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    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) की अहादीस

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    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) की अहादीस (प्रवचन)

    यहां पर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की वह अहादीस (प्रवचन) जो एक इश्वरवाद, धर्मज्ञान व लज्जा आदि के संदेशो पर आधारित हैं उनमे से मात्र चालिस कथनो का चुनाव करके अपने प्रियः अध्ययन कर्ताओं की सेवा मे प्रस्तुत कर रहे हैं।

    1- अल्लाह की दृष्टि मे अहले बैत का स्थान

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पृथ्वी व आकाश के मध्य जो वस्तु भी है वह अल्लाह तक पहुँचने का साधन ढूँढती है। अल्लाह का धनयवाद है कि हम अहलेबैत सृष्टि के मध्य उस तक पहुँचने का साधन हैं।

    तथा हम पैगम्बरों के उत्तराधिकारी हैं व अल्लाह के समीप विशेष स्थान रखते हैं।

    2-नशा करने वालीं वस्तुऐं

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि मेरे पिता ने मुझ से कहा कि नशा करने वाली समस्त वस्तुऐं हराम (निषिद्ध) हैं। तथा नशा करने वाली प्रत्येक वस्तु शराब है।

    3-सर्व श्रेष्ठ स्त्री

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि सर्व श्रेष्ठ स्त्री वह है जिसे कोई पुरूष न देखे और न व किसी पुरूष को देखे। (पुरूष से अभिप्राय वह समस्त पुरूष हैं जिन से विवाह हो सकता हो।)

    4-निस्वार्थ इबादत

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि जो व्यक्ति निस्वार्थ रूप से उसकी इबादत करता है व अपने कार्यों को ऊपर भेजता है। अल्लाह उसके कार्यों का सर्व श्रेष्ठ पारितोषिक उसको भेजता है।

    5- हज़रत फ़ातिमा का गिला

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने प्रथम व द्वीतीय खलीफ़ाओं ( अबु बकर व उमर) से कहा कि क्या तुम दोनों ने सुना है कि मेरे पिता ने कहा कि फ़ातिमा की प्रसन्नता मेरी प्रसन्नता है तथा फ़ातिमा का कोप मेरा कोप है। जिसने फ़ातिमा को प्रसन्न किया उसने मुझे प्रसन्न किया तथा जिसने फ़ातिमा को क्रोधित किया उसने मुझे क्रोधित किया। यह सुनकर उन दोनों ने कहा कि हाँ हमने यह कथन पैगम्बर से सुना है। हज़रत फ़तिमा ने कहा कि मैं अल्लाह व उसके फ़रिश्तों को गवाह (साक्षी) बनाती हूँ कि तुम दोनों ने मुझे कुपित किया प्रसन्न नही किया । जब मैं पैगम्बर से भेंट करूँगी (मरणोपरान्त) तो तुम दोनों की उन से शिकायत करूँगी।

    6-निकृष्ट व्यक्ति

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि मेरे पिता ने कहा कि मेरी उम्मत (इस्लामी समाज) मे बदतरीन (निकृष्ट) व्यक्ति वह लोग हैं जो विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट पदार्थ खाते हैं, रंगबिरंगे वस्त्र पहनते हैं तथा जो मन मे आता है कह देते हैं।

    7- स्त्री व अल्लाह का समीपय

    एक दिन पैगम्बर ने अपने साथियों से प्रशन किया कि बताओ स्त्री क्या है? उन्होनें उत्तर दिया कि स्त्री नामूस (सतीत्व) है। पैगम्बर ने दूसरा प्रश्न किया कि बताओ स्त्री किस समय अल्लाह से सबसे अधिक समीप होती है? उन्होने इस प्रश्न के उत्तर मे अपनी असमर्थ्ता प्रकट की। पैगम्बर के इस प्रश्न को हज़रत    फ़ातिमा ने भी सुना तथा उत्तर दिया कि स्त्री उस समय अल्लाह से अधिक समीप होती है जब वह अपने घर मे एकांत मे बैठे। यह उत्तर सुनकर पैगम्बर ने कहा कि वास्तव मे फ़ातिमा मेरा एक अंग है।

    8- सलवात भेजने का फल

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि कि पैगम्बर ने मुझ से कहा कि ऐ फ़ातिमा जो भी तुझ पर सलवात भेजेगा अल्लाह उसको क्षमा करेगा। तथा सलवात भेजने वाला व्यक्ति स्वर्ग मे मुझ से भेंट करेगा।

    9- अली धर्म गुरू व संरक्षक

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि कि पैगम्बर ने कहा कि जिस जिस का मैं मौला हूँ अली भी उसके मौला हैं। तथा जिसका मैं घर्मगुरू हूँ अली भी उसके धर्मगुरू हैं।

    10- हज़रत    फ़ातिमा का पर्दा

    एक दिन पैगम्बर अपने एक अंधे साथी के साथ हज़रत    फ़ातिमा ज़हरा (स.) के घर मे प्रविष्ट हुए। उसको देखकर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.)  ने अपने आप को छुपा लिया। पैगम्बर ने पूछा ऐ फ़तिमा आपने अपने आपको क्यों छुपा लिया जबकि वह आपको देख भी नही सकता ? आपने उत्तर दिया कि ठीक है कि वह मुझे नही देख सकता परन्तु मैं तो उसको देख सकती हूँ। तथा वह मेरी गन्ध तो महसूस कर सकता है। यह सुनकर पैगम्बर ने कहा कि मैं साक्षी हूँ कि तू मेरे हृदय का टुकड़ा है।

    11- चार कार्य

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि कि एक बार रात्री मे जब मैं सोने के लिए शय्या बिछा रही थी  तो पैगम्बर मेरे पास आये तथा कहा कि ऐ फ़ातिमा चार कार्य किये बिना नही सोना चाहिए। और वह चारों कार्य इस प्रकार हैं (1) पूरा कुऑन पढ़ना (2) पैगम्बरों को अपना शफ़ी बनाने के लिए प्रार्थना करना। (3) नास्तिक मनुष्यो को प्रसन्न करना। (4) हज व उमरा करना। यह कह कर पैगम्बर नमाज़ पढ़ने लगें व मैं नमाज़ समाप्त होने की प्रतिक्षा करने लगीं। जब नमाज़ समाप्त हुई तो मैंने प्रर्थना की कि ऐ पैगम्बर आप ने मुझे उन कार्यों का आदेश दिया है जिनको करने की मुझ मे  क्षमता नही है। यह सुनकर पैगम्बर मुस्कुराये तथा कहा कि तीन बार सुराए तौहीद का पढ़ना पूरे कुऑन को पढ़ने के समान है।और अगर मुझ पर व मेरे से पहले वाले पैगम्बरों पर सलवात पढ़ी जाये तो हम सब शिफ़ाअत करेगें। और अगर मोमेनीन  के लिए अल्लाह से क्षमा की विनती की जाये तो वह सब प्रसन्न होंगें।और अगर यह कहा जाये कि – सुबहानल्लाहि वल हम्दो लिल्लाहि वला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर-तो यह हज व उमरे के समान है।

    12- पति की प्रसन्नता

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि वाय (हाहंत) हो उस स्त्री पर जिसका पति उससे कुपित रहता हो। व धन्य है वह स्त्री जिसका पति उससे प्रसन्न रहता हो।

    13- अक़ीक़ की अंगूठी पहनने का पुण्य

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि जो व्यक्ति अक़ीक़ (एक रत्न का नाम) की अंगूठी धारण करे उसके लिए कल्याण है।

    14- सर्वश्रेठ न्यायधीश

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि एक दिन फ़िरिश्तों के मध्य किसी बात पर बहस( वाद विवाद) हो गयी तथा उन्होंने अल्लाह से प्रार्थना की कि इसका न्याय किसी मनुष्य से करा दे,  अल्लाह ने कहा कि तुम स्वंय किसी मनुष्य को इस कार्य के लिए चुन लो। यह सुन कर उन्होने हज़रत    अली अलैहिस्सलाम  का चुनाव किया।

    15–नरकीय स्त्रीयां

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कह कि पैगम्बर ने कहा कि मैने शबे मेराज (रजब मास की 27वी रात्री जिस मे पैगम्बर आकाश की यात्रा पर गये थे) नरक मे कुछ स्त्रीयों को देखा उन मे से एक को सिर के बालों द्वारा लटका रक्खा था और इस का कारण यह था कि वह संसार मे गैर पुरूषों(परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य पुरूष) से अपने बालों को नही छुपाती थी। एक स्त्री को उसकी जीभ के द्वारा लटकाया हुआ था। तथा इस का कारण यह था कि वह अपने पति को यातनाऐं देती थी। एक स्त्री का सिर सुअर जैसा और शरीर गधे जैसा था तथा इस का कारण यह था कि वह चुगली किया करती था ।

    16-रोज़ेदार

      हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति रोज़ा रखे परन्तु अपनी ज़बान अपने कान अपनी आँख व शरीर के दूसरे अंगों को हराम कार्यों से न बचाये तो ऐसा है जैसे उसने रोज़ा न रखा हो।

    17- सर्व प्रथम मुसलमान

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने मुझसे कहा कि तेरे पति सर्व प्रथम मुसलमान हैं। तथा वह सबसे अधिक बुद्धिमान व समझदार है।

    18- पैगम्बर की संतान की साहयता

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति मेरी सन्तान के लिए कोई कार्य करे व उससे उस कार्य के बदले मे कुछ न ले तो मैं स्वंय उसको उस कार्य का बदला दूँगा।

    19- अली व उन के अनुयायी

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने एक बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम को देखने के बाद कहा कि यह व्यक्ति व इसके अनुयायी स्वर्ग मे जायेंगे।

    20- क़ियामत का दिन व अली के अनुयायी

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि आगाह (अवगत) हो जाओ कि आप व आपके अनुयायी स्वर्ग मे जायेंगे।

    21-कुऑन व अहलिबैत

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि जब मेरे पिता हज़रत पैगम्बर बीमारी की अवस्था मे अपने संसारिक जीवन के अन्तिम क्षणों मे थे तथा घर असहाब(पैगम्बर के साथीगण) से भरा हुआ था तो उन्होंने कहा कि मैं अब शीघ्र ही आप लोगों से दूर जाने वाला हूँ। (अर्थात मृत्यु होने वाली है) मैं आप लोगों के बीच अल्लाह की किताब कुऑन व अपने अहलिबैत( पवित्र वंश) को छोड़ कर जारहा हूँ। उस समय अली का हाथ पकड़ कर कहा कि यह अली कुऑन के साथ है तथा कुऑन अली के साथ है। यह दोनों कभी एक दूसरे से अलग नही होंगे यहां तक कि होज़े कौसर पर मुझ से मिलेंगे। मैं क़ियामत के दिन आप लोगों से प्रश्न करूँगा कि आपने मेरे बाद इन दोनों (कुऑन व वंश) के साथ क्या व्यवहार किया।

    22- हाथों का धोना

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि अपने अलावा किसी दूसरे की भर्त्सना न करो। किन्तु उस व्यक्ति की भर्त्सना की जासकती है जो रात्री से पूर्व अपने चिकनाई युक्त गंदे व दुर्गन्धित हाथो को न धोये।

    23- प्रफुल्ल रहना

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि जो ईमानदार व्यक्ति ख़न्दा पेशानी (प्रफुल्ल) रहता है, वह स्वर्ग मे जाने वाला है।

    24- गृह कार्य

       हज़रत  फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने अपने पिता से कहा कि ऐ पैगम्बर मेरे दोनों हाथ चक्की मे घिरे रहतें है ,एक बार गेहूँ पीसती हूँ दूसरी बार आटे को मथती हूँ।

    25- कंजूसी से हानि

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि कंजूसी (कृपणता) से बचो। क्योंकि यह एक अवगुण है तथा एक अच्छे मनुष्य का लक्ष्ण नही है। कंजूसी से बचो क्योकि यह एक नरकीय वृक्ष है ।तथा इसकी शाखाऐं संसार मे फैली हुई हैं। जो इनसे लिपटेगा वह नरक मे जायेगा।

    26- सखावत

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि दान किया करो क्यों कि दानशीलता स्वर्ग का एक वृक्ष है। जिसकी शाखाऐं संसार मे फैली हुई हैं जो इनसे लिपटेगा वह स्वर्ग मे जायेगा।

    27- पैगम्बर व उनकी पुत्री का अभिवादन

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि वह व्यक्ति जो मुझे व आपको तीन दिन सलाम करे व हमारा अभिवादन करे उसके लिए स्वर्ग है।

    28- रहस्यमयी मुस्कान

     जब पैगम्बर बीमार थे तो उन्होने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा को अपने समीप बुलाया तथा उनके कान मे कुछ कहा। जिसे सुन कर वह रोने लगीं पैगम्बर ने फिर कान मे कुछ कहा तो वह मुस्कुराने लगीं। हज़रत आयशा (पैगम्बर की एक पत्नी) कहती है कि मैने जब फ़तिमा से रोने व मुस्कुराने के बारे मे पूछा तो उन्हाने बताया कि जब पैगम्बर ने मुझे अपने स्वर्गवासी होने की सूचना दी तो मैं रोने लगी। तथा जब उन्होने मुझे यह सूचना दी कि सर्वप्रथम मै उन से भेंट करूंगी तो मैं मुस्कुराने लगी।

    29- हज़रत फ़तिमा के बच्चे

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि अल्लाह ने प्रत्येक बच्चे के लिए एक माता को बनाया तथा वह बच्चा अपनी माता से सम्बन्धित होकर अपनी माता की संतान कहलाता है परन्तु फ़ातिमा की संतान, जिनका मैं अभिभावक हूँ वह मेरी संतान कहलायेगी।

    30- वास्तविक सौभाग्य शाली

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि मुझे अभी जिब्राईल (हज़रत    पैगम्बर के पास अल्लाह की ओर से संदेश लाने वाला फ़रिश्ता) ने यह सूचना दी है कि वास्तविक भाग्यशाली व्यक्ति वह है जो मेरे जीवन मे तथा मेरी मृत्यु के बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम को मित्र रखे।

    31- पैगम्बर अहलेबैत की सभा मे

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि एक दिन मैं पैगम्बर के पास गईं तो पैगम्बर ने मेरे बैठने के लिए एक बड़ी चादर बिछाई तथा मुझे बैठाया। मेरे बाद हसन व हुसैन आये उनसे कहा कि तुम भी अपनी माता के पास बैठ जाओ। तत्पश्चात अली आये तो उनसे भी कहा कि अपनी पत्नी व बच्चों के पास बैठ जाओ। जब हम सब बैठ गये तो उस चादर को पकड़ कर कहा कि ऐ अल्लाह यह मुझ से हैं और मैं इन से हूँ। तू इनसे उसी प्रकार प्रसन्न रह जिस प्रकार मैं इनसे प्रसन्न हूँ।

    32- पैगम्बर की दुआ

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर मस्जिद मे प्रविष्ट होते समय कहते थे कि शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से ऐ अल्लाह मुझ पर दरूद भेज व मेरे गुनाहों को माफ़ कर व मेरे लिए अपनी दया के दरवाज़ों को खोल दे। और जब मस्जिद से बाहर आते तो कहते कि शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से ऐ अल्लाह मुझ पर दरूद भेज व मेरे गुनाहों माफा कर व मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़ों को खोल दे।

    33- सुबाह सवेरे उठना

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि एक दिन सुबाह सवेरे पैगम्बर मेरे पास आये मैं सो रही थी। उन्होंने मेरे पैरों को हिलाकर उठाया तथा कहा कि ऐ प्यारी बेटी उठो तथा अल्लाह के जीविका वितरण का अवलोकन करो व ग़ाफ़िल (निश्चेत) न रहो क्योकि अल्लाह अपने बंदों को रात्री के समाप्त होने व सूर्योद्य के मध्य जीविका प्रदान करता है।

    34- रोगी अल्लाह की शरण मे

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि जब कोई आस्तिक व्यक्ति रोगी होता है तो अल्लाह फ़रिश्तों से कहता है कि इसके कार्यों को न लिखो क्योकि यह जब तक रोगी है मेरी शरण मे है। तथा यह मेरा अधिकार है कि उसे रोग से स्वतन्त्र  करू या उसके प्राण लेलूँ।

    35- स्त्रीयों का आदर

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि आप लोगों के मध्य सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वह है जो दूसरों के साथ विन्रमतापूर्ण व्यवहार करे तथा स्त्रीयों का आदर करे।

    36- दासों को स्वतन्त्र करने का फल

    हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि जो व्यक्ति एक मोमिन दास को स्वतन्त्र करे तो दास के प्रत्येक अंग के बदले मे स्वतन्त्रकर्ता का प्रत्येक अंग नरकीय आग से सुरक्षित हो जायेगा।

    37- दुआ के स्वीकार होने का समय

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि अगर कोई मुसलमान शुक्रवार को सूर्यास्त के समय अल्लाह से कोई दुआ करे तो उसकी दुआ स्वीकार होगी।

    38- नमाज़ मे आलस्य

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि मैंने अपने पिता से प्रश्न किया कि जो स्त्री व पुरूष नमाज़ पढ़ने मे आलस्य करते हैं उनके साथ कैसा व्यवहार किया जायेगा ? पैगम्बर ने उत्तर दिया कि ऐसे व्यक्तियों को अल्लाह 15 विपत्तियों मे ग्रस्त करता है। जो इस प्रकार हैं—–

    (1) अल्लाह उसकी आयु को कम कर देता है। (2) उसकी जीविका को कम कर देता है (3) उसके चेहरे से तेज छीन लेता है।( 4) पुण्यों का फल उसको नही दिया जायेगा ( 5) उसकी दुआ स्वीकृत नही होगी ( 6) नेक व्यक्तियों की दुआ उसको कोई लाभ नही पहुँचायेगी(7) वह अपमानित होगा (8) भूख की अवस्था मे मृत्यु होगी (9) प्यासा मरेगा इस प्रकार कि अगर संसार के समस्त समुन्द्र भी उसकी प्यास बुझाना चाहें तो उसकी प्यास नही बुझेगी। (10) अल्लाह उसके लिए एक फ़रिश्ते को नियुक्त करेगा जो उसे कब्र मे यातनाऐं देगा। (11) उस की कब्र को तंग कर दिया जायेगा। (12) उस की कब्र अंधकारमय बनादी जायेगी। (13) अल्लाह उस के ऊपर फ़रिश्तों को नियुक्त करेगा जो उसको मुँह के बल पृथ्वी पर घसीटेंगें तथा दूसरे समस्त लोग उसको देखेंगें। (14) उससे सख्ती के साथ उसके कार्यों का हिसाब लिया जायेगा। (15)अल्लाह उसकी ओर नही देखेगा और न ही उसको पवित्र करेगा अपितु उसको दर्द देने वाला दण्ड दिया जायेगा।

    39- अत्याचारी की पराजय

     हज़रत फ़ातिमा ज़हरा(स.) ने कहा कि पैगम्बर ने कहा कि जब दो अत्याचारी सेनाऐं आपस मे लड़ेंगी तो जो अधिक अत्याचारी होगी उस की पराजय होगी।

    40- हज़रत   फ़तिमा ज़हरा(स.) के मस्जिद मे दिये गये भाषण के विशिष्ठ अंग।

    तुम को शिर्क से पवित्र करने के लिए अल्लाह ने ईमान को रखा।

    तुम को अहंकार से पवित्र करने के लिए अल्लाह ने नमाज़ को रखा।

    तुम्हारे जान व माल को पवित्र करने के लिए अल्लाह ने ज़कात को रखा।

    तुमहारे इख्लास (निस्वार्थता) को परखने के लिए रोज़े को रखा।

    दीन को शक्ति प्रदान करने के लिए हज को रखा।

    तुम्हारे दिलों को अच्छा रखने के लिए न्याय को रखा।

    इस्लामी समुदाय को व्यवस्थित रखने के लिए हमारी अज्ञा पालन को अनिवार्य किया।

    मत भेद को दूर करने के लिए हमारी इमामत को अनिवार्य किया।

    इस्लाम के स्वाभिमान को बाक़ी रखने के लिए धर्म युद्ध को रखा।

    समाजिक कल्याण के लिए अमरे बिल मारूफ़( आपस मे एक दूसरे को अच्छे कार्यों के लिए निर्देश देना) को रखा।

    अपने क्रोध से दूर रखने के लिए अल्लाह ने माता पिता के साथ सद्व्यवहार करने का आदेश दिया।

    आपसी प्रेम को बढ़ाने के लिए परिवारजनों से अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया।

    समाज से हत्याओं को समाप्त करने के लिए हत्या के बदले का आदेश दिया।

    मुक्ति प्रदान करने के लिए मन्नत को पूरा करने का आदेश दिया।

    कम लेने देने से बचाने के लिए तुला व अन्य मापने के यन्त्रों को रखा गया।

    बुराई से बचाने के लिए मदीरा पान से रोका गया।

    लानत से बचाने के लिए एक दूसरे पर झूटा आरोप लगाने से रोका गया(लानत अर्थात अल्लाह की दया व कृपा से दूरी)

    पवित्रता को बनाए रखने के लिए चोरी से रोका गया।

    अल्लाह के प्रति निस्वार्थ रहने के लिए शिर्क से दूरी का आदेश दिया गया(शिर्क अर्थात किसी को अल्लाह का सम्मिलित मानना)।

    बस मनुष्य को चाहिए कि अल्लाह से इस प्रकार डरे जिस प्रकार उस से डरना चाहिए तथा मरते समय तक मुसलमान रहना चाहिये।

    अल्लाह के आदेशों का इस तरह पालन करो कि उसने जिन कार्यों के करने का आदेश दिया है उनको करो ।तथा जिन कार्यों से रोका है उनको न करो। केवल ज्ञानी नुष्य ही अल्लाह से डरते हैं।