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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 42 ईश्वरीय दूत और अनुसरण

    Rate this post कुछ लोग यह शंका करते हैं कि यदि ईश्वर ने अपने दूतों को लोगों के मार्गदर्शन के लिए भेजा और उसके दूतों ने यह काम पूरी ज़िम्मेदारी से किया तो फिर विश्व में इतने अधिक लोग पाप क्यों करते हैं? और क्यों इतने व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार दिखाई देता है? क्या यह […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म 41 ईश्वर और उसके दूत

    Rate this post वास्तव में ईश्वरीय दूत ही मनुष्य द्वारा ईश्वर की पहचान में मुख्य सहायक होते हैं इस लिए ईश्वरीय दूतों की पहचान वास्तव में ईश्वर की पहचान का एक भाग है। इस से पहले इस श्रंखला के आरंभ में हम विस्तार से इस बात पर चर्चा कर चुके हैं कि बुद्धि रखने वाले […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म 40- ईश्वर का न्याय और प्राकृतिक आपदायें

    Rate this post कुछ लोगों का यह कहना है कि मानव जीवन में इतने दुखों के बावजूद और बाढ़, भूकंप तथा युद्ध जैसी प्राकृतिक व मानवीय समस्याओं के होते हुए किस प्रकार संभव है कि कोई ईश्वर को पूर्ण रूप से न्यायी माने? अर्थात शंका करने वालों का यह कहना है कि जब बाढ़ आती […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 39-मृत्यु और न्याय

    Rate this post ईश्वर के न्याय और उसकी सूझबूझ व उसके तत्वज्ञान पर आपत्ति करने वाले कुछ लोगों का यह कहना है कि यदि ईश्वर के तत्वज्ञान व सूझबूझ के अनुसार इस धरती पर मनुष्य का जीवन ईश्वर का उद्देश्य है तो फिर वह मनुष्य को मृत्यु क्यों देता है? अर्थात कुछ लोगों का कहना […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 38- ईश्वर अपनी हर रचना से प्रेम करता है

    Rate this post ईश्वर न्यायी है यह लगभग सभी लोग मानते हैं किंतु बहुत लोग इस पर यह आपत्ति करते हैं कि ईश्वर की विभिन्न रचनाओं और स्वंय मनुष्य में पाई जाने वाली विविधता और विभिन्नता किस प्रकार से ईश्वर के न्याय के अनुरूप हो सकती है और न्यायी व तत्वदर्शी ईश्वर ने क्यों अपनी […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 37- महान ईश्वर और तत्वज्ञान

    Rate this post जैसाकि हमने अपनी पिछली चर्चाओं में कहा कि एक व्याख्या के अनुसार ईश्वरीय न्याय ईश्वरीय तत्वदर्शिता का एक भाग है और दूसरी व्याख्या के अनुसार न्याय ही तत्वदर्शिता है। ईश्वर की तत्वदर्शिता या तत्वज्ञान का अर्थ है कि ईश्वर हर काम वैसा ही करता है जैसाकि उसे होना चाहिए अर्थात उसका हर […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 36- न्याय और उसका अर्थ

    Rate this post न्याय को अरबी भाषा में अद्ल कहा जाता है उस का अर्थ होता है समान बनाना और आम- बोलचाल में इस का अर्थ होता है दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखना और इसके विपरीत अत्याचार होता है। इस प्रकार न्याय की परिभाषा यह हैः हर वस्तु या व्यक्ति को उसका अधिकार देना […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म 35- ईश्वर और न्याय

    Rate this post ईश्वर का न्याय भी उन विषयों में से है जिन के बारे में बुद्धिजीवियों और विशेषज्ञों में मतभेद पाया जाता है और इस संदर्भ में उन्होंने भिन्न- भिन्न विचार प्रस्तुत किये हैं। ईश्वर के न्याय के संदर्भ में विभिन्न प्रकार के विचार वास्तव में इस विषय के महत्व के कारण हैं और […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म 34- मनुष्य का भाग्य एवं कर्म

    Rate this post मनुष्य जो कुछ करता है या जो कुछ उसके साथ होता है उसके दो कारक होते हैं एक स्वंय मनुष्य का इरादा और दूसरे ईश्वर का इरादा किंतु प्रश्न यह है कि यदि भाग्य है तो फिर कैसा है, अर्थात यदि मनुष्य और ईश्वर दोनों का इरादा प्रभावी है तो किस प्रकार […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 33- मनुष्य और उसके कर्म

    Rate this post सब से पहले तो हमें यह समझना होगा कि भाग्य क्या है? वास्तव में भाग्य किसी घटना के लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित चरणों और उसके परिणाम को कहा जाता है। ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य के कई प्रकार हैं किंतु यहां पर हम अत्यधिक जटिल चर्चा से बचते हुए केवल व्यवहारिक भाग्य के […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर् 32- धर्म और भाग्य

    Rate this post मनुष्य का भाग्य या क़िस्मत उन विषयों में से है जिनका सही चित्र बहुत कम लोगों के मन में होगा। भाग्य के बारे में बहुत से प्रश्न उठते हैं। सब से पहले तो यह कि भाग्य है क्या? भाग्य के बारे में यदि आम लोगों से पूछा जाए कि वह क्या है […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म 31-महान ईश्वर सर्वज्ञाता है

    Rate this post जो लोग यह मानते हैं कि मनुष्य का हर काम ईश्वर के आदेश से होता है और मनुष्य में अपना कोई इरादा नहीं होता और वह अपने इरादे से कोई काम नहीं कर सकता उनका कहना है कि मनुष्य का इरादा आंतिरक रूचियों व रुझानों से बनता है और यह आंतरिक रूचियां […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म ३० मनुष्य और परिपूर्णता

    Rate this post इससे पहले वाली चर्चा में हमने कहा था कि कर्मों के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने तीसरा मार्ग सुझाया है अर्थात न ही ईश्वर मनुष्य के समस्त कामों में पूर्ण रूप से हस्तक्षेप करता है और न ही पूर्ण रूप से उसने समस्त कामों को मनुष्य के ऊपर छोड़ दिया […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 29 कर्मो का ज़िम्मेदार मनुष्य

    Rate this post ईश्वर मुख्य कारक है और वही सब कुछ करता है और उसकी अनुमति के बिना एक पत्ता की नहीं खड़कता यह ऐसे वाक्य हैं जो विदित रूप से बिल्कुल सही लगते हैं किंतु इन वाक्यों और उनके अर्थों को समझने के लिए बहुत अधिक चिंतन व गहराई की आवश्यकता है। अर्थात क्रियाओं […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 28 ईश्वर के एक होने के तर्क

    Rate this post ईश्वर एक है इसके बहुत से तर्क प्रस्तुत किये गये हैं और ईश्वर एक है या कई यह विषय अत्यधिक प्राचीन है और इस पर बहुत चर्चा हो चुकी है और जैसा कि हम ने पिछले कार्यक्रम में बताया था ईश्वरीय दूतों के संघर्ष का बहुत बड़ा भाग अनेकेश्वरवाद में विश्वास रखने […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 27 सबका पालनहार एक है

    Rate this post अब तक हमने जिस ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया है और उसके जो गुण बताए हैं वह कितने ईश्वर हैं? अर्थात ईश्वर एक है या कई? इस बारे में कि अनेकेश्वरवादी विचार धारा या कई ईश्वरों में विश्वास किस प्रकार से मनुष्य में पैदा हुआ, विभिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हैं। यह […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म- 26 संभव वस्तु और कारक

    Rate this post हर निर्भर अस्तित्व या संभव अस्तित्व को कारक की आवश्यकता होती है और इस इस सिद्धान्त से कोई भी अस्तित्व बाहर नहीं है किंतु चूंकि ईश्वर का अस्तित्व इस प्रकार का अर्थात संभव व निर्भर नहीं होता इस लिए उस पर यह नियम लागू नहीं होता।भौतिक विचार धारा के कुछ मूल सिद्धान्त […]

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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 25- कारक और ईश्वर

    Rate this post पश्चिमी बुद्धिजीवी ईश्वर के अस्तित्व की इस दलील पर कि हर वस्तु के लिए एक कारक और बनाने वाला होना चाहिए यह आपत्ति भी करते हैं कि यदि यह सिदान्त सर्वव्यापी है अर्थात हर अस्तित्व के लिए एक कारक का होना हर दशा में आवश्यक है तो फिर यह सिद्धान्त ईश्वर पर […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म-24 नास्तिकता व भौतिकता-2

    Rate this post भ्रष्टाचार और ईश्वर के इन्कार के कारकों की समीक्षा से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन में प्रत्येक कारक को समाप्त और निवारण के लिए विशेष प्रकार की शैली व मार्ग की आवश्यकता है उदाहरण स्वरूप मानसिक व नैतिक कारकों को सही प्रशिक्षण और उससे होने वाली हानियों की ओर ध्यान […]

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    सृष्टि, ईश्वर और धर्म-23 नास्तिकता और भौतिकता

    Rate this post नास्तिकता और भौतिकता का इतिहास बहुत प्राचीन है और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार प्राचीन काल से ही ईश्वर पर विश्वाश रखने वाले लोग थे, उसी प्रकार उसका इन्कार करने वाले भी लोग मौजूद थे किंतु उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं थी परंतु १८ वीं […]

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