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    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का जीवन परिचय

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का जीवन परिचय

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    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का जीवन परिचय
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    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की विलादत की तारीख़

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की विलादत की तारीख़ में मुसलमानों के दरमियान इख़्तेलाफ़ है। शिया आपकी विलादत सतरह रबी उल अव्वल को मानते हैं और सुन्नी आपकी विलादत के बारे में बारह रबी उल अव्वल के काइल है। इसी तरह आपकी विलादत के दिन में भी मुसलमानों में इख़्तेलाफ़ है शियों का मानना है आपकी विलादत जुमे के दिन हुई, और सुन्नी कहते हैं कि जिस दिन आपकी विलादत हुई वह पीर का दिन था।
    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के वालदैन

    आपके वालिद हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल मुत्तलिब हैं। हज़रत अब्दुल्लाह वह इंसान हैं जो खानदानी शराफ़त के एतेबार से दुनिया भर में मुमताज़ हैं। हज़रत अब्दुल्लाह के वालिद जनाबे अब्दुल मुत्तलिब है जिनकी अज़मत व हैबत का यह आलम था, कि जब अबरह खान-ए-काबा को गिराने के मक़सद से मक्के आया और आप उसके पास गये, तो वह आपको देखने के न चाहते हुए भी आपके एहतेराम में खड़ा हो गया।

    हज़रत अब्दुल्लाह इस खानदान से होने के साथ साथ अपने ज़माने के खूबसूरत, रशीद, मोद्दब और अक़्लमंद इंसान थे। यूँ तो मक्के की बहुत सी लड़कियां आप से शादी रचाना चाहती थी, मगर चूँकि नूरे नबूवत को एक खास आग़ोश की जरूरत थी, इस लिए आपने सबको नज़र अंदाज़ करते हुए आमिना बिन्ते वहब से शादी की।

    तारीख़ में मिलता है कि अभी इस शादी को चालीस दिन भी न हुए थे कि जनाब अब्दुल्लाह ने तिजारत की वजह से शाम का सफ़र किया और वहाँ से लौटते वक़्त आप अपने नानिहाल वालों से मिलने के लिए मदीने गये और वहीँ पर आपका इंतेक़ाल हो गया। यानी पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ. व आलिहि वसल्लम) जब इस दुनिया में तशरीफ़ लाये तो आपके सिर से बाप का साया उठ चुका था।

    चूँकि जनाबे आमिना, जनाबे अब्दुल्लाह के साथ ज़्यादा दिन न रह सकी थीं, इस लिए वह उनकी यादगार, अपने बेटे से बेहद प्यार करती थीं। जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) पाँच साल के हुए तो जनाबे आमिना, जनाबे अब्दुल मुत्तलिब से इजाज़त लेकर अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए उम्मे एमन नामी कनीज़ के साथ मदीना गईं । इस सफ़र में पैग़म्बर (स.) भी आपके साथ थे और यह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का पहला सफ़र था। जब यह क़ाफ़िला मक्के की तरफ़ वापस लौट रहा था तो रास्ते में अबवा नामी जगह पर जनाबे आमिना बीमार हुई और आपका वहीं पर इंतेक़ाल हो गया। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अपनी वालदा को वहीँ दफ़्न किया और उम्मे एमन के साथ मक्के आ गये।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) व अहले बैत अलैहिमु अस्सलाम के चाहने वाले आज भी अबवा में जनाबे आमिना की क़ब्र पर ज़ियारत के लिए जाते है। जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) इस हादसे के पचास साल के बाद इस मक़ाम से गुज़रे तो असहाब ने देखा कि आप सवारी से नीचे उतर कर, किसी से कुछ कहे बग़ैर एक तरफ़ आगे बढ़ने लगे, कुछ असहाब यह जानने के लिए कि आप कहाँ जा रहे हैं, आपके पीछे चलने लगे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) एक जगह पर जा कर रुके और बैठ कर क़ुरआन पढ़ने लगे आप क़ुरआन पढ़ते जाते थे और उस जगह को ग़ौर से देखे जाते थे, कुछ देर के बाद आपकी आँखों से आँसू टपकने लगे। असहाब ने सवाल किया या रसूलुल्लाह आप क्योँ रो रहे हैं ? आपने फ़रमाया कि यहाँ मेरी माँ की क़ब्र है आज से पचास साल पहले मैंने उन्हें यहाँ पर दफ़्न किया था।

    माँ का साया सिर से उठ जाने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की देख रेख की पूरी ज़िम्मेदारी जनाबे अब्दुल मुत्तलिब ने संभाली। वह आपको बहुत प्यार करते थे और अपने बेटों से कहते थे कि यह बच्चा दूसरे बच्चों से मुख़तलिफ़ है। अभी तुम इसके बारे में कुछ नही जानते हो, यह बच्चा आने वाले वक़्त में अल्लाह का नुमाइंदा बनेगा। हाँ जनाबे अब्दुल मुत्तलिब इस बच्चे के मासूम चेहरे पर नूरे नबूवत को देख रहे थे। वह समझ चुके थे कि जल्द ही इनके पास वही के ज़रिये अल्लाह का वह दीन आने वाला है जो दुनिया के तमाम अदयान पर छा जायेगा। हाँ जनाबे अब्दुल मुत्तलिब की निगाहें वह सब देख रही थीं जिसे दूसरे लोग नही देख पा रहे थे।

    जब जनाबे अब्दुल मुत्तलिब का आख़री वक़्त क़रीब आया, तो आपके बड़े बेटे जनाबे अबुतालिब ने आपके चेहरे पर परेशानी के कुछ आसार देखे। वह आगे बढ़े और अपने वालिद से इस परेशानी का सबब पूछा। जनाबे अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि मुझे मौत से कोई खौफ़ नही मैं सिर्फ़ इस बच्चे की तरफ़ से फ़िक्रमंद हूँ, कि इसे किस के सुपुर्द करूँ ! क्या इस बच्चे की सरपरस्ती को तुम क़बूल करते हो ? क्या तुम इस बात वादा करते हो कि मेरी तरफ़ से इसकी किफ़ालत करोगे ? जनाबे अबुतालिब ने जवाब दिया कि बाबा मुझे मंज़ूर है। जनाबे अबूतालिब ने अपने बाबा से किये हुए वादे को अपनी ज़िन्दगी के आख़री साँस तक निभाया और पूरी ज़िन्दगी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की मदद व हिफ़ाज़त करते रहे। जनाबे अबूतालिब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को अपने बेटों से ज़्यादा चाहते थे और आपकी ज़ोजा फ़ातिमा बिन्ते असद यानी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की वालदा ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को माँ की तरह प्यार दिया।

    बेसत से पहले पैग़म्बरे अकरम(स.)का किरदार

    किसी भी इंसान की समाजी ज़िन्दगी में जो चीज़ सबसे ज़्यादा असर अंदाज़ होती है वह उस इंसान का माज़ी का किरदार है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की एक ख़ासियत यह थी कि वह दुनिया के किसी भी मदर्से में पढ़ने के लिए नही गये। आपका किसी मदर्से में न पढ़ना इस बात का सबब बना कि जब आपने लोगों के सामने कुरआन की आयतों की तिलावत की तो वह ताज्जुब में पड़ गये और उनसे मुहब्बत करने लगे। अगर आप दुनिया के किसी मदर्से में पढ़े होते, तो लोग यही समझते कि यह इनकी मदर्से की तालीम का कमाल है।
    आपकी दूसरी सिफ़त यह है कि आपने उस माहोल में, जिसमें कुछ लोगों को छोड़ कर, सभी बुतों के सामने सजदा करते थे, कभी किसी बुत के सामने सिर नही झुकाया। लिहाज़ जब आपने बुतों और बुत पूजने वालों की मुख़ालेफ़त की तो कोई आप से यह न कह सका कि आप हमें क्योँ मना कर रहे हों, आप भी तो कभी इनके सामने सिर झुकाते थे।
    आपकी एक खासियत यह थी कि आपने मक्के जैसे शहर में, जवानी की पाक व पाकीज़ा ज़िंदगी गुज़ारी और किसी बुराई में नही पड़े। जबकि उन दिनों मक्का शहर बुराईयों का गढ़ था।
    बेसत से पहले, आप मक्के में सादिक़, अमीन और आक़िल माने जाते थे। आप लोगों के दरमियान मुहम्मद अमीन के नाम से मशहूर थे। सदाक़त व अमानत में लोग, आप पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते थे। बहुत से कामों में आपकी अक़्ल पर एतेमाद किया जाता था। अक़्ल, सदाक़त व आमानत आपके ऐसे सिफ़ात थे जिनमें आप बहुत मशहूर थे। यहाँ तक कि जब लोग आपको अज़ीयतें देने लगें और आपकी बातों का इंकार करने लगे, तो आपने लोगों से पूछा कि क्या तुमने आज तक मुझसे कोई झूट सुना है ? सबने कहा, नही, हम आपको सच्चा और अमानतदार मानते हैं।

    पैगम्बरी की घोषणा

    हज़रत मुहम्मद (स) जब चालीस वर्ष के हुए तो उन्होने अपने पैगम्बर होने की घोषणा की। तथा जब कुऑन की यह आयत नाज़िल हुई कि,,वनज़िर अशीरतःकल अक़राबीन(अर्थात ऐ पैगम्बर अपने निकटतम परिजनो को डराओ) तो पैगम्बर ने एक रात्री भोज का प्रबन्ध किया। तथा अपने निकटतम परिजनो को भोज पर बुलाया.। भोजन के बाद कहा कि मै
    तुम्हारी ओर पैगम्बर बनाकर भेजा गया हूँ ताकि तुम लोगो को बुराईयो से निकाल कर अच्छाइयों की ओर अग्रसरित करू। इस अवसर पर पैगम्बर (स) ने अपने परिजनो से मूर्ति पूजा को त्यागने तथा एकीश्वरवादी बनने की अपील की। और इस महान् कार्य मे साहयता का निवेदन भी किया परन्तु हज़रत अली (अ) के अलावा किसी ने भी साहयता का वचन नही दिया। इसी समय से मक्के के सरदार आपके विरोधी हो गये तथा आपको यातनाऐं देने लगे।

    रसूले इस्लाम(स.)का पालन पोषण

    हज़रत पैगम्बर के पिता का स्वर्गवास पैगम्बर के जन्म से पूर्व ही हो गया था। और जब आप 6 वर्ष के हुए तो आपकी माता का भी स्वर्गवास हो गया। अतः8 वर्ष की आयु तक आप का पलन पोषण आपके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने किया।दादा के स्वर्गवास के बाद आप अपने प्रियः चचा हज़रत अबुतालिब के साथ रहने लगे। हज़रत आबुतालिब के घर मे आप का व्यवहार सबकी दृष्टि का केन्द्र रहा। आपने शीघ्र ही सबके हृदयों मे अपना स्थान बना लिया।
    हज़रत पैगम्बर बचपन से ही दूसरे बच्चों से भिन्न थे। उनकी आयु के अन्य बच्चे गदें रहते, उनकी आँखों मे गन्दगी भरी रहती तथा बाल उलझे रहते थे। परन्तु पैगम्बर बचपन मे ही व्यस्कों की भाँति अपने को स्वच्छ रखते थे। वह खाने पीने मे भी दूसरे बच्चों की हिर्स नही करते थे। वह किसी से कोई वस्तु छीन कर नही खाते थे। तथा सदैव कम खाते थे कभी कभी ऐसा होता कि सोकर उठने के बाद आबे ज़मज़म(मक्के मे एक पवित्र कुआ) पर जाते तथा कुछ घूंट पानी पीलेते व जब उनसे नाश्ते के लिए कहा जाता तो कहते कि मुझे भूख नही है । उन्होने कभी भी यह नही कहा कि मैं भूखा हूं। वह सभी अवस्थाओं मे अपनी आयु से अधिक गंभीरता का परिचय देते थे। उनके चचा हज़रत अबुतालिब सदैव उनको अपनी शय्या के पास सुलाते थे। वह कहते हैं कि मैने कभी भी पैगम्बर को झूट बोलते, अनुचित कार्य करते व व्यर्थ हंसते हुए नही देखा। वह बच्चों के खेलों की ओर भी आकर्षित नही थे। सदैव तंन्हा रहना पसंद करते तथा मेहमान से बहुत प्रसन्न होते थे।

    दया की प्रबल भावना

    आदरनीय पैगम्बर मे दया की प्रबल भावना विद्यमान थी। वह अपने से छोटों के साथ प्रेमपूर्वक तथा अपने से बड़ो के साथ आदर पूर्वक व्यवहार करते थे ।वह अनाथों व भिखारियों का विशेष ध्यान रखते थे उनको को प्रसन्नता प्रदान करते व अपने यहाँ शरण देते थे। वह पशुओं पर भी दया करते थे तथा उन को यातना देने से मना करते थे।
    जब वह किसी सेना को युद्ध के लिए भेजते तो रात्री मे आक्रमण करने से मना करते, तथा जनता से प्रेमपूर्वक व्यवहार करने का निर्देश देते थे । वह शत्रु के साथ सन्धि करने को अधिक महत्व देते थे। तथा इस बात को पसंद नही करते थे कि लोगों की हत्याऐं की जाये। वह सेना को निर्देश देते थे कि बूढ़े व्यक्तियों, बच्चों तथा स्त्रीयों की हत्या न की जाये तथा मृत्कों के शरीर को खराब न किया जाये

    सदाचारिता

    पैगम्बर के सदाचार की अल्लाह ने इस प्रकार प्रसंशा की है इन्नका लअला ख़ुलक़िन अज़ीम अर्थात पैगम्बर आप अति श्रेष्ठ सदाचारी हैं। एक दूसरे स्थान पर पैगम्बर की सदाचारिता को इस रूप मे प्रकट किया कि व लव कानत फ़ज़्ज़न ग़लीज़ल क़लबे ला नग़ज़्ज़ु मिन हवालीका
    अर्थात ऐ पैगम्बर अगर आप क्रोधी स्वभव वाले खिन्न व्यक्ति होते, तो मनुष्य आपके पास से भागते। इस प्रकार इस्लाम के विकास मे एक मूलभूत तत्व हज़रत पैगम्बर का सद्व्यवहार रहा है।

    बुराई के बदले भलाई की भावना

    आदरनीय पैगम्बर की एक विशेषता बुराई का बदला भलाई से देना थी। जो उन को यातनाऐं देते थे, वह उन के साथ उनके जैसा व्यवहार नही करते थे। उनकी बुराई के बदले मे इस प्रकार प्रेम पूर्वक व्यवहार करते थे, कि वह लज्जित हो जाते थे।
    यहाँ पर उदाहरण स्वरूप केवल एक घटना का उल्लेख करते हैं। एक यहूदी जो पैगम्बर का विरोधी था। वह प्रतिदिन अपने घर की छत पर बैठ जाता, व जब पैगम्बर उस गली से जाते तो उन के सर पर राख डाल देता। परन्तु पैगम्बर इससे क्रोधित नही होते थे। तथा एक स्थान पर खड़े होकर अपने सर व कपड़ों को साफ कर के आगे बढ़ जाते थे। अगले दिन यह जानते हुए भी कि आज फिर ऐसा ही होगा। वह अपना मार्ग नही बदलते थे। एक दिन जब वह उस गली से जा रहे थे, तो इनके ऊपर राख नही फेंकी गयी। पैगम्बर रुक गये तथा प्रश्न किया कि आज वह राख डालने वाला कहाँ हैं? लोगों ने बताया कि आज वह बीमार है। पैगम्बर ने कहा कि मैं उस को देखने जाऊगां। जब पैगम्बर उस यहूदी के सम्मुख गये, तथा उस से प्रेम पूर्वक बातें की तो उस व्यक्ति को ऐसा लगा, कि जैसे यह कई वर्षों से मेरे मित्र हैं। आप के इस व्यवहार से प्रभावित होकर उसने ऐसा अनुभव किया, कि उस की आत्मा से कायर्ता दूर हो गयी तथा उस का हृदय पवित्र हो गया। उनके साधारन जीवन तथा नम्र स्वभव ने उनके व्यक्तितव मे कमी नही आने दी, उनके लिए प्रत्येक व्यक्ति के हृदय मे स्थान था।

    स्वच्छता

    पैगम्बर स्वच्छता मे अत्याधिक रूचि रखते थे। उन के शरीर व वस्त्रों की स्वच्छता देखने योग्य होती थी। वह वज़ू के अतिरिक्त दिन मे कई बार अपना हाथ मुँह धोते थे।वह अधिकाँश दिनो मे स्नान करते थे। उनके कथनानुसार वज़ु व स्नान इबादत है। वह अपने सर के बालों को बेरी के पत्तों से धोते और उनमे कंघा करते और अपने शरीर को मुश्क व अंबर नामक पदार्थों से सुगन्धित करते थे। वह दिन मे कई बार तथा सोने से पहले व सोने के बाद अपने दाँतों को साफ़ करते थे। भोजन से पहले व बाद मे अपने मुँह व हाथों को धोते थे तथा दुर्गन्ध देने वाली सब्ज़ियों को नही खाते थे।
    हाथी दाँत का बना कंघा सुरमेदानी कैंची आईना व मिस्वाक उनके यात्रा के सामान मे सम्मिलित रहते थे। उनका घर बिना साज सज्जा के स्वच्छ रहता था। उन्होने चेताया कि कूड़े कचरे को दिन मे उठा कर बाहर फेंक देना चाहिए। वह रात आने तक घर मे नही पड़ा रहना चाहिए। उनके शरीर की पवित्रता उनकी आत्मा की पवित्रता से सम्बन्धित रहती थी। वह अपने अनुयाईयों को भी चेताते रहते थे कि अपने शरीरो वस्त्रों व घरों को स्वच्छ रखा करो। तथा जुमे (शुक्रवार) को विशेष रूप से स्नान किया करो। दुर्गन्ध को दूर करने हेतू शरीर व वस्त्रो को सुगन्धित करके जुमे की नमाज़ मे सम्मिलित हुआ करो ।

    पैग़म्बरे अकरम (स.) के सफ़र

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अरब से बाहर सिर्फ़ दो सफ़र किये और आप दोनों ही बार शाम तशरीफ़ ले गये। आपने यह दोनों सफ़र बेसत से पहले किये। पहली बार आप बारह साल की उम्र में अपने चचा अबुतालिब के साथ गये और दूसरी बार पच्चीस साल की उम्र में जनाबे ख़दीजा की तरफ़ से तिजारत के लिए। बेसत के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अरब के अन्दर बहुतसे सफ़र किये, मगर अरब से बाहर आपके सिर्फ़ यही दो सफ़र तारीख़ में दर्ज हैं।

    हिजरत

    आर्थिक प्रतिबन्धो से छुटने के बाद पैगम्बर ने फिर से इस्लाम प्रचार आरम्भ कर दिया। इस बार मूर्ति पूजकों का विरोध अधिक बढ़ गया ।तथा वह पैगम्बर की हत्या का षड़यंत्र रचने लगे। इसी बीच पैगम्बर के दो बड़े सहयोगियों हज़रत अबुतालिब तथा हज़रत खदीजा का स्वर्गवास हो गया। यह पैगम्बर के लिए अत्यन्त दुखः दे हुआ। जब पैगम्बर मक्के मे अकेले रह गये तो अल्लाह की ओर से संदेश मिला कि मक्का छोड़ कर मदीने चले जाओ। पैगम्बर ने इस आदेश का पालन किया और रात्रि के समय मक्के से मदीने की ओर प्रस्थान किया। मक्के से मदीने की यह यात्रा हिजरत कहलाती है। तथा इसी यात्रा से हिजरी सन् आरम्भ हुआ। पैगम्बरी की घोषणा के बाद पैगम्बर 13 वर्षों तक मक्के मे रहे।
    मदीने मे पैगम्बर को नये सहयोगी प्राप्त हुए तथा उनकी साहयता से पैगम्बर ने इस्लाम प्रचार को अधिक तीव्र कर दिया। दूसरी ओर मक्के के मूर्ति पूजको की चिंता बढ़ती गयी तथा वह पैगम्बर से मूर्तियो के अपमान का बदला लेने के लिये युद्ध की तैयारियां करने लगे। इस प्रकार पैगम्बर को मक्का वासियों से कई युद्ध करने पड़े जिनमे मूर्ति पूजकों को पराजय का सामना करना पड़ा। अन्त मे पैगम्बर ने मक्के जाकर हज करना चाहा परन्तु मक्कावासी इस से सहमत नही हुए। तथा पैगमबर ने शक्ति के होते हुए भी युद्ध नही किया तथा सन्धि कर के मानव मित्रता का परिचय दिया। तथा सन्धि की शर्तानुसार हज को अगले वर्ष तक के लिए स्थगित कर दिया। सन् 10 हिजरी मे पैगम्बर ने 125000 मुस्लमानो के साथ हज किया। तथा मुस्लमानो को हज करने का प्रशिक्षण दिया।

    सत्यता

    सत्यता पैगम्बर के जीवन की विशेष शोभा थी। पैगम्बर (स) ने अपने पूरे जीवन मे कभी भी झूट नही बोला। पैगम्बरी की घोषणा से पूर्व ही पूरा मक्का आप की सत्यता से प्रभावित था।
    आप ने कभी व्यापार मे भी झूट नही बोला। वह लोग जो आप को पैगम्बर नही मानते थे वह भी आपकी सत्यता के गुण गाते थे। इसी कारण लोग आपको सादिक़(अर्थात सच्चा) कहकर पुकारते थे।

    आर्थिक प्रतिबन्ध

    मक्के के मूर्ति पूजकों का विरोध बढ़ता गया । परन्तु पैगम्बर अपने मार्ग
    से नही हटे तथा मूर्ति पूजा का खंण्डन करते रहे। मूर्ति पूजको ने पैगम्बर
    तथा आपके सहयोगियो पर आर्थिक
    प्रतिबन्ध लगा दिये। इस समय आप का साथ केवल आप के चचा अबुतालिब ने दिया।
    वह आपको लेकर एक पहाड़ी पर चले गये । तथा कई वर्षो तक वहीं पर रहकर पैगम्बर
    की सुरक्षा करते रहे। पैगम्बर को सदैव अपने पास रखते थे। रात्रि
    मे बार बार आपके स्थान को बदलते रहते थे।

    पैगम्बर अकरम (स.) का पैमाने बरादरी

    पैगम्बर अकरम (स.) के असहाब के एक मशहूर गिरोह ने इस हदीस को पैगम्बर (स.) नक़्ल किया है।
    “ अख़ा रसूलुल्लाहि (स.) बैना असहाबिहि फ़अख़ा बैना अबिबक्र व उमर व फ़ुलानुन व फ़ुलानुन फ़जआ अली (रज़ियाल्लहु अन्हु) फ़क़ाला अख़ीता बैना असहाबिक व लम तुवाख़ बैनी व बैना अहद ? फ़क़ाला रसूलुल्लाहि (स.) अन्ता अख़ी फ़ी अद्दुनिया वल आख़िरति।”
    तर्जमा- “पैगम्बर (स.) ने अपने असहाब के बीच भाई का रिश्ता क़ाइम किया अबुबकर को उमर का भाई बनाया और इसी तरह सबको एक दूसरे का भाई बनाया। उसी वक़्त हज़रत अली अलैहिस्सलाम हज़रत की ख़िदमत में तशरीफ़ लाये और अर्ज़ किया कि आपने सबके दरमियान बरादरी का रिश्ता क़ाइम कर दिया लेकिन मुझे किसी का भाई नही बनाया। पैगम्बरे अकरम (स.) ने फ़रमाया आप दुनिया और आख़ेरत में मेरे भाई हैं।”
    इसी से मिलता जुलता मज़मून अहले सुन्नत की किताबों में 49 जगहों पर ज़िक्र हुआ है
    क्या हज़रत अली अलैहिस्सलाम और पैगम्बरे अकरम (स.) के दरमियान बरादरी का रिश्ता इस बात की दलील नही है कि वह उम्मत में सबसे अफ़ज़लो आला हैं ? क्या अफ़ज़ल के होते हुए मफ़ज़ूल के पास जाना चाहिए ?

    समय का सदुपयोग

    हज़रत पैगम्बर की पूरी आयु मे कहीं भी यह दृष्टिगोचर नही होता कि उन्होने अपने समय को व्यर्थ मे व्यतीत किया हो । वह समय का बहुत अधिक ध्यान रखते थे।
    तथा सदैव अल्लाह से दुआ करते थे, कि ऐ अल्लाह बेकारी, आलस्य व निकृष्टता से बचने के लिए मैं तेरी शरण चाहता हूँ। वह सदैव मसलमानो को कार्य करने के लिए प्रेरित करते थे।

    रसूले इस्लाम(स.)का विवाह

    जब आपकी आयु 25 वर्ष की हुई तो अरब की एक धनी व्यापारी महिला जिनका नाम खदीजा था उन्होने पैगम्बर के सम्मुख विवाह का प्रस्ताव रखा। पैगम्बर ने इसको स्वीकार किया तथा कहा कि इस सम्बन्ध मे मेरे चचा से बात की जाये। जब हज़रत अबुतालिब के सम्मुख यह प्रस्ताव रखा गया तो उन्होने अपनी स्वीकृति दे दी। तथा इस प्रकार

    पैगम्बर(स) का विवाह हज़रत खदीजा पुत्री हज़रत ख़ोलद के साथ हुआ। निकाह स्वयं हज़रत अबुतालिब ने पढ़ा। हज़रत खदीजा वह महान महिला हैं जिन्होने अपनी समस्त सम्पत्ति इस्लाम प्रचार हेतू पैगम्बर को सौंप दी थी।

    अमानतदारी(धरोहरिता)

    पैगम्बर के जीवन मे अमानतदारी इस प्रकार विद्यमान थी कि समस्त मक्कावासी अपनी अमानते आप के पास रखाते थे। उन्होने कभी भी किसी के साथ विश्वासघात नही किया। जब भी कोई अपनी अमानत मांगता आप तुरंत वापिस कर देते थे। जो व्यक्ति आपके विरोधि थे वह भी अपनी अमानते आपके पास रखाते थे।
    क्योंकि आप के पास एक बड़ी मात्रा मे अमानते रखी रहती थीं, इस कारण मक्के मे आप का एक नाम अमीन पड़ गया था। अमीन (धरोहर)