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    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की विलादत की तारीख़

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    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की विलादत की तारीख़
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    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की विलादत की तारीख़ में मुसलमानों के दरमियान इख़्तेलाफ़ है। शिया आपकी विलादत सतरह रबी उल अव्वल को मानते हैं और सुन्नी आपकी विलादत के बारे में बारह रबी उल अव्वल के काइल है। इसी तरह आपकी विलादत के दिन में भी मुसलमानों में इख़्तेलाफ़ है शियों का मानना है आपकी विलादत जुमे के दिन हुई, और सुन्नी कहते हैं कि जिस दिन आपकी विलादत हुई वह पीर का दिन था।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के वालदैन

    आपके वालिद हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल मुत्तलिब हैं। हज़रत अब्दुल्लाह वह इंसान हैं जो खानदानी शराफ़त के एतेबार से दुनिया भर में मुमताज़ हैं। हज़रत अब्दुल्लाह के वालिद जनाबे अब्दुल मुत्तलिब है जिनकी अज़मत व हैबत का यह आलम था, कि जब अबरह खान-ए-काबा को गिराने के मक़सद से मक्के आया और आप उसके पास गये, तो वह आपको देखने के न चाहते हुए भी आपके एहतेराम में खड़ा हो गया।

    हज़रत अब्दुल्लाह इस खानदान से होने के साथ साथ अपने ज़माने के खूबसूरत, रशीद, मोद्दब और अक़्लमंद इंसान थे। यूँ तो मक्के की बहुत सी लड़कियां आप से शादी रचाना चाहती थी, मगर चूँकि नूरे नबूवत को एक खास आग़ोश की जरूरत थी, इस लिए आपने सबको नज़र अंदाज़ करते हुए आमिना बिन्ते वहब से शादी की।

    तारीख़ में मिलता है कि अभी इस शादी को चालीस दिन भी न हुए थे कि जनाब अब्दुल्लाह ने तिजारत की वजह से शाम का सफ़र किया और वहाँ से लौटते वक़्त आप अपने नानिहाल वालों से मिलने के लिए मदीने गये और वहीँ पर आपका इंतेक़ाल हो गया। यानी पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ. व आलिहि वसल्लम) जब इस दुनिया में तशरीफ़ लाये तो आपके सिर से बाप का साया उठ चुका था।

    चूँकि जनाबे आमिना, जनाबे अब्दुल्लाह के साथ ज़्यादा दिन न रह सकी थीं, इस लिए वह उनकी यादगार, अपने बेटे से बेहद प्यार करती थीं। जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) पाँच साल के हुए तो जनाबे आमिना, जनाबे अब्दुल मुत्तलिब से इजाज़त लेकर अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए उम्मे एमन नामी कनीज़ के साथ मदीना गईं । इस सफ़र में पैग़म्बर (स.) भी आपके साथ थे और यह पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का पहला सफ़र था। जब यह क़ाफ़िला मक्के की तरफ़ वापस लौट रहा था तो रास्ते में अबवा नामी जगह पर जनाबे आमिना बीमार हुई और आपका वहीं पर इंतेक़ाल हो गया। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने अपनी वालदा को वहीँ दफ़्न किया और उम्मे एमन के साथ मक्के आ गये।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.) व अहले बैत अलैहिमु अस्सलाम के चाहने वाले आज भी अबवा में जनाबे आमिना की क़ब्र पर ज़ियारत के लिए जाते है। जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) इस हादसे के पचास साल के बाद इस मक़ाम से गुज़रे तो असहाब ने देखा कि आप सवारी से नीचे उतर कर, किसी से कुछ कहे बग़ैर एक तरफ़ आगे बढ़ने लगे, कुछ असहाब यह जानने के लिए कि आप कहाँ जा रहे हैं, आपके पीछे चलने लगे। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) एक जगह पर जा कर रुके और बैठ कर क़ुरआन पढ़ने लगे आप क़ुरआन पढ़ते जाते थे और उस जगह को ग़ौर से देखे जाते थे, कुछ देर के बाद आपकी आँखों से आँसू टपकने लगे। असहाब ने सवाल किया या रसूलुल्लाह आप क्योँ रो रहे हैं ? आपने फ़रमाया कि यहाँ मेरी माँ की क़ब्र है आज से पचास साल पहले मैंने उन्हें यहाँ पर दफ़्न किया था।

    माँ का साया सिर से उठ जाने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की देख रेख की पूरी ज़िम्मेदारी जनाबे अब्दुल मुत्तलिब ने संभाली। वह आपको बहुत प्यार करते थे और अपने बेटों से कहते थे कि यह बच्चा दूसरे बच्चों से मुख़तलिफ़ है। अभी तुम इसके बारे में कुछ नही जानते हो, यह बच्चा आने वाले वक़्त में अल्लाह का नुमाइंदा बनेगा। हाँ जनाबे अब्दुल मुत्तलिब इस बच्चे के मासूम चेहरे पर नूरे नबूवत को देख रहे थे। वह समझ चुके थे कि जल्द ही इनके पास वही के ज़रिये अल्लाह का वह दीन आने वाला है जो दुनिया के तमाम अदयान पर छा जायेगा। हाँ जनाबे अब्दुल मुत्तलिब की निगाहें वह सब देख रही थीं जिसे दूसरे लोग नही देख पा रहे थे।

    जब जनाबे अब्दुल मुत्तलिब का आख़री वक़्त क़रीब आया, तो आपके बड़े बेटे जनाबे अबुतालिब ने आपके चेहरे पर परेशानी के कुछ आसार देखे। वह आगे बढ़े और अपने वालिद से इस परेशानी का सबब पूछा। जनाबे अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि मुझे मौत से कोई खौफ़ नही मैं सिर्फ़ इस बच्चे की तरफ़ से फ़िक्रमंद हूँ, कि इसे किस के सुपुर्द करूँ ! क्या इस बच्चे की सरपरस्ती को तुम क़बूल करते हो ? क्या तुम इस बात वादा करते हो कि मेरी तरफ़ से इसकी किफ़ालत करोगे ? जनाबे अबुतालिब ने जवाब दिया कि बाबा मुझे मंज़ूर है। जनाबे अबूतालिब ने अपने बाबा से किये हुए वादे को अपनी ज़िन्दगी के आख़री साँस तक निभाया और पूरी ज़िन्दगी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की मदद व हिफ़ाज़त करते रहे। जनाबे अबूतालिब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को अपने बेटों से ज़्यादा चाहते थे और आपकी ज़ोजा फ़ातिमा बिन्ते असद यानी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की वालदा ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को माँ की तरह प्यार दिया।

    बेसत से पहले पैग़म्बरे अकरम(स.)का किरदार

    किसी भी इंसान की समाजी ज़िन्दगी में जो चीज़ सबसे ज़्यादा असर अंदाज़ होती है वह उस इंसान का माज़ी का किरदार है। पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की एक ख़ासियत यह थी कि वह दुनिया के किसी भी मदर्से में पढ़ने के लिए नही गये। आपका किसी मदर्से में न पढ़ना इस बात का सबब बना कि जब आपने लोगों के सामने कुरआन की आयतों की तिलावत की तो वह ताज्जुब में पड़ गये और उनसे मुहब्बत करने लगे। अगर आप दुनिया के किसी मदर्से में पढ़े होते, तो लोग यही समझते कि यह इनकी मदर्से की तालीम का कमाल है।
    आपकी दूसरी सिफ़त यह है कि आपने उस माहोल में, जिसमें कुछ लोगों को छोड़ कर, सभी बुतों के सामने सजदा करते थे, कभी किसी बुत के सामने सिर नही झुकाया। लिहाज़ जब आपने बुतों और बुत पूजने वालों की मुख़ालेफ़त की तो कोई आप से यह न कह सका कि आप हमें क्योँ मना कर रहे हों, आप भी तो कभी इनके सामने सिर झुकाते थे।
    आपकी एक खासियत यह थी कि आपने मक्के जैसे शहर में, जवानी की पाक व पाकीज़ा ज़िंदगी गुज़ारी और किसी बुराई में नही पड़े। जबकि उन दिनों मक्का शहर बुराईयों का गढ़ था।
    बेसत से पहले, आप मक्के में सादिक़, अमीन और आक़िल माने जाते थे। आप लोगों के दरमियान मुहम्मद अमीन के नाम से मशहूर थे। सदाक़त व अमानत में लोग, आप पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते थे। बहुत से कामों में आपकी अक़्ल पर एतेमाद किया जाता था। अक़्ल, सदाक़त व आमानत आपके ऐसे सिफ़ात थे जिनमें आप बहुत मशहूर थे। यहाँ तक कि जब लोग आपको अज़ीयतें देने लगें और आपकी बातों का इंकार करने लगे, तो आपने लोगों से पूछा कि क्या तुमने आज तक मुझसे कोई झूट सुना है ? सबने कहा, नही, हम आपको सच्चा और अमानतदार मानते हैं।