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    (9) उल्टी करना-

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    (1655) अगर रोज़े दार जान बूझ कर उल्टी करे चाहे बीमारी वग़ैरा की वजह से मजबूरन ही ऐसा क्योँ न करना पड़े उस का रोज़ा बातिल हो जाता है। लेकिन अगर सहवन(भूले से) या बे इख़्तियार हो कर उल्टी करे तो कोई हरज नही है।

    (1656) अगर कोई शख्स रात को ऐसी चीज़ खा ले जिस के बारे में मालूम हो कि उस के खाने की वजह से दिन में बे इख्तियार उल्टी आयेगी तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे।

    (1657) अगर रोज़े दार उल्टी को रोक सकता हो और ऐसा करना उस के लिए नुक़्सान दे न हो तो बेहतर यह है कि वह उल्टी को रोके।

    (1658) अगर रोज़े दार के हलक़ में मक्खी चली जाये और वह इतनी अन्दर चलू गई हो कि उस के नीचे ले जाने को निगलना कहा जाये तो ज़रूरी नहीं कि उसे बाहर निकाला जाये और उस का रोज़ा सही है। लेकिन अगर मक्खी काफ़ी हद तक अन्दर न गई हो तो ज़रूरी है कि बाहर निकाले अगरचे उसे उल्टी करके ही निकालना पड़े मगर यह कि उल्टी करने में रोज़े दार को ज़रर व शदीद तकलीफ़ न हो। और अगर वह उल्टी न करे और उसे निगल ले तो उस का रोज़ा बातिल हो जायेगा।

    (1659) अगर रोज़े दार सहवन (भूले से) कोई चीज़ निगल ले और उसके पेट में पहुँचने से पहले उसे याद आ जाये कि रोज़े से है तो उस चीज़ का निकालना लाज़िम नहीं और उस का रोज़ा सही है।

    (1660) अगर किसी रोज़े दार को यक़ीन हो कि डकार लेने की वजह से कोई चीज़ उस के हलक़ से बाहर आ जायेगी तो एहतियात की बिना पर उसे जान बूझ कर डकार नही लेनी चाहिए लेकिन अगर उसे ऐसा यक़ीन न हो तो कोई हरज नही है।

    (1661) अगर रोज़े दार डकार ले और कोई चीज़ उस के हलक़ या मुंह में आ जाये तो ज़रूरी है कि उसे उगल दे और अगर वह चीज़ बेइख़्तियार पेट में चली जाये तो उसका रोज़ा सही है।