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    नहजुल बलागा

    नहजुल बलागा

    • सय्यद रज़ी (र0)
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    नहजुल बलागा
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    नहजुल बलागा =अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के संकलित आदेश एवं उपदेश 01

    इस ध्याय में प्रश्नों के उत्तर और छोटे छोटे दार्शनिक वाक्यों का संकलन अंकित है जो विभिन्न लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के संबन्ध में वर्णन किये गए हैं।

    1. झगड़े के समय ऊँट के दो साल के बच्चे की तरह रहो न तो उसकी पीठ पर सवार हुआ जा सकता है और न ही उसके थनों से दूध दुहा जा सकता है।

    2. जिसने लालच को अपना आचरण बनाया, उसने अपने को हल्का किया और जिसने अपनी परेशानी का वर्णन किया वह अपमानित होने पर तैयार हो गया, और जिसने अपनी ज़बान को अपने ऊपर हाकिम बना लिया उसने अपने आपको ज़लील कर लिया।

    3. कंजूसी एक ऐब है और डर नुक़्सान, निर्धनता चतुर एवं बुद्घिमान ब्यक्ति की ज़बान को तर्क शक्ति में असमर्थ बना देती है और निर्धन इंसान अपने शहर में भी अजनबी होता है।

    4. असमर्थता मुसीबत है और सब्र व संतोष वीरता है, दुनिया को न चाहना दौलत व पारसाई ढाल है और रिज़ा अच्छे सभासद है।

    5. इल्म, सबसे अच्छी मीरास और सदाचार नवीन आभूषण हैं, और विचार साफ़ आईना (दर्पण) है।

    6. बुद्घिमान इंसान का सीना उसके रहस्यों का संदूक़ और सदव्यवहार मुहब्बत का जाल होता है। शहनशीलता व धैर्य बुराईयों की कब्र है। दूसरी जगह इस प्रकार है, मेल मिलाप व संधी दोषों को छुपाने का साधन है और जो व्यक्ति स्वयं से खुश रहता है उससे दूसरे नाराज़ रहते हैं।

    7. सदक़ा (दान) कामयाब दवा है। दुनिया में बन्दों के कर्म आख़िरत (परलोक) में उनकी आंखों के सामने होंगे।

    8. यह इंसान आश्चर्यजनक, चर्बी से देखता है, गोश्त (मास) के लोथड़े से बोलता है, हड्डी से सुनता है और सूराख (छिद्र) से साँस लेता है।

     

    • सय्यद रज़ी (र0)
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