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    मजमूअऐ मक़ालाते इमाम हुसैन(अ)

    मजमूअऐ मक़ालाते इमाम हुसैन(अ)

    • मुजतबा हैदर
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    मजमूअऐ मक़ालाते इमाम हुसैन(अ)
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    (1)असबाबे जावेदानी ए आशूरा


    यूँ तो ख़िलक़ते आलम व आदम से लेकर आज तक इस रुए ज़मीन पर हमेशा नित नये हवादिस व वक़ायए रुनुमा होते रहे हैं और चश्मे फ़लक भी इस बात पर गवाह है कि उन हवादिस में बहुत से ऐसे हादसे भी हैं जिन में हादस ए करबला से कहीं ज़्यादा ख़ून बहाये गये और शोहदा ए करबला के कई बराबर लोग बड़ी बेरहहमी और मज़लूमी के साथ तहे तेग़ कर दिये गये लेकिन यह तमाम जंग व जिनायात मुरुरे ज़मान के साथ साथ तारीख़ की वसीअ व अरीज़ क़ब्र में दफ़्न हो कर रह गयीं मगर उन हवादिस में से फ़क़त वाक़ेया ए करबला है जो आसमाने तारीख़ पर पूरी आब व ताब के साथ बद्रे कामिल की तरह चमक रहा है बावजूद इस के कि दुश्मन हर दौर में इस हादसे को कम रंग या नाबूद करने की कोशिशें करता रहा है मगर यह वाक़ेया उन तमाम मराहिल से गुज़रता हुआ आज चौदहवीं सदी में भी अपना कामयाब सफ़र जारी रखे हुए है, आख़िर सबब क्या है?

    आख़िर वह कौन से अनासिर हैं जो इस वाक़ेया को हयाते जावेदाना अता करते हैं? मज़कूरा सवाल को मद्दे नज़र रखते हुए चंद मवारिद की तरफ़ मुख़्तसर इशारा किया जा रहा है जो क़यामे इमाम हुसैन (अ) को ज़िन्दा रखने में मुअस्सिर होते हैं।

    वादा ए इलाही

    जब हम कुरआन की तरफ़ रुजू करते हैं तो हमें मालूम होता है कि ख़ुदा वंदे आलम अपने बंदों से यह वादा कर रहा है कि तुम मेरा ज़िक्र करो मैं तुम्हारा ज़िक्र करूँगा। हर मुनसिफ़ नज़र इस आयत को और सन् 61 हिजरी के पुर आशोब दौर को मुलाहिज़ा करने के बाद यह फ़ैसला करने पर मजबूर हो जाती है कि चूँ कि उस दौर में जब नाम व ज़िक्र ख़ुदा को सफ़ह ए हस्ती से मिटाया जा रहा था तो सिर्फ़ इमाम हुसैन (अ) थे जो अपने आईज़्ज़ा व अक़रबा के हमराह वारिदे मैदान हुए और ख़ुदा के नाम और उस के ज़िक्र को तूफ़ाने नाबूदी से बचा कर साहिले निजात तक पहुचाया। लिहाज़ा ख़ुदा वंदे मुतआल ने भी अपने वादे के मुताबिक़ ज़िक्रे हुसैन को उस मेराज पर पहुचा दिया कि जहाँ दस्ते दुश्मन की रसाई मुम्किन ही नही है और यही वजह है कि दुश्मनों की इंतेहाई कोशिशों के बावजूद भी ज़िक्रे हुसैन (अ) आज भी ज़िन्दा व सलामत है।

    क़यामे इलाही

    इमाम हुसैन अलैहिस सलाम का क़याम एक इलाही क़याम था जो हक़ व दीने हक़ को ज़िन्दा करने के लिये था चुँनाचे आप का जिहाद, आप की शहादत, आप के क़याम का मुहर्रिक सब कुछ ख़ुदाई था और हर वह चीज़ जो लिल्लाह हो और रंगे ख़ुदाई इख़्तियार कर ले वह शय जावेद और ग़ैर मअदूम हो जाती है, क्योकि क़ुरआन मजीद कह रहा है कि जो कुछ ख़ुदा के पास है वह बाक़ी है और दूसरी आयत कह क रही है हर शय फ़ना हो जायेगी सिवाए वजहे ख़ुदा के, जब इन दोनो आयतों को मिलाते हैं तो नतीजा मिलता है कि न ख़ुदा मअदूम हो सकता है और न ही जो चीज़ ख़ुदा के पास है वह मअदूम हो सकती है।

    इरादा ए इलाही

    ख़ुदा वंदे का इरादा है कि हर वह चीज़ जो बशर व बशरियत के हक़ में फ़ायदेमंद हो उसे हयाते जावेदाना अता करे और उस को दस्ते दुश्मन से महफ़ूज़ रखे।

    क़ुरआने मजीद कहता है कि दुश्मन यह कोशिश कर रहा है कि नूरे ख़ुदा को अपनी फ़ूकों से ख़ामोश कर दे लेकिन ख़ुदा का नूर ख़ामोश होने वाला नही है, इमाम हुसैन (अ) चूँ कि नूरे ख़ुदा के हक़ीक़ी मिसदाक़ हैं और क़यामे इमाम भी हर ऐतेबार से बशर और बशरियत के लिये सूद मंद है लिहाज़ा इरादा ए इलाही के ज़ेरे साया यह क़याम ता अबद ज़िन्दा रहेगा।

    उन के अलावा और भी बहुत से मौरिद हैं मसलन क़यामे इमाम (अ) की जावेदानी ज़िन्दगी और उस के दायमी सफ़र पर ख़ुद पैग़म्बर (स) भी अपनी मोहरे ताईद सब्त करते हुए फ़रमाते हैं कि शहादते हुसैन (अ) के परतव क़ुलूबे मोमिनीन में एक ऐसी हरारत पाई जाती है कि जो कभी सर्द नही हो सकती। इस हदीस के अंदर अगर ग़ौर व ख़ौज़ किया जाये तो बख़ूबी रौशन हो जाता है कि रसूले अकरम (स) ने इस हादसे के वुक़ूस से पहले ही उस के दायमी होने की ख़बर दे दी थी।

    या इस के अलावा वाक़ेया ए करबला के बाद जब अमवियों ने यह सोच लिया था कि दीने ख़ुदा मिट गया, नामे पैग़म्बर (स) व आले पैग़म्बर नीस्त व नाबूद हो चुका है और उसी वक़्ती फ़तहयाबी की ख़ुशी के नशे में मख़मूर जब यज़ीद ने कहा कि कोई ख़बर नही आई, कोई वही नाज़िल नही हुई यह तो बनी हाशिम का हुकूमत अपनाने का महज़ एक ठोंग था तो उस मौक़े पर अली (अ) की बेटी ज़ैनब और इमाम सज्जाद (अ) के शररबार ने यज़ीद के नशे को काफ़ूर करते हुए दरबार में अपनी जीत का डंका बजाया और भरे दरबार में जनाबे ज़ैनब हाकिमे वक़्त क मुखातब कर के कहा कि ऐ यज़ीद तेरी इतनी औक़ात कहाँ कि अली (अ) की बेटी तुझ से बात करे लेकिन इतना तूझे बता देती हूँ तू जितनी कोशिश और मक्कारियाँ कर सकता है कर ले, लेकिन याद रख तो हरगिज़ हमारी महबुबियत को लोगों के दिलों से नही मिटा सकता। जनाबे ज़ैनब (स) की ज़बाने मुबारक से निकले हुए यह कलेमात इस बात की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि हुसैन (अ) और अहले बैत (अ) के नाम की महबुबियत को ख़ुदा ने लोगों के दिलों में वदीयत कर रखा है और जब तक सफ़ह ए हस्ती पर लोग रहेगें ज़िक्रे हुसैन और नामे हुसैन (अ) को ज़िन्दा रखेगें।

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    (2)असहाबे हुसैनी

    नूर मुहम्मद सालेसी

    इमाम हुसैन अलैहिस सलाम ने फ़रमाया:

    ………………….

    इमाम (अ) ने करबला जाने से पहले रास्ते में फ़रमाया था कि जो शख़्स हमारी राह में अपनी ख़ूने जीगर बहाने के लिये तैयार है और आप को अल्लाह की मुलाक़ात के लिये आमादा कर चुका है वही हमारे साथ सफ़र करे। हम इंशा अल्लाह सुबह को सफ़र जा रहै हैं।

    इमाम (अ) के अल्फ़ाज़ पर ग़ौर करें तो लफ़्ज़े मोहज ही गुफ़तुगू के लिये काफ़ी है। मोहज सिर्फ़ उस ख़ून को कहते हैं जो इंसान के कलेजे की रगों में होता है। इमाम (अ) की मुराद यह है कि हमारी राह में जो सब कुछ क़ुरबान करने के लिये तैयार हो वह हमारे साथ चले।

    सफ़र करने के लिये जिस तरह से ज़ादे राह ज़रूरी होता है उसी तरह से मक़सदे सफ़र का तअय्युन भी ज़रुरी होता है इमाम (अ) के बयानात में मक़सदे सफ़र पर काफ़ी बहस हुई है। सफ़र में एक अहम साथी, हम रकाब और ज़ादे राह के मुतअल्लिक़ भी की जाती है।

    नुक़्त ए आग़ाज़े सफ़र, सफ़र में कोई दख़ालत नही रखता लेकिन यह बहस ज़रुर पेश आती है कि इंसान जिस जगह से सफ़र शुरु कर रहा है उस की नज़र में उस का क्या मक़ाम है।

    वतन का छोड़ना आसान नही है लिहाज़ा माँ बाप घर बार उसी वक़्त छोड़ता है जब मक़सदे सफ़र उस नुक़्त ऐ आग़ाज़ से ज़्यादा अहमियत रखता हो। मदीने में इमाम हुसैन (अ) के नाना, माँ और भाई की क़ब्र है, मरकज़े इस्लाम है, इन के अलावा ख़ुद वतन की मुहब्बत भी सफ़र में माने हुआ करती है। पैग़म्बर (स) का वतन मक्का है मदीना नही और पैग़म्बर (स) ने मजबूरी के आलम में मक्का छोड़ा लेकिन रात की तारीकी में भी सफ़र के दौरान बार बार मुड़ कर मक्के की जानिब देखते जाते थे और मक़ामे जोहफ़ा पर पहुच कर काबे और मक्के की दीवारों को मुख़ातब करके फ़रमाया: ख़ुदा जानता है कि मैं तुझे बहुत पसंद करता हूँ। ऐ सर ज़मीने मक्का मैं तेरे फ़िराक़ में बहुत रंजीदा हूँ। पैग़म्बर (स) के इस कर्ब को देख कर जिबरईल नाज़िल हुए और फ़रमाया:

    ………..

    लेकिन चूँकि मक़सदे सफ़र बड़ा है इस लिये अपनी मुहब्बत को ख़ैर बाद कह रहे हैं। इमाम हुसैन (अ) के लिये मदीना भी वतन था और मक्का भी आबा व अजदाद का वतन था फिर भी आप ने मक़सदे सफ़र के पेशे नज़र मक्का भी छोड़ा और मदीने को भी ख़ैर बाद कहा।

    इमाम (अ) का ख़िताब सिर्फ़ हाज़ेरीन से था या यह आम ख़िताब था? अगर लफ़्ज़े मन काना पर तवज्जो करें तो मालूम होगा कि इमाम (अ) की नज़र में सिर्फ़ मुख़ातेबीन और हाज़ेरीन पर नही थी बल्कि जो भी ख़ूने जीगर बहाने के लिये आमादा हो वह चले चाहे मर्द हो या औरत, बूढ़ा हो या बच्चा। यह मन सब को शामिल है।

    जिहाद किस तरह होगा यह भी क़ाबिल गुफ़तुगू है। सूर ए अंकबूत की आख़िरी आयत में इरशाद हुआ कि जो भी हमारी राह में जिहाद करेगा हम उसे अपना रास्ता दिखला देगें। कुछ लोगों ने राह से मुराद जन्नत की राह तो किसी ने इससे मुराद ख़ैर का रास्ता लिया है। इमाम हुसैन (अ) ने लफ़्ज़े फ़ीना का इस्तेमाल किया है। अहले बैत (अ) का रास्ता अगर ख़ुदा के रास्ते से जुदा होता तो इमाम हुसैन (अ) लफ़्ज़े फ़ीना का इस्तेमाल नही करते। इमाम (अ) ने यह बतला दिया कि ख़ुदा की राह में जिहाद करना हो तो वह भी ख़ुदा की राह है और हमारी राह में क़ुर्बानी देनी हो तो भी ख़ुदा की राह में जिहाद करना है।

    जो भी हमारी राह में क़ुर्बानी देना चाहे हमारे साथ हो जाये। इमाम (अ) ने इस जुमले में इतनी गुजाईश रखी है कि हर कोई इस में शामिल हो सकता है और यह बहस करने की ज़रुरत नही है कि इमाम (अ) के साथ जो लोग गये उस में कुछ शहीद हुए और कुछ शहीद नही हुए। चूँ कि इमाम का यह जुमला वाज़ेह कर रहा है कि इमाम (अ) ने उन्ही को अपने साथ लिया है जो अपना ख़ूने जीगर इमाम (अ) की राह में बहाने के लिये तैयार थे। यह और बात है कि दरमियाने राह में मक़सदे बदलने की वजह से कुछ को शहादत नसीब हुई और कुछ इस तरह से महरूम रहे।

    इमाम (स) के इसी जुमले से यह भी वाज़ेह है कि किसी पर कोई जब्र व जबरदस्ती नही है वर्ना मुहम्मद हनफ़िया और अब्दुल्लाह बिन जाफ़र जैसी शख़्सियतों को इमाम (अ) के साथ नही ले गये और इमाम ने अपने साथ सफ़र करना वालों को बता दिया कि इस सफ़र में दौलत मिलने वाली नही है। इमाम (अ) ने बारहा यह जुमला इस लिये इरशाद फ़रमाया कि लोग मुसलसल इमाम (अ) की हमराही के लिये आ रहे थे लिहाज़ा इमाम ने बार बार लोगों को ख़बरदार किया कि इस सफ़र में दौलत व मंसब नही मिलने वाला है। मैं मौत को गले लगाने के लिये जा रहा हूँ जो अपनी क़ुर्बानी पेश करने के लिये तैयार हो वही मेरे हमराह चले।

    इमाम (अ) चाहते थे कि मेरी नुसरत में किसी पर जब्र न हो। आपने पूरे सफ़र में कहीं यह नही कहा कि तुम अगर मेरा साथ न दोगे तो क़यामत में रसूले ख़ुदा (स) को क्या जवाब दोगे, ख़ुदा के यहाँ क्या जवाब दोगे बल्कि साथ आने वालों को भी यही कि तुम सब चले जाओ। इस लिये कि यह लोग हमारे दुश्मन है तुम से इन का कोई वास्ता नही है इस लिये कि हमारे साथ आओंगे तो तुम्हे भी शहीद होना पड़ेगा।

    बाज़ लोग यह सवाल करते हैं कि इमाम (अ) इस सफ़र में अपने अहले व अयाल को साथ लेकर आये और रास्ते में ऐसे बहुत से काम किये जिन से यह पता चलता है कि इमाम (अ) को अपनी ज़िन्दगी की उम्मीद थी। इसी लिये हम देखते हैं कि पूरे सफ़र में इमाम (अ) ने ज़ादे राह में कोई कमी महसूस नही की और न ही कहीं ग़ल्ला ख़रीदा, पानी इतना लेकर चले थे कि अपनों के लिये काफ़ी था ही हुर के लशकर को भी सैराब किया। लेकिन ऐसा नही है बल्कि यह रसूल (स) के नवासे हैं, यह शरीयत के पाबंद हैं। इमाम हसन अलैहिस सलाम ने फ़रमाया: अपनी दुनिया के लिये ऐसे अमल करो जैसै कि तुम्हे इस दुनिया में हमेशा रहना है और इमाम (अ) ने ऐसा ही किया। इसी लिये इमाम (अ) के जिस्म में ताक़त थी जंग में अपना दिफ़ाअ करते रहे, घोड़े से गिरने के बाद भी इमाम ने अपनी क़ुव्वत भर दिफ़ा किया। इमाम (अ) ने यह अमल अपने नाना से सीखा था। पैग़म्बर (स) के एक सहाबी का इंतेक़ाल हुआ आपने उस की तजहीज़ व तकफ़ीन के बाद उसे दफ़्न करने के लिये क़ब्र में उतरे, सहाबी का जनाज़ा कब्र में रख कर अपने एक सहाबी से मिट्टी का एक टुकड़ा उठाने के लिये कहा, उस ने एक टुकड़ा उठाया तो वह नर्म था पैग़म्बर (स) ने दूसरा टुकड़ा माँगा और उस के सरहाने रख कर उसे दफ़्न किया। तदफ़ीन के बाद सहाबी ने सवाल किया कि या रसूलल्लाह (स) आप फ़रमाते हैं कि इंसान का बदन चंद दिनों के बाद बोसीदा हो जाता है तो फिर आप ने मिट्टी का वह सख़्त टुकड़ा क्यो रखा जब कि कुछ दिन के बाद उस का बदन बोसीदा हो जायेगा तो पैग़म्बर इस्लाम (स) ने फ़रमाया: ख़ुदा ने हमे हुक्म दिया है कि जो भी काम करो मुसतहकम और मज़बूती के साथ अंजाम दो, ख़ुदा उस बंदे पर रहमत नाज़िल करे जो अपने काम को इस्तेहकाम व मज़बूती के साथ अंजाम देता हो। इमाम हुसैन (अ) ने भी उसी सीरत पर अमल करते हुए सामान ने सफ़र में कोई कमी नही रखी बल्कि करबला में जो अमल भी अंजाम दिया उसे मुसतहकम व मज़बूत अंजाम दिया और हमें यह दर्स दिया कि हमारे चाहने वालों को चाहिये कि जब कोई अमल अंजाम दें तो इसतेहकाम और मज़बूती से अंजाम दें।

    मौला ए कायनात (अ) के लिये भी मिलता है कि जब आप के सर पर ज़रबत लगाई गई तो आप ने एक अजीब व ग़रीब काम अँजाम दिया। चूँ कि वह ज़रबत उसी जगह पर लगी थी जहाँ अम्र बिन अब्दवद ने जंगे ख़ंदक़ में ज़रबत लगाई थी। इस लिये सर शिगाफ़ता हो गया और ख़ून जारी हो गया लेकिन ख़ून एक तरफ़ से बह रहा था इस लिये जब मौला ए कायनात ने दूसरा सजदा करना चाहा तो सर का दूसरा हिस्सा सजदे में रखा ता कि सजदा खाक पर हो ख़ून पर न हो इस लिये कि खू़न पर सजदा सही नही है।

    इसी तरह जब इमाम हुसैन (अ) घोड़े से ज़मीन पर तशरीफ़ लाये तो सर को उस तरफ़ से सजदे में रखा जिधर ख़ून कम था ता कि अपने मअबूद का आख़िरी सजदा सही तरीक़े से अदा हो जाये।

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    (3)आशूरा का सदक़ा

    बहुत सी चीज़ें जो हमारे मज़हब में बची हुई हैं वह इमाम हुसैन (अ) की क़ुरबानी का सदक़ा है। अगर इंसानियत, बन्दगी, दोस्ती, दूसरों की ख़िदमत, कमज़ोरों पर मेहरबानी, मज़लूमों की तरफ़दारी का जज़्बा हम में पाया जाता है तो यह सब इमाम हुसैन (अ) के आशूरा के क़याम का नतीजा है। यही वजह है कि उस यादगार को भूलना नही चाहिये बल्कि उसकी हिफ़ाज़त के लिये जितना भी हो सके जमा करें ताकि हमेशा की बुलंदी अपने लिये और अपनी नस्ल के लिये हासिल कर सकें।

    हम अपनी ज़िन्दगी में ढ़ेरों पैसे ख़र्च करते हैं, लेकिन यह समझना चाहिये कि जो पैसा इमाम हुसैन (अ) की राह में ख़र्च होंगा, वह सबसे बेहतर होगा। हम ज़िन्दगी में किस क़दर दिमाग़ खर्च करते हैं? बीवी, बच्चो, घर, पेशा, काम…में। लेकिन अपना ज़हन हम जिस क़दर इमाम हुसैन (अ) की राह में ख़र्च करेंगें उसकी क़ीमत और अहमीयत उतनी ही ज़्यादा होगी। यह भी जानना चाहिये कि जो भी क़दम इस ख़ानदान की राह में उठेगा, उसका बदला अहले बैत (अ) से मिलेगा।

    • मुजतबा हैदर