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    (5) ग़ुबार को हलक़ तक पहुँचाना

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    (1612) एहतियात की बिना पर कसीफ़ ग़ुबार का हलक़ तक पहुचाना रोज़े को बातिल कर देता है चाहे ग़ुबार किसी ऐसी चीज़ का हो जिस का खाना हलाल हो मसलन आटा या किसी ऐसी चीज़ को हो जिस का खाना हराम हो मसलन मिट्टी।

    (1613) अक़वा यह है कि ग़ैरे कसीफ़ ग़ुबार को हलक़ तक पहुँचाने से रोज़ा बातिल नही होता।

    (1614) अगर हवा कि वजह से कसीफ़ ग़ुबार पैदा हो और इंसान मुतवज्जेह होने और एहतियात कर सकने के बावुजूद एहतियात न करे और ग़ुबार उस के हलक़ तक पहुँच जाये तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उस का रोज़ा बातिल हो जाता है।

    (1615) एहतियाते वाजिब यह है कि रोज़े दार सिगरेट और तम्बाकु वग़ैरा का धुआँ भी हलक़ तक न पहुँचाये।

    (1616) अगर इंसान एहतियात न करे और ग़ुबार वग़ैरा हलक़ में चला जाये तो अगर उसे यक़ीन या इत्मिनान था कि यह चीज़ हलक़ तक न पहुचेंगीं तो उस का रोज़ा सही है लेकिन अगर उसे गुमान था कि यह हलक़ तक नहीं पहुँचेंगीं तो बेहतर यह है कि उस रोज़े की क़ज़ा बजा लाये।

    (1617) अगर कोई शख़्स यह भूल जाने पर कि रोज़े से है एहतियात न करे या बेइख़्तियार ग़ुबार उस के हलक़ में पहुँच जाये तो उस का रोज़ा बातिल नही होता।