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    एक और आशूरा

    एक और आशूरा

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    एक और आशूरा
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    एक बार फिर मुहर्रम और आशूरा आने वाला है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत (बलिदान) से लेकर आज तक हज़ार से ज़्यादा बार आशूरा आ चुका है और हर बार मकतबे आशूरा की नई तालिमात बयान और आपके मानने वालों के सामने पेश की जाती हैं और इस तरह यह इंकेलाब (क्राँति) आज तक ज़िन्दा है और इस की चमक से आँखें चकाचौन्ध हैं। तमाम क़ौमें इस दिन में शहीद होनी वाली शख़्सीयत के सामने अपने सरों को झुकाती हैं और इस मकतब के मानने वाले अपनी दुनिया व आख़िरत के लिये ज़ादे राह (मार्ग व्यय) इकठ्ठा करते हैं।

    यह बात ज़हन में रहनी चाहिये कि आशूरा ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं। हमारे पुर्वजों और सैयदुश शोहदा अलैहिस्सलाम के मानने वालों की ख़िदमात (सेवाओ) व फ़िदाकारी का नतीजा है जो आशूरा का मकतब और उसके संस्कार अपने पवित्र मक़सद (लक्ष्य) और ज़ुल्म के आगे न झुकने के साथ हम तक पहुच सके हैं।

    हम उस वक्त ख़ुद को आशूरा वाला कह सकते हैं जब हम उसकी राह में उसके मक़सद को पूरा करने की ख़ातिर किसी भी तरह की कोशिशों से न बचें और इस हुसैनी अमानत, बल्कि अमानते इलाही को सही सालिम, असरदार और हर तरह की तहरीफ़ (फेर बदल) से बचा कर अपनी आने वाली नस्लों तक पहुचायें। हाँ यह काम उस वक़्त पूरा हो सकता है जब हममें से मैं और तुम ख़त्म हो जाये और सिर्फ़ हमारा मक़सद अल्लाह हो जाये।

    आशूरा और जो चीज़ें भी उसे ज़िन्दा करती हैं, उसकी ख़िदमत (सेवा) करना अहले बैत (अ) के मानने वालों का पहली ज़िम्मेदारी होनी चाहिये। हाँ बात वाज़ेह है कि आशूरा और उससे वाबस्ता मकतब के लिये बहुत सी सख़्तियाँ हैं लेकिन इन सख़्तियों का सवाब (पुन्य) उससे बढ़ कर होगा जितना हम तसव्वुर कर सकते हैं।

    जिन लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की राह में नेकिया और ख़िदमतें अँजाम दी हैं, ज़हमतें, तकलीफ़ें बर्दाश्त की हैं उनके वह काम नूर के कलिमात (अक्षर) और हुरूफ़ से लिखे जायेगें। दूसरी तरफ़ जिन लोगों ने भी छोटे से छोटा ज़ुल्म (अत्याचार) भी इमाम हुसैन (अ) या अज़ादारी के मुक़ाबले में किया है या करते हैं, उनके काम और नाम आग के हर्फ़ों से लिखे जायेगें।

    जो लोग इमाम हुसैन (अ) की अज़ादारी को अच्छा नही कहते थे जैसे, तुम्हारी ज़िम्मेदारी नही है, छोड़ों ख़ुद ही कर लेगें, या यह कि मर्द ने अपनी बीवी को या बीवी ने शौहर को या भाई ने भाई को या पड़ोसी ने पड़ोसी को उससे रोका हो और जिसने भी जिस तरह से भी अज़ादारी का राह में रुकावट डाली होगी, सब लिखे जा चुके हैं और लिखे जा रहे हैं।

    अल्लाह के इंसाफ़ का डर

    अल्लाह की कोई भी सिफ़त डराने वाली नही है, न उसकी रहमानीयत में डर है न ही रऊफ़ियत व रज़्ज़क़ियत व ग़फ़्फ़ारियत में, दुआ ए जोशने कबीर में अल्लाह के हज़ार नाम और सिफ़ात बयान हुए हैं जिसमें से सिवाए अदल (न्याय) के किसी में डर नही है। हाँ इस तरह की कुछ दूसरी सिफ़तों का ज़िक्र भी हुआ है मगर वह सब अदल (इंसाफ़) ही की तरफ़ पलटती हैं, इसलिये उसके अदल (इंसाफ़) से डरना चाहिये।

    अगर अल्लाह हमारी नेकियों और अच्छे आमाल (कर्मों) का बारीकी से हिसाब करे और ज़र्रा बराबर भी न छोड़े तो बहुत ख़ुश करने वाली बात है लेकिन अगर वह गुनाह (पाप) का इसी तरह हिसाब कर ले तो ज़ाहिर है कि गुनाहगार (पापी) इंसान की क्या हालत होगी। यह भी मालूम होना चाहिये कि अल्लाह इंसान को सिर्फ़ एक बार नही जलायेगा ताकि उसका काम हो जाये बल्कि मौत और मुसीबत की हज़ारों वजहें जमा होगीं और इंसान को अपने घेरे में ले लेगीं फिर भी वह मरेगा नही बल्कि अज़ाब (पाप का सज़ा) झेलता रहेगा। क़ुरआने करीम में जहन्नम के बारे में ऐसी चीज़ें बयान हुई हैं कि अगर इंसान ज़र्रा बराबर भी फ़िक्र करे तो उसकी रातों की नींद उसकी आँखों से उड़ जायेगी। (و یاتیہ الموت من کل مکان وما ھو بمیت) और मौत हर तरफ़ से उसे घेर लेगी उसके बावजूद वह मरेगा नही।

    इस ख़्याल में न रहें कि जिस के पास खाने को कुछ नही है या जो लोग जेलों में हैं सज़ायें काट रहे हैं बेचारे हैं इसलिये कि वह एक दिन जेल से और भूखा एक दिन भूख से रिहाई पा जायेगा। बेचारा वह है जो अदले इलाही (अल्लाह की अदालत) में फँस जाये और अल्लाह उसे माफ़ न करे।

    जब इंसान का नाम ए आमाल (कर्म) अल्लाह के पास जाता है। तो जितने भी छोटे बड़े गुनाह (पाप) जहाँ कहीं जिससे भी होते हैं सब उसमें लिखा होता है।

    इस हिसाब किताब में सिर्फ़ वही कामयाब होगा जिसका नाम ए आमाल (कर्म) नेकियों से भरा होगा। उनमें से बेहतरीन लोग वह होगें जिन्होने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की राह में ज़हमते कीं होगीं, थके होगें, इसलिये कि अगर यह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के लिये न होता तो वह यह सख़्तिया बरदाश्त न करते।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का मक़ाम व मरतबा इतना बुलंद है कि बुज़ुर्ग उलामा और बुज़ुर्गाने शहर उसमें शिरकत और ख़िदमत (सेवा) करना फ़ख़्र (गर्व) समझते हैं। जैसे हर साल कर्बला में आशूर के दिन मातमी दस्ते अज़ा ए तूरीज[1] के नाम से जुलूस निकालते थे जिसमें सैयद बहरूल उलूम[2] शरीक होते थे। आप फ़रमाते थे मैने इमाम ज़माना (अज्जल्लाहो फरजहुश शरीफ़) को इसमें देखा है। यह मातमी दस्ता जब तक मैं कर्बला (33 साल पहले) में था हर साल जुलूस उठाता था, हज़ारों लोग इसमें शिरकत करते थे और नंगे पैर दौड़ते और मातम करते थे। मैंने अकसर मराजे ए तक़लीद (शियों के सबसे बड़े धर्म गुरु) को देखा है कि वह नंगे पैर सर पीटते हुए या हुसैन या हुसैन करते थे। इसमें शरीक होने वालो में वज़ीर, वकील और रईस लोग शामिल हैं।

    यह लोग अपने क़रीबी रिश्तेदारों के मरने पर भी ऐसा नही करते थे और उनकी सारी ज़िन्दगी ग़ुज़र जाती मगर वह कभी भी ऐसा नही करते। ख़ुश नसीब हैं वह लोग, ख़ुश नसीब…..।

    अज़ादाराने हुसैनी

    इमाम हुसैन (अ) के अज़ादार अपनी अज़ादारी के ज़रिये पैग़म्बरे इस्लाम (स) को ताज़ियत (पुरसा) पेश करते थे और उनके ग़म में शिरकत करते हैं, इमाम सादिक़ (अ) इस बारे में फ़रमाते हैं।[3]

    अगर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ज़िन्दा होते तो हम उन्हे ताज़ियत (पुरसा) पेश करते।

    हम तसव्वुर नही कर सकते कि आशूरा के दिन इमाम हुसैन (अ) के क़ल्बे नाज़नीन पर क्या गुज़री। हरगिज तसव्वुर नही कर सकते। कभी इंसान के ज़हन में ख़्यालात आते हैं मगर फिर भी वह तसव्वुर नही कर सकता। हमें यह नही कहना चाहिये कि इमाम को मज़बूत और सब्र करने वाला होना चाहिये, यक़ीनन इमामे मासूम दुनिया में सबसे ज़्यादा अहम और सबसे ज़्यादा अक़लमंद होते हैं, उनका दिल तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा मज़बूत होता है और इसी तरह उनमें मेहरबानी भी सबसे ज़्यादा होती है और वह उन्हे कंटोल करने में भी महारत रखते हैं।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स) के बेटे इब्राहीम जो डेढ़ साल के थे, जब उनका इंतेक़ाल हुआ आप की आँखो से आँसू जारी हो गये और आप इतनी शिद्दत से रो रहे थे कि आपकी रीशे (दाढ़ी) मुबारक हिल रही थी। असहाब ने अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के नबी, आप हमें सब्र करने को कहते हैं लेकिन आप ख़ुद इस तरह से रो रहे हैं तो आपने फ़रमाया: जब दिल तड़पता है तो आँखो से आँसू निकल ही पड़ते हैं।[4]

    पैग़म्बरे इस्लाम (स) जिन्होने सिर्फ़ एक अठ्ठारह महीने के बेटे को खोया था इस तरह उसके ग़म में रो रहे थे जबकि इमाम हुसैन (अ) ने आशूर के दिन अपने अज़ीज़ (रिश्तेदार) व अंसार (दोस्त) सब को अल्लाह की राह में क़ुरबान कर दिया जिनमें हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास जैसी शख़्सियतें शामिल हैं। अगर उन्हे आम लोगों की हिसाब करें तो यक़ीनन वह एक एक इंसान थे मगर यह बात नही भूलनी चाहिये कि वह आम लोग नही थे और उनमें से अकसर इमामत व इस्मत की आग़ोश के पले थे और वफ़ादारी व बुज़ुर्गी में इमामे मासूम के बाद सबके सरदार थे, उनकी मिसाल इस दुनिया में नही मिल सकती, बल्कि उनकी सच्चा तारीफ़ भी हमारे लिये मुम्किन नही है।

    कुछ घंटों में इमाम हुसैन (अ) के दिले नाज़नीन पर इस क़दर मुसीबतें पड़ी और आप ने सब्र किया।

    अल्लाह इन मुसीबतों का गवाह था उसने सब्र किया इसलिये कि वह बहुत सब्र करने वाला है। एक दिन वह भी आयेगा कि अल्लाह भी उस दिन अपनी हिकमत के मुताबिक़ सब्र नही करेगा और वह दिन उसके इंसाफ़ का दिन होगा, उस दिन इंतेक़ाम लिया जायेगा।

    क़ातिलाने इमाम हुसैन (अ)

    किताब कामिलुज़ ज़ियारत (शियों की एक मोतबर किताब) में ज़िक्र हुआ है कि जो लोग भी इमाम हुसैन (अ) के क़त्ल में शरीक थे, इन तीन बीमारियों में से एक में ज़रूर फँसेंगें, दीवानगी, बर्स और कोढ़।[5]

    उसी हदीस में है कि यह बीमारियाँ उनकी नस्ल में भी मुन्तक़िल हुई हैं जैसे उनके बेटे, बेटियाँ, पोते सब इसमें मुब्तला हुए। जबकि उनका कोई क़ुसूर नही था और ऐसा नही होना चाहिये था लेकिन हमें यह जानना चाहिये कि यह इत्तेफ़ाक़ क़ातिलाने इमाम हुसैन (अ) के अमल (कर्म) का असरे वज़ई है। जैसे अगर कोई बाप शराबखोर हो तो उसकी नस्ल पर भी असर पड़ता है। अगर बाप बुरा हो तो उसकी नस्ल पर भी असर पड़ता है। यह एक तकवीनी मसला है।

    उसी किताब में आया है कि तमाम क़ातिलाने इमाम हुसैन (अ) क़त्ल किये गये और कोई भी अपनी मौत से नही मरा। इमाम सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं कि उनमें से सब क़त्ल किये गये।[6] लेकिन उनका क़त्ल हो जाना काफ़ी नही है और अल्लाह इतने पर बस नही करेगा इसलिये कि इमाम हुसैन (अ) को अल्लाह ने बहुत ऊचा मक़ाम दे रखा है और ऐसी वारदात के इंतेक़ाम के लिये मौत काफ़ी नही है। यह एक ऐसी बात है जिसका शिया, सुन्नी, ईसाई सब ऐतेराफ़ करते हैं।

    काबा का इफ़्तेखार और कर्बला की मंज़िलत

    अल्लाह ने काबे की निसबत अपनी तरफ़ दी है इसलिये वह उसका घर कहा जाता है हालाँकि यह इज़ाफ़त ऐज़ाज़ी व इज़ाफ़ी है इसलिये कि अल्लाह का कोई मकान नही है और उसे मकान की ज़रूरत भी नही है। लेकिन फिर भी उसने उस इलाक़े को ज़मीन की गहराईयों से लेकर आसमान की बुलंदियों तक के लिये शराफ़त अता की है और उसे अपने नाम से मनसूब किया है।

    काबा, अज़मत व शराफ़त की उस मंज़िल पर पहुँच गया कि अल्लाह ने उसको मोहतरम क़रार दिया है और उसकी ज़ियारत करने वालों को हुक्म दिया है कि शहरे मक्का और उस घर में दाख़िले के लिये अपने कपड़ों को उतार कर फेक दो और एहराम (हज के मख़सूस कपड़े) के साथ दुनिया की बहुत सी जायज़ लज़्ज़तों को छोड़ कर इसमें दाख़िल हो जाओ। एक दिन काबे ने दूसरी ज़मीनों से कहा: मैं तुमसे ज़्यादा बेहतर हूँ।[7] इस तरह उसने अपनी बेहतरी का ज़िक्र किया है। हदीस में आया है कि अल्लाह ने काबा से कहा: ख़ामोश हो जाओ, तुम से ज़्यादा बेहतर और बा फ़ज़ीलत कर्बला है।[8]

    अल्लाह ने काबा को अपना घर क़रार दिया है। लेकिन कर्बला क्या है? कर्बला में क्या ख़ुसूसियत है? दूसरी ज़मीनों ने कर्बला से कहा: तुम्हारी क्या राय है कर्बला ने कहा: यह ख़ूबी मेरे अल्लाह ने मुझे दी है वर्ना मैं ख़ुद कुछ नही हूँ।

    काबा की ‘मैं’ और कर्बला के जवाब का मक़सद ढ़ूढ़ना चाहिये। यह बात इसलिये बयान हुई है कि ताकि मक़ामे अमल में ख़ुद को कुछ नही समझना चाहिये और इस राह में जो भी काम अँजाम दें उसको अल्लाह की इनायत समझना चाहिये।

    अगर मजलिस करने में कामयाब होते हैं तो इमाम हुसैन (अ) के लिये काम अँजाम देना चाहिये और इस राह में थकान महसूस नही करनी चाहिये, अज़ादारी मे शिरकत करके कहना चाहिये अल हम्दुलिल्लाह कि अल्लाह ने हमें तौफ़ीक़ दी। अल हम्दुलिल्लाह कि इमाम हुसैन ने हम पर लुत्फ़ किया। अल्लाह की तौफ़ीक़ हुई जो हमने इमाम हुसैन (अ) की राह में यह थकन बर्दाश्त की।

    आशूरा का सदक़ा

    बहुत सी चीज़ें जो हमारे मज़हब में बची हुई हैं वह इमाम हुसैन (अ) की क़ुरबानी का सदक़ा है। अगर इंसानियत, बन्दगी, दोस्ती, दूसरों की ख़िदमत, कमज़ोरों पर मेहरबानी, मज़लूमों की तरफ़दारी का जज़्बा हम में पाया जाता है तो यह सब इमाम हुसैन (अ) के आशूरा के क़याम का नतीजा है। यही वजह है कि उस यादगार को भूलना नही चाहिये बल्कि उसकी हिफ़ाज़त के लिये जितना भी हो सके जमा करें ताकि हमेशा की बुलंदी अपने लिये और अपनी नस्ल के लिये हासिल कर सकें।

    हम अपनी ज़िन्दगी में ढ़ेरों पैसे ख़र्च करते हैं, लेकिन यह समझना चाहिये कि जो पैसा इमाम हुसैन (अ) की राह में ख़र्च होंगा, वह सबसे बेहतर होगा। हम ज़िन्दगी में किस क़दर दिमाग़ खर्च करते हैं? बीवी, बच्चो, घर, पेशा, काम…में। लेकिन अपना ज़हन हम जिस क़दर इमाम हुसैन (अ) की राह में ख़र्च करेंगें उसकी क़ीमत और अहमीयत उतनी ही ज़्यादा होगी। यह भी जानना चाहिये कि जो भी क़दम इस ख़ानदान की राह में उठेगा, उसका बदला अहले बैत (अ) से मिलेगा।

    इमाम हुसैन (अ) के ज़ाकिर का ईनाम

    दो बुज़ुर्ग आलिम थे एक मजलिस वग़ैरह में ज़्यादा लगे रहते थे और किसी भी तरह की ख़िदमत से चाहे माली हो या ज़बानी, पीछे नही रहते थे, लेकिन दूसरे इन चीज़ों की तरफ़ ज़्यादा तवज्जो नही देते थे। आख़िर कार दोनो का इंतेक़ाल हुआ, उनके इंतेक़ाल को चंद साल हो चुके हैं। वह आलिम जो इमाम हुसैन (अ) के ख़ादिम थे, उन्होने यह ईनाम पाया कि उनके बच्चे, पोते, सारी दुनिया में फैले हुए हैं और सब कोई मुअल्लिफ़, कोई उस्ताद और कोई मरज ए तक़लीद है। लेकिन दूसरे आलिम का कोई भी नाम व निशान बाक़ी नही है। यह एक की ख़िदमत और दूसरे की बे तवज्जोही का नतीजा है। इसलिये इमाम हुसैन (अ) के मतकब की जो भी ख़िदमत करेगा यक़ीनन वह उसका सिला पायेगा।

    इस तरह के हज़ारो नमूने मौजूद हैं, जिनको अहले बैत (अ) की तरफ़ से इसका सिला मिला है, हम उनमें से कुछ का ज़िक्र करेंगें। हाँ यह भी मुमकिन है कि आप में से हर किसी ने अपनी या अपनी किसी करीबी इंसान की ज़िन्दगी में अहले बैत (अ) की बहुत सी इनायात के नमूने देखें होंगें।

    किसी मुल्क में दो शख्स रहते थे, उनमें से एक मामूली सा काम करता था उसकी आमदनी बहुत कम थी, दूसरा शहर का मशहूर रईस था (दोनो का इन्तेक़ाल हो चुका है) वह मामूली शख्स रोज़ाना सुबह से शाम तक काम करता था, पसीना बहाता था, शाम को घर लौटता था और अपनी दिन भर की सारी कमाई का हिसाब करके उसका एक तिहाई हिस्सा अलग करके कहता था और कहता था: यह पैसा इमाम हुसैन (अ) के लिये है। इसी तरह हर साल अगर उन दो हिस्सों में से पैसा ज़्यादा हो जाता तो वह उसका ख़ुम्स निकालता था। उसने इमाम हुसैन (अ) के नाम से पैसा जमा किया और शहर के बाहर एक ज़मीन ख़रीदी, लोग उससे कहते थे: ऐसी जगह ज़मीन क्यों ख़रीदी है जहाँ न पानी है न आबादी।