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    (7) अज़ाने सुबह तक जनाबत, हैज़ व निफ़ास की हालत में रहना-

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    (1628) अगर जुनुब(सम्भोग किया हुआ) शख़्स माहे रमज़ान में जान बूझ कर अज़ाने सुबह तक ग़ुस्ल न करे तो उसका रोज़ा बातिल है और जिस शख़्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो और वह जान बूझकर तयम्मुम न करे तो उसका रोज़ा भी बातिल है और माहे रमज़ान के क़ज़ा रोज़े का हुकम भी यही है।

    (1629) अगर जुनुब शख़्स(सम्भोग किया हुआ)माहे रमज़ान के रोज़ों और उन की क़ज़ा के अलावा उन वाजिब रोज़ों में जिन का वक़्त माहे रमज़ान की तरह मुऐय्यन है जान बूझ कर अज़ाने सुबह तक ग़ुस्ल न करे तो अज़हर यह है कि उसका रोज़ा सही है।

    (1630) अगर कोई शख़्स माहे रमज़ानुल मुबारक की किसी रात में जुनुब हो जाये तो अगर वह अमदन ग़ुस्ल न करे हत्ता कि वक़्त तंग हो जाये तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और रोज़ा रखे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस की क़ज़ा भी बजा लाये।

    (1631) अगर शख़्स माहे रमज़ान में ग़ुस्ल करना भूल जाये और एक दिन के बाद याद आये तो ज़रूरी है कि उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे और अगर चंद दिनों के बाद याद आये तो इतने दिनों के रोज़ों की क़जा करे जितने दिनों के बारे में उसे यक़ीन हो कि वह जुनुब था। मसलन अगर उसे यह इल्म न हो कि तीन दिन जुनुब रहा या चार दिन तो ज़रूरी है कि तीन दिन के रोज़ों की कज़ा करे।

    (1632) अगर एक ऐसा शख्स अपने को जुनुब कर ले जिस के पास माहे रमज़ान की रात में ग़ुस्ल और तयम्मुम में से किसी के लिए भी वक़्त न हो तो उस का रोज़ा बातिल है और उस पर क़ज़ा और कफ़्फारा दोनों वाजिब हैं।

    (1633) अगर रोज़े दार यह जानने के लिए जुस्तुजू करे कि उस के पास वक़्त है या नही और गुमान करे कि उस के पास ग़ुस्ल के लिए वक़्त है और अपने आप को जुनुब कर ले और बाद में उसे पता चले कि वक़्त तंग था और तयम्मुम करे तो उस का रोज़ा सही है और अगर बग़ैर जुस्तुजू किये गुमान करे कि उस के पास वक़्त है और अपने आप को जुनुब कर ले और बाद में पता चले कि वक़्त तंग था और तयम्मुम कर के रोज़ा रखे तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे।

    (1634) जो शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और जानता हो कि अगर सो जायेगा तो सुबह तक बेदार न होगा उसे बग़ैर ग़ुस्ल किये नही सोना चाहिये और अगर वह ग़ुस्ल करने से पहले अपनी मर्ज़ी से सो जाये और सुबह तक बेदार न हो तो उस का रोज़ा बातिल है और उस पर क़ज़ा व कफ़्फ़ारा दोनों वाजिब हैं।

    (1635) जब जुनुब माहे रमज़ान की रात में सो कर जाग उठे तो एहतियाते वाजिब यह है कि अगर वह बेदार होने के बारे में मुतमइन न हो तो गुस्ल से पहले न सो अगरचे इस बात का एहतेमाल हो कि अगर दोबारा सो गाया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा।

    (1636) अगर कोई शख़्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और यक़ीन रखता हो कि अगर सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और उस का मुसम्मम इरादा हो कि बेदार होने के बाद ग़ुस्ल करेगा और इस इरादे के साथ सो जाये और अज़ान तक सोता रहे तो उस का रोज़ा सही है। और अगर कोई शख्स सुबह की अज़ान से पहले बेदार होने के बारे में मुत्मइन हो तो उस के लिए भी यही हुक्म है।

    (1637) अगर कोई शख्स माहे रमज़ान की रात में जुनुब हो और उसे इल्म हो या एहतेमाल हो कि अगर सो गया तो अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और वह इस बात से ग़ाफ़िल हो कि बेदार होने के बाद उस पर ग़ुस्ल करना ज़रूरी है तो इस सूरत में जब कि वह सो जाये और सुबह की अज़ान तक सोता रहे एहतियात की बिना पर उस पर क़ज़ा वाजिब हो जाती है।

    (1638) अगर कोई शख्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और उसे इस बात का यक़ीन या एहतेमाल हो कि अगर सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और वह बेदार होने के बाद ग़ुस्ल न करना चाहता हो तो इस सूरत में जब कि वह सो जाये और बेदार न हो उस का रोज़ा बातिल है और क़ज़ा और कफ़्फ़ारा उस के लिए लाज़िम है। और इसी तरह अगर बेदार होने के बाद उसे तरद्दुद हो कि ग़ुस्ल करे या न करे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है।

    (1639) अगर जुनुब शख्स माहे रमज़ान की किसा रात में सो कर जाग उठे और उसे इस बात का यक़ीन या एहतेमाल हो कि अगर सो गया तो अज़ान से पहले बेदार हो जायेगा और वह मुसम्मम इरादा भी रखता हो कि बेदार होने के बाद ग़ुस्ल करेगा और दुबारा सो जाये और अज़ान तक बेदार न हो तो ज़रूरी है कि बतौरे सज़ा उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे। और अगर दूसरी नींद से बेदार हो जाये और तीसरी दफ़ा सो जाये और सुबह की अज़ान तक बेदार न हो तो ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे और एहतियात मुस्तहब की बिना पर कफ़्फ़ारा भी दे।

    (1640) जब इंसान को नींद में एहतिलाम(स्वप्न दोष) हो जाये तो पहली दूसरी और तीसरी नींद से मुराद वह नींद है जो इंसान (एहतिलाम से) जागने के बाद सोये लेकिन वह नींद जिस में एहतिलाम हुआ पहली शुमार नही होती।

    (1641) अगर किसी रोज़े दार को दिन में एहतिलाम हो जाये तो उस पर फ़ौरन ग़ुस्ल करना वाजिब नहीं।

    (1642) अगर कोई शख्स माहे रमज़ान में सुबह की अज़ान के बाद जागे और यह देखे कि उसे एहतिलाम हो गया है तो अगरचे उसे मालूम हो कि यह एहतिलाम अज़ान से पहले हुआ है उस का रोज़ा सही है।

    (1643) जो शख्स रमज़ानुल मुबारक का क़ज़ा रोज़ा रखना चाहता हो और सुबह की अज़ान तक जुनुब रहे तो अगर उस का इस हातल में रहना अमदन हो तो उस दिन का रोज़ा नहीं रख सकता और अगर अमदन न हो तो रोज़ा रख सकता है अगरचे एहतियात यह है कि रोज़ा न रखे।

    (1644) जो शख्स रमज़ानुल मुबारक के क़ज़ा रोज़े रखना चाहता हो अगर वह सुबह की अज़ान के बाद बेदार हो और देखे कि उसे एहतिलाम हो गाया है और जानता हो कि यह एहतिलाम उसे सुबह की अज़ान से पहले हुआ है तो अक़वा की बिना पर उस दिन माहे रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा की नियत से रोज़ा रख सकता है।

    (1645) अगर माहे रमज़ान के रोज़ों के अलावा ऐसे वाजिव रोज़ों में कि जिन का वक़्त मुऐय्यन नहीं है मसलन कफ़्फ़ारे के रोज़े में कोई शख्स अमदन अज़ान सुबह तक जुनुब रहे तो अज़हर यह है कि उस का रोज़ा सही है लेकिन बेहतर है कि उस दिन के अलावा रोज़ा रखे।

    (1646) अगर रमज़ान के रोज़ों में औरत सुबह की अज़ान से पहले हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाये और अमदन ग़ुस्ल न करे या वक़्त तंग होने की सूरत में अगरचे उसके इख़्तियार में हो और रमज़ान का रोज़ा हो तयम्मुम न करे तो उस का रोज़ा बातिल है और एहतियात की बिना पर माहे रमज़ान के क़ज़ा रोज़े का भी यही हुक्म है (यह उस का रोज़ा बातिल है) और इन दोनो के अलावा दिगर सूरतों में बातिल नही अगरचे अहवत यह है कि ग़ुस्ल करे। माहे रमज़ान में जिस औरत की शरई ज़म्मेदारी हैज़ या निफ़ास के ग़ुस्ल के बदले तयम्मुम हो और इसी तरह एहतियात की बिना पर रमज़ान की क़ज़ा में अगर जान बूझ कर अज़ान सुबह से पहले तयम्मुम न करे तो उस का रोज़ा बातिल है।

    (1647) अगर कोई औरत माहे रमज़ान में सुबह की अज़ान से पहले हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाये और गुस्ल के लिए वक़्त न हो तो ज़रूरी है कि तयम्मुम करे और सुबह की अज़ान तक बेदार रहना ज़रूरी नही है। जिस जुनुब शख्स का वज़ीफ़ा तयम्मुम हो उस के लिए भी यही हुकम है।

    (1648) अगर कोई औरत माहे रमज़ान में सुबह की अज़ान के नज़दीक हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाये और गुस्ल या तयम्मुम किसी के लिए वक़्त बाक़ी न हो तो उस का रोज़ा सही है।

    (1649) अगर कोई औरत सुबह की अज़ान के बाद हैज़ या निफ़ास के खून से पाक हो जाये या दिन में उसे हैज़ या निफ़ास का खून आ जाये तो अगरचे यह खून मग़रिब के क़रीब ही क्यों न आये उस का रोज़ा बातिल है।

    (1650) अगर औरत हैज़ या निफ़ास का ग़ुस्ल करना भूल जाये और उसे एक दिन या कई दिन के बाद याद आये तो जो रोज़े उस ने रखे हैं वह सही हैं।

    (1651) अगर औरत माहे रमज़ान में सुबह की अज़ान से पहले हैज़ या निफ़ास से पाक हो जाये और ग़ुस्ल करने में कोताही करे और सुबह की अज़ान तक ग़ुस्ल न करे और वक़्त तंग होने की सूरत में तयम्मुम भी न करे तो उस का रोज़ा बातिल है लेकिन अगर कोताही न करे मसलन मुनतज़िर हो कि ज़नाना हम्माम मयस्सर आ जाये चाहे उस मुद्दत में वह तीन दफ़ा सोये और सुबह की अज़ान तक ग़ुस्ल न करे और तयम्मुम करने में भी कोताही न करे तो उस का रोज़ा सही है।

    (1652) जो औरत इस्तेहाज़ा-ए- कसीरा की हालत में हो अगर वह अपने ग़ुसलों को उस तफ़सील के साथ न बजा लाये जिस का ज़िक्र मसअला न.402 में किया गया है तो उस का रोज़ा सही है। ऐसे ही इस्तेहाज़ा-ए- मुतावस्सेता में अगरचे औरत गुस्ल न भी करे, उस का रोज़ा सही है।

    (1653) जिस शख्स ने मय्यित को मस किया हो यानी बदन का कोई हिस्सा मय्यित के बदन से छूवा हो वह ग़ुस्ले मसे मय्यित के बग़ैर रोज़ा रख सकता है और अगर रोज़े की हातल में भी मय्यित को मस करे तो उस का रोज़ा बातिल नही होता।