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    मजमूअऐ मक़ालाते इमामे महदी(अ)(2)

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    (1)हुकूमत के नतीजे

    आप ने देखा होगा कि जो लोग अपनी हुकूमत बनाकर ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं, वह पहले अपनी हुकूमत के उद्देश्यों का वर्णन नकरते हैं। कभी कभी तो ऐसा होता है कि वह उन उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए अपनी योजनाओं को भी लोगों के सामने पेश कर देते हैं। लेकिन वह हुकूमत व ताक़त प्राप्त करने के बाद कुछ समय बीतने पर अपने उन उद्देश्यों में नाकाम रह जाते हैं या कभी अपने किये हुए वादों से मुकर जाते हैं, या अपने उद्देश्यों को बिल्कुल ही भूल जाते हैं।

    लेकिन पहले से निश्चित उन उद्देश्यों को प्राप्त न करने की वजह यह होती है कि वह उद्देश्य असली नहीं होते, या इसकी दूसरी वजह यह हो सकती है कि उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हुकूमत के पास कोई सही व संपूर्ण योजना नहीं होती और बहुत से स्थानों पर इस नाकामी की वजह क़ानून बनाने वालों की अयोग्यता होती है।

    हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के उद्देश्य ऐसे वास्तविक व आधारभूत हैं कि उनकी जड़ें इंसानों के दिल व दिमाग की गहराईयों में मौजूद हैं और उन तक पहुँचने की सभी तमन्ना रखते हैं। उन उद्देश्यों की प्राप्ती के लिए जो योजनाएं हैं वह कुरआने क़रीम और अहलेबैत (अ. स.) की सुन्नत व शिक्षाओं पर आधारित है, अतः हर डिपारटमेन्ट में उसके लागू होने की ज़मानत मौजूद होगी, इस लिए इस महान इन्क़ेलाब के नतीजे बहुत ज़्यादा अच्छे होंगे। इस पूरे विवरण का एक वाक्य में इस तरह खुलासा किया जा सकता है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत का नतीजा यह होगा कि इंसान की वह तमाम भौतिक व आध्यात्मिक ज़रुरतें पूरी हो जायेंगी, जिन को ख़ुदा वन्दे आलम ने इंसान के वजूद में अमानत रखा है।

    हम यहाँ पर रिवायतों के आधार पर हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के कुछ नतीजों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं।
    न्याय का विस्तार

    अनेकों रिवायतों में मिलता है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के इन्क़ेलाब व हुकूमत के नतीजों में सब से महत्वपूर्ण चीज़ दुनिया में अदल व इन्साफ़ का आम होना है। इसके बारे में उनकी हुकूमत के उद्देश्यों के अन्तर्गत उल्लेक हो चुका है। हम यहाँ पर उस हिस्से में वर्णित चीज़ों के अलावा इस चीज़ को बढ़ाते हैं कि क़ाइमे आले मुहम्मद (स.) की हुकूमत में समाज की हर सतह पर न्याय आम हो जायेगा और अदालत समाज की रगों में रच बस जायेगी। कोई भी ऐसा छोटा या बड़ा गिरोह नहीं होगा जिसमें न्याय स्थापित न हो, आपस में समस्त इंसानों का राब्ता उसी न्याय के आधार पर होगा।

    हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने इस बारे में फरमाया :

    अल्लाह की क़सम लोगों के घरों में न्याय को इस तरह पहुँचा दिया जायेगा जिस तरह उन घरों में सर्दी और गर्मी पहुँचती है।[1]

    समाज का सबसे छोटा विभाग यानी इंसान का घर न्याय का केन्द्र बन जायेगा और घर के सब सदस्य एक दूसरे से न्यायपूर्वक व्यवहार करेंगे। इससे इस बात की पुष्टी होती है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की न्याय व समानता पर आधारित विश्वव्यापी हुकूमत ताक़त और क़ानून के बल बूते पर नही, बल्कि कुरआन की उस तरबियत पर आधारित होगी जो न्याय व भलाी का हुक्म देती है। [2] उसी से लोगों की तरबियत की जायेगी और ऐसे बेहतरीन माहौल में सभी लोग अपने इंसानी और इलाही कर्तव्यों को पूरा करते हुए दूसरों के अधिकारों का एहतेराम करेंगे,चाहे सामने वाला किसी ओहदे पर भी न हो।

    महदवी समाज में न्याय, कुरआन और हुकूमत के आधार पर एक असली सामाजिक स्तंभ के रूप में लागू होगा और कुछ गिने चुने स्वार्थी और कुरआने करीम व अहले बैत (अ. स.) की शिक्षाओं से दूर लोगों के अलावा कोई भी उसका उलंघन नही करेगा। न्याय व समानता पर आधारित हुकूमत ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करेगी और उनको फलने फूलने का मौक़ा नहीं दिया जायेगा। ऐसे लोगों पर विशेष रूप से हुकूमत के विभागों में शामिल होने पर रोक लगा दी जायेगी।

    जी हाँ ! ऐसा विस्तृत और आम न्याय हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत का नतीजा होगा। उसके लागू होने से हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के इन्केलाब का सबसे बड़ा मक़सद पूरा हो जायेगा और दुनिया न्याय व समानता से भर जायेगी और ज़ुल्म व सितम समाज के हर हिस्से से मिट जायेंगे, यहाँ तक कि घरेलू ज़िन्दगी में भी एक दूसरे के संबंधों में इसका नाम व निशान बाक़ी नहीं रहेगा।
    ईमान, अख़लाक़ और फिक्र का विकास

    प्रियः पाठकों ! हम ने उपरोक्त यह उल्लेख किया है कि समाज में न्याय के आम हो जाने से समाज में रहने वालों की सही तरबियत होगी और समाज में कुरआन व अहलेबैत (अ.स.) की तहज़ीब व सभ्यता फैल जायेगी। अइम्मा ए मासूमीन (अ. स.) की रिवायतों में हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में ईमान, अख़लाक़ और फिक्र के विकसित होने व उनके फलने फूलने का सविस्तार वर्णन किया गया है।

    हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने फरमाया :

    जब हमारे क़ाइम आले मुहम्मद ज़हूर करेंगे तो वह अपना दस्ते करम ख़ुदा के बन्दों के सरों पर रखेंगे उसकी बर्क़त से उनकी अक़्ल अपने क़माल पर पहुँच जायेगी। [3].

    और जब इंसान की अक़्ल कमाल पर पहुँच जाती है तो तमाम खूबिया और नेकियां ख़ुद बखुद उसमें पैदा होने लगती हैं, क्योंकि अक़्ल इंसान के लिए आन्तरिक पैग़म्बर है और अगर जिस्म व रूह के मुल्क पर इसकी हुकूमत हो जाये तो फिर इंसान को फिक्र, नेकी, सुधार और ख़ुदा की बन्दगी का अच्छा व कल्याणकारी रास्ता मिल जायेगा।

    हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) से सवाल हुआ कि अक़्ल क्या है ?

    उन्होंने फरमाया :

    अक़्ल एक ऐसी हक़ीक़त है जिसके ज़रिये ख़ुदा की इबादत की जाती है और उसी की रहनुमाई से जन्नत मिलती है। [4]

    जी हाँ ! वर्तमान समाज में हम देखते हैं कि इमाम और उनकी हुकूमत के बग़ैर अक़्ल पर इच्छाओं का अधिपत्य व ग़लबा है। विभिन्न गिरोहों और पार्टियों पर उनकी इच्छाएं हुकूमत कर रही है जिसके नतीजे में दूसरों के हक़ूक पामाल हो रहें है और इलाही इक्दार को भुलाया जा रहा है। लेकिन ज़हूर के ज़माने में, अल्लाह की हुज्जत, की हुकूमत की छत्र छाया में अक़्ल हुक्म करने वाली होगी और जब इंसान की अक़्ल कमाल की मंज़िल पर पहुँच जायेगी तो फिर नेकियों और अच्छाइयों के अलावा कोई हुक्म नहीं करेगी।
    एकता और मुहब्बत

    अनेकों रिवायतों में मिलता है कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की विश्वव्यापी हुकूमत में ज़िन्दगी बसर करने वाले लोग एकता व मुहब्बत के बंधन में बँधे होंगे और उनकी हुकूमत में मोमिनों के दिलों में ईर्श्या व दुशमनी के लिए कोई जगह न होगी।

    हज़रत अली (अ. स.) ने फरमाया :

    وَ لَو قَد قَامَ قَائِمُنَا۔۔۔ لَذَہَبَتِ الشَّحْنَاءُ مِن قُلُوبِ العِبَادِ۔۔۔“

    जब हमारा क़ाइम क़fयाम करेगा तो ख़ुदा के बंदो के दिलों में ीर्ष्या और दुशमनी नहीं रहेगी।

    उस ज़माने में ईर्ष्या और दुशमनी के लिए कोई बहाना बाक़ी नहीं रहेगा, क्योंकि वह ज़माना न्याय व समानता का ऐसा दौर होगा जिसमें किसा का कोई हक़ पामाल नहीं होगा। वह ज़माना अक़्लमंदी और ग़ौर व फिक्र का ज़माना होगा, अक़्ल के ख़िलाफ़ काम करने और इच्छाओं के अनुसरण का नहीं। [5] इस लिए ईर्ष्या और दुशमनी के लिए कोई बहाना नहीं रहेगा और लोगों के दिलों में मुहब्बत पैदा हो जायेगी, जबकि उससे पहले लोगों में दुश्मनी मौजूद होगी। उस ज़माने में सभी लोग कुरआनी भाीचारे की तरफ़ पलट जायेंगे…[6]… और आपस में दो भाइयों की तरह मुहब्बत के साथ रहेंगे।

    हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के सुनहरे युग की तारीफ़ करते हुए फरमाते हैं कि

    “उस ज़माने में ख़ुदा वन्दे आलम परेशान और घबराये हुए लोगों में एकता और मुहब्बत पैदा कर देगा।”[7]

    और अगर उस काम में ख़ुदा की मदद होगी तो फिर कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि वह एकता व मुहब्बत इतनी बढ़ जाये कि इस दुनिया में, जो भौतिक कशमकश में अपनी चरम सीमा को पहुँच चुकी है, उस का अंदाज़ा लगाना मुशकिल हो जाये।

    हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने फरमाया :

    जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो सच्ची दोस्ती और वास्तविक एकता इस हद तक होगी कि ज़रुरतमंद अपने ईमानी भाई की जेब से अपनी ज़रुरत के अनुसार पैसा निकाल लेगा और उसका दीनी भाई उसे नहीं रोकेगा। [8]
    जिस्म और रूह की सलामती

    आज कल इंसानों की सबसे बड़ी और लाइलाज मुश्किल ख़तरनाक बिमारियाँ हैं जो विभिन्न चीज़ो की वजह से पैदा हो रही हैं जैसे हमारे रहने के वातावरण का प्रदूषित होना, रासायनिक और एटमिक शस्त्रों का इस्तेमाल, इंसानों के आपस में अनैतिक संबंध, पेड़ों को काटना, समुन्द्रों के पानी को प्रदूषित करना आदि। इसी तरह की दूसरी चीज़ें भी विभिन्न ख़तरनाक बिमारियों को जन्म दे रही हैं जैसे कोढ़, प्लेग, फ़ालिज, दिल और दिमाग़ का दौरा आदि बहुत सी बिमारियां जिनका आज के ज़माने में कोई इलाज नहीं है, हमारी मुश्किलें हैं। जिस्मानी बिमारियों के अलावा रुही और सैकोलोजिकल बिमारियां भी हैं जिनकी वजह से दुनिया भर में इंसान की ज़िन्दगी बद मज़ा और नाकाबिले बर्दाश्त हो गई है, लेकिन यह सब दुनिया और इंसानों पर ग़लत चीज़ों के इस्तेमाल की वजह से हैं।

    हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में, जो कि अदल व इन्साफ़ और नेकियों का ज़माना होगा और ताल्लुकात बरादरी और बराबरी की बुनियादों पर होंगे, इंसान की जिस्मानी और सैकोलोजिकल बिमारियों का खात्मा हो जायेगा और इंसान की जिस्मानी व रुहानी ताकत ताज्जुब की हद तक बढ़ जायेगी।

    हज़रत इमाम सादिक (अ. स.) ने फ़रमाया :

    जब हज़रत इमाम महदी (अ. स.) क़ियाम करेंगे तो ख़ुदा वन्दे आलम मोमिनों से बिमारियों को दूर कर देगा और उन्हें सेहत व तन्दुरुस्ती प्रदान करेगा।[9]

    क्योंकि उनकी हुकूमत में इल्म व ज्ञान की बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी होगी इस लिए कोई लाइलाज बिमारी बाक़ी नहीं रहेगी। चिकित्साशास्त्र में बहुत ज़्यादा तरक़्क़ी होगी, और हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की बरकत से बहुत से बीमारों को सेहत मिल जायेगी।

    हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने फरमाया :

    जो इंसान हम अहलेबैत के क़ाइम का ज़माना देखेगा तो अगर उसको कोई बिमारी हो जायेगी तो ठीक हो जायेगा और अगर कमज़ोरी का शिकार हो जायेगा तो सेहत मन्द और ताक़त वर हो जायेगा…[10]
    बहुत ज़्यादा खैर व बरकत

    क़ाइमे आले मुहम्मद हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत का एक बड़ा फ़ायदा यह होगा कि उस ज़माने में खैर व बरकत इतनी होगी कि इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलेगी। उनकी हुकूमत की बहार में हर जगह हरा भरा और ख़ुशियों का माहौल होगा। आसमान से पानी बरसेगा और ज़मीन में अच्छी फसलें पैदा होंगी। हर तरफ ख़ुदा की बरकत बिखरी हुई नज़र आयेगी।

    हज़रत इमाम सादिक़ (अ. स.) ने फरमाया :

    ख़ुदा वन्दे आलम हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की वजह से ज़मीन व आसमान से बरकतों की बारिश करेगा और उनके ज़माने में आसमान से बारिशें होंगी और ज़मीन में अच्छी फसलें होंगी।[11]

    हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में कोई ज़मीन बंजर नहीं मिलेगी और हर जगह हरयाली होगी।

    यह महान व बेमिसाल परिवर्तन इस वजह से होगा कि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के ज़माने में तक़वे, पाकीज़गी और ईमान के फूल खिलने लगेंगे, समाज के तमाम लोग इलाही तरबियत के तहत अपने संबंधों को इस्लामी और इलाही मर्यादाओं के साँचे में ढाल लेंगे। अतः ख़ुदा वन्दे आलम ने ऐसी हालत के लिए पहले ही वादा किया है कि ऐसे पाक व पाक़ीज़ा माहौल को खैर व बरकत से भर दूँगा।

    इस बारे में कुरआने मजीद में इस प्रकार वर्णन हुआ है :

    [12] وَلَوْ اٴَنَّ اٴَہْلَ الْقُرَی آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَیْہِمْ بَرَکَاتٍ مِنْ السَّمَاءِ وَالْاٴَرْضِ۔۔۔

    और अगर बस्ती वाले ईमान ले आते और परहेज़गार बन जाते तो हम उनके लिए ज़मीन व आसमान से बरकतों के दरवाज़े खोल देते।
    ग़रीबी व फ़क़ीरी का अंत

    जिस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के लिए ज़मीन के सारे खज़ाने ज़ाहिर हो जायेंगे और ज़मीन व आसमान से लगातार बरकतें नाज़िल होंगी और मुसलमानों का बैतुलमाल (राजकीय धनकोष) अदालत की बुनियाद पर वितरित होगा तो फिर ग़रीबी व फ़क़ीरी का कोई वजूद नहीं रहेगा और उनकी हुकूमत में हर इंसान ग़रीबी के दलदल से आज़ाद हो जायेगा। [13]

    उनकी हुकूमत के ज़माने में आर्थिक संबंध समानता व भाईचारे की बुनियाद पर होंगे और स्वार्थता की जगह अपने दीनी भाीयों से हमदर्दी का जज़बा पैदा हो जायेगा। उस ज़माने में सभी लोग आपस में एक दूसरे को घर के एक मेंमबर के रूप में देखेंगे और सबको अपना तस्व्वुर करेंगे और मोहब्बत व हमदर्दी की खुशबू हर जगह फैली हुई होगी।