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    मारेफते ग़दीर

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    मारेफते ग़दीर
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    ग़दीर और वहदते इस्लामी

    असरे हाज़िर में बाज़ लोग ग़दीर और हज़रते अली अलैहिस्सलाम की इमामत की गुफ़्तुगू (चूँकि इसको बहुत ज़माना गुज़र चुका है) को बेफ़ायदा बल्कि नुक़सानदेह समझते हैं, क्योकि यह एक तारीखी वाक़ेया है जिसको सदियाँ गुज़र चुकी हैं। यह गुफ़्तुगू करना कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का जानशीन कौन था और है? हज़रत अली इब्ले अबी तालिब या अबू बक्र? आज इसका कोई फ़ायदा नही है बल्कि बाज़ अवक़ात इस सिलसिले में गुफ़तुगू के नताइज में फ़ितना ब फ़साद बरपा होता है, उसके अलावा कोई फ़ायदा नही है। दूसरे अल्फ़ाज़ में यूँ कहा जाये: इस ज़माने में इस्लामी फ़िरक़ों के दरमियान वहदत की वाज़ेह ज़रूरत है तो फिर इस तरह की इख़्तेलाफ़ी गुफ़्तुगू क्यों की जाती है?…..

    हम ख़ुदा वन्दे आलम के लुत्फ़ व करम से असरे हाज़िर में “इमामत” के आसार व फ़वायद के लिये चंद चीज़ों को बयान करते हैं:

    1. वहदत की ह़कीक़त

    चूँकि ऐतेराज़ करने वाले लफ़्ज़े वहदत पर बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं लिहाज़ा पहले इस लफ़्ज़ की हक़ीक़त को वाज़ेह करना ज़रूरी है।

    आम तौर पर दो इस्तेलाहें हमारे यहाँ पाई जाती हैं जिन पर ग़ौर व फ़िक्र करना ज़रूरी है और उनमें एक दूसरे पर क़ुर्बान नही करना चाहिये, उनमें से एक वहदत और उम्मते इस्लामिया के इत्तेहाद को महफ़ूज़ रखना है और दूसरी चीज़ अस्ले इस्लाम की हिफ़ाज़त है।

    इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि दीने हनीफ़ (हक़ीक़ी दीन) को हिफ़्ज़ और उसको फैलाने की कोशिश करे, लिहाज़ा यह सभी की अहम ज़िम्मेदारी है।

    इसी तरह चूँकि मुसलमानों के बहुत से मुशतरक दुश्मन हैं जो चाहते हैं इस्लाम और मुसलमानों को नीस्त व नाबूद कर दें लिहाज़ा हमें चाहिये कि सब मुत्तहिद होकर इस्लाम के अरकान और मुसलमानों की हिफ़ाज़त की कोशिश करें, लेकिन इसके यह मायना नही है कि दूसरी ज़िम्मेदारियों को पशे पुश्त डाल दें और इस्लाम के मुसल्लम हक़ायक़ को बयान न किया जाये। लिहाज़ा वहदत और इत्तेहाद के मसले को असली हदफ़ क़रार नही देना चाहिये और शरीयत के हक़ायक़ को इत्तेहाद पर क़ुर्बान नही करना चाहिये, बल्कि उसके बर ख़िलाफ़ अगर इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान ताकीद की है तो इसकी वजह भी दीने इस्लाम की हिफ़ाज़त बयान की है, अब यह कैसे मुम्किन है कि किसी की नज़र में बहदत का मसअला इतना अहम दिखाई दे कि बाज़ दीनी मुसल्लमात और मज़हब के अरकान को तर्क कर दे या बेजा और फुज़ूल की ताविलात की जाये।

    इस ह़कीक़त पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सीरत और तारीख़ बेहतरीन गवाह है, आँ हज़रत (स) अगरचे यह जानते थे कि बनी उमय्या हज़रत अली (अ) और बनी हाशिम के मुख़ालिफ़ हैं और बहुत से लोग हज़रत अली (अ) की विलायत और हुक्मरानी को क़बूल नही करेगें और आपकी इमामत के कभी भी कबूल नही करेगें, लेकिन इस वजह से आँ हज़रत (स) ने हक़ व हक़ीक़त को बयान करने से गुरेज़ नही किया। ऐसा नही है कि हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को बयान किया हो, बल्कि अपनी बेसत के 23 साल में जैसे भी मुमकिन हुआ हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को असहाब के सामने बयान किया जबकि आँ हज़रत (स) इस बात पर यक़ीन रखते थे कि यह लोग मेरी वफ़ात के बाद इस मसअले पर इख़्तिलाफ़ करेगें, बल्कि यह इख़्तिलाफ़ हज़रत इमामे ज़माना (अ) के ज़हूर तक बाक़ी और जारी रहेगा। आँ हज़रत (स) ने इन तमाम चीज़ों के बावजूद भी हक़ को बयान किया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) हालाकि जानते थे कि हज़रत अली (अ) के इमामत को मसअले पर क़यामत तक इख़्तिलाफ़ रहेगा फिर भी आँ हज़रत (स) ने इस तरह हज़रत अली (अ) की इमामत की ताकीद फरमाई यहाँ तक कि रोज़े ग़दीर शक व शुब्हे को दूर करने के लिये हज़रत अली (अ) के हाथों को उठा कर उनको अपना जानशीन मुक़र्रर किया और आपकी विलायत पर ताकीद फरमायी।

    क़ारेईने केराम, यहाँ तक की बातों से यह बात बिल्कुल वाज़ेह हो जाती है कि हक़ व हक़ीक़त को बयान करना अस्ल है और कभी भी इसको नज़र अंदाज़ नही करना चाहिये। यहाँ तक कि अगर हमें मालूम हो कि इसको बयान करने की वजह से मुसलमानों की सफ़ों में इख्तिलाफ़ हो जायेगा और मुसलमानों के दरमियान दो गिरोह हो जायेगें, लेकिन इसके यह मायने नही हैं कि मुसलमान एक दूसरे के दुश्मन हो जायें और एक दूसरे को नीस्त व नाबूद करने की फ़िक्र में लग जायें, बल्कि अपना मुद्दआ बयान करने के साथ साथ एक दूसरे की बातों को भी बर्दाश्त करने का भी हौसला रखें और बेहतरीन गुफ़तार की पैरवी करने की दावत दें, लेकिन इस हाल में मुश्तरक दुश्मन से ग़ाफ़िल न हों।

    हज़रत इमाम हुसैन (अ) का क़याम हमारे मुद्दआ पर बेहतरीन गवाह है, क्योकि इमाम हुसैन (अ) हाला कि जानते थे कि मेरे क़याम से मुसलमानों के दो गिरोह में इख्तिलाफ़ होगा। लेकिन इस सूरत में भी मुसलमानों के इत्तेहाद की वजह से अम्र बिल मारूफ़ व नहयी अनिल मुन्कर जैसे अहम उसूल से ग़ाफ़िल नही हुए।

    हज़रत अली (अ) की सीरत भी इसी मतलब की तरफ़ इशारा करती है, क्यो कि बाज़ लोगों के नज़रिये के मुताबिक़ हज़रत अली (अ) तलहा व ज़ुबैर और मुआविया को बेजा ओहदा देकर जंगे जमल व जंगे सिफ़्फ़ीन को रोक सकते थे और इस काम के ज़रिये मुसलमानों के दरमीयान होने वाले इख्तिलाफ़ की रोक थाम कर सकते थे। जिसके नतीजे में हज़ारों लोगों की जान बच जाती। लेकिन हज़रत अली (अ) ने उसूले इस्लाम, हक़ व हक़ीक़त से और शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये उन हक़ायक़ से चश्म पोशी नही की।

    लिहाज़ा वहदत की हक़ीक़त (या दूसरे लफ़्ज़ों में इत्तेहाद) के मायना यह हैं कि अपने मुसल्लम अक़ायद को महफ़ूज़ रखते हुए मुश्तरक दुश्मन के मुक़ाबले में हम आवाज़ रहें और दुश्मन से ग़फ़लत न बरतें। इसके यह मायना नही है कि ख़ालिस इल्मी गुफ़्तुगू और ताअस्सुब से ख़ाली बहस से भी परहेज़ करें, क्यो कि यह तमाम चीज़ें दर हक़ीक़त शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये हैं।

    इसी वजह से जब जंगे सिफ़्फीन में हज़रत अली (अ) से नमाज़ के वक्त के बारे में सवाल किया गया और उस सवाल के बाद कि इस जंग के मौक़े पर क्या यह नमाज़ को वक्त है? तो इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: क्या हम नमाज़ के अलावा किसी दूसरी चीज़ के लिये जंग कर रहे हैं? लिहाज़ा कभी भी हदफ़ को वसीले और ज़रिये पर क़ुर्बान न किया जाये।

    शेख मुहम्मद आशूर, अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के सिक्रेटॅरी और अंदीश ए तक़रीबे मज़ाहिब कमेटी के सद्र एक बेहतरीन और मंतीक़ी गुफ़्तुगू में कहते हैं: इस्लामी मज़ाहिब के दरमीयान गुफ़्तुगू के नज़िरये का मक़सद यह नही है कि तमाम मज़हबों को एक कर दिया या किसी एक फ़िरकें से दूसरे फ़िरक़े की तरफ़ रग़बत दिलाई जाये, अगर यह मायना किये जायें तो फिर क़ुरबत का नज़रिया बेफ़ायदा हो जायेगा। क़ुरबत का नजरिया इल्मी गुफ़्तुगू की बुनियाद पर होना चाहिये ताकि इस इल्मी असलहे के ज़रिये ख़ुराफ़ात से जंग की जा सके और हर मज़हब व फ़िरक़े के उलामा और दानिशवर अपनी इल्मी गुफ़्तुगू में अपने इल्म को दूसरों के सामने पेश करें। ताकि इंसान चैन व सुकून के माहौल में हक़ीक़त से आगाह हो जाये और आसानी से किसी नतीजे पर पहुच जाये। (बाज़ ख़्वानी अंदेश ए तक़रीब, इसकंदरी पेज 32)

    हर मज़हब के मानने वालों की मुश्तरक चीज़ों पर निगाह के ज़रिये आलमी मुआशरे में ज़िन्दगी करने वाले फ़िरक़ों के दरमियान तआवुन और हम दर्दी पैदा हो जायेगी और इख्तिलाफ़ी चीज़ों पर एक इल्मी व तहक़ीक़ाती नज़र से हक़ व हक़ीकत तक पहुचने के लिये गुफ़्तगू व तहक़ीक़ को रास्ता हमवार हो जायेगा। चुनाँचे अहले बैत (अ) की विलायत से तमस्सुक के शेआर के साथ साथ शहादतैन के के इक़रार के फ़वायद और फ़िकही लवाज़िमात के नफ़ी नही की जा सकती, जिस तरह वहदते इस्लामी के उनवान के तहत या ताअस्सुब के ख़ातमे के नारे के ज़रिये ईमानी उसूल और उसके फ़वायद और बरकतों से चश्म पोशी नही की जा सकती।

    ताअस्सुब की नफ़ी के मायना हक़ायक़ से पीछे हट जाना नही है, बल्कि इल्मी और तहक़ीक़ाती उसूल पर ऐतेक़ादी बुनियाद को क़ायम करना है(चाहे तहक़ीक़ के सिलसिले में हो या गुफ़्तुगू और बहस से मुताल्लिक़ हो) जिसके नतीज में फ़िक्री निज़ाम और मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों के दरमियान एक दुसरे से ताअल्लुक़ात, उलफ़त और हुस्ने ख़ुल्क की बुनियाद क़ायम हों।