हो जायेगा लेकिन अगर जिस ने झूठ घड़ा हो उसका क़ौल नक़्ल करे तो कोई हरज नही।

    (1610) अगर रोज़े दार से सवाल किया जाये कि क् रसूले अकरम (स0) ने ऐसा फ़रमाया है और वह अमदन जहाँ जवाब नही देना चाहिए वहाँ जवाब दे और जहाँ इस्बात में देना चाहिये वहाँ अमदन नफ़ी में दे तो एहतियाते लाज़िम कि बिना पर उस का रोज़ा बातिल हो जाता है।

    (1611) अगर कोई शख़्स अल्लाह तआला या रसूले करीम (स0) का क़ौल दुरूस्त नक़्ल करे और बाद में कहे कि मैं ने झूठ कहा है या रात को कोई झूठी बात उन से मंसूब करे और दूसरे दिन जबकि रोज़े से हो तो कहे कि जो मैं ने रात कहा था वह सही है उस का रोज़ा बातिल हो जाता है लेकिन अगर वह रिवायत के (सही या ग़लत होने के) बारे में बताये तो उस का रोज़ा बातिल हो जाता है।