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    सूरए अम्बिया, आयतें 95-99, (कार्यक्रम 587)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 95 की तिलावत सुनें। وَحَرَامٌ عَلَى قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا أَنَّهُمْ لَا يَرْجِعُونَ (95) और जिस बस्ती को हमने विनष्ट कर दिया उसके (लोगों के) लिए असंभव है कि (वे संसार में वापस लौटें) वे कदापि वापस न लौटेंगे। (21:95) इससे पहले की आयतों में उन भले […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 89-94, (कार्यक्रम 586)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 89 और 90वीं आयतों की तिलावत सुनें। وَزَكَرِيَّا إِذْ نَادَى رَبَّهُ رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنْتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ (89) فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَوَهَبْنَا لَهُ يَحْيَى وَأَصْلَحْنَا لَهُ زَوْجَهُ إِنَّهُمْ كَانُوا يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا وَرَهَبًا وَكَانُوا لَنَا خَاشِعِينَ (90) और (हे पैग़म्बर!) ज़करिया को भी याद कीजिए […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 83-88, (कार्यक्रम 585)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 83वीं और 84वीं आयतों की तिलावत सुनें। وَأَيُّوبَ إِذْ نَادَى رَبَّهُ أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ (83) فَاسْتَجَبْنَا لَهُ فَكَشَفْنَا مَا بِهِ مِنْ ضُرٍّ وَآَتَيْنَاهُ أَهْلَهُ وَمِثْلَهُمْ مَعَهُمْ رَحْمَةً مِنْ عِنْدِنَا وَذِكْرَى لِلْعَابِدِينَ (84) और (हे पैग़म्बर!) अय्यूब को याद कीजिए जबकि उन्होंने अपने पालनहार को […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 79-82, (कार्यक्रम 584)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 79वीं आयत की तिलावत सुनें। فَفَهَّمْنَاهَا سُلَيْمَانَ وَكُلًّا آَتَيْنَا حُكْمًا وَعِلْمًا وَسَخَّرْنَا مَعَ دَاوُودَ الْجِبَالَ يُسَبِّحْنَ وَالطَّيْرَ وَكُنَّا فَاعِلِينَ (79) तो हमने सुलैमान को (वास्तविक फ़ैसला) समझा दिया और दोनों में से प्रत्येक को हमने तत्वदर्शिता और ज्ञान प्रदान किया था। और हमने पहाड़ों और पक्षियों को […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 74-78, (कार्यक्रम 583)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 74वीं और 75वीं आयतों की तिलावत सुनें।  وَلُوطًا آَتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ تَعْمَلُ الْخَبَائِثَ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمَ سَوْءٍ فَاسِقِينَ (74) وَأَدْخَلْنَاهُ فِي رَحْمَتِنَا إِنَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ (75) और हमने लूत को तत्वदर्शिता व ज्ञान प्रदान किया और उन्हें उस बस्ती से छुटकारा दिलाया […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 68-73, (कार्यक्रम 582)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 68वीं और 69वीं आयतों की तिलावत सुनें।  قَالُوا حَرِّقُوهُ وَانْصُرُوا آَلِهَتَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ (68) قُلْنَا يَا نَارُ كُونِي بَرْدًا وَسَلَامًا عَلَى إِبْرَاهِيمَ (69) अनेकेश्वरवादियों ने कहाः यदि तुम कुछ करना ही चाहते हो तो उसे जला दो और अपने पूज्यों की सहायता करो। (21:68) हमने कहाः […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 62-67, (कार्यक्रम 581)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 62वीं और 63वीं आयतों की तिलावत सुनें।  قَالُوا أَأَنْتَ فَعَلْتَ هَذَا بِآَلِهَتِنَا يَا إِبْرَاهِيمُ (62) قَالَ بَلْ فَعَلَهُ كَبِيرُهُمْ هَذَا فَاسْأَلُوهُمْ إِنْ كَانُوا يَنْطِقُونَ (63) उन्होंने कहाः(हे इब्राहीम!) क्या तुमने हमारे पूज्यों के साथ यह काम किया है?(21:62) उन्होंने कहाः बल्कि उनके इस बड़े (अर्थात सबसे बड़ी […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 57-61, (कार्यक्रम 580)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 57वीं और 58वीं आयतों की तिलावत सुनें।  وَتَاللَّهِ لَأَكِيدَنَّ أَصْنَامَكُمْ بَعْدَ أَنْ تُوَلُّوا مُدْبِرِينَ (57) فَجَعَلَهُمْ جُذَاذًا إِلَّا كَبِيرًا لَهُمْ لَعَلَّهُمْ إِلَيْهِ يَرْجِعُونَ (58) और ईश्वर की सौगंध! (नगर से) तुम्हारे निकलने के बाद मैं तुम्हारी मूर्तियों के बारे में अवश्य ही कुछ न कुछ व्यवस्था करूंगा। […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 51-56, (कार्यक्रम 579)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 51वीं और 52वीं आयतों की तिलावत सुनें।  وَلَقَدْ آَتَيْنَا إِبْرَاهِيمَ رُشْدَهُ مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا بِهِ عَالِمِينَ (51) إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَا هَذِهِ التَّمَاثِيلُ الَّتِي أَنْتُمْ لَهَا عَاكِفُونَ (52) और इससे पहले हमने इब्राहीम को बौद्धिक प्रगति प्रदान कर दी थी और हम उन (की योग्यताओं) को […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 46-50, (कार्यक्रम 578)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 46वीं और 47वीं आयतों की तिलावत सुनें। وَلَئِنْ مَسَّتْهُمْ نَفْحَةٌ مِنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَاوَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ (46) وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا وَإِنْ كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا وَكَفَى بِنَا حَاسِبِينَ (47) और यदि तुम्हारे पालनहार के दंड का […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 42-45, (कार्यक्रम 577)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 42वीं और 43वीं आयतों की तिलावत सुनें। قُلْ مَنْ يَكْلَؤُكُمْ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ مِنَ الرَّحْمَنِ بَلْ هُمْ عَنْ ذِكْرِ رَبِّهِمْ مُعْرِضُونَ (42) أَمْ لَهُمْ آَلِهَةٌ تَمْنَعُهُمْ مِنْ دُونِنَا لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنْفُسِهِمْ وَلَا هُمْ مِنَّا يُصْحَبُونَ (43) और (हे पैग़म्बर! ईश्वर का इन्कार करने वालों से) कह दीजिए […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 38-41, (कार्यक्रम 576)

    Rate this post   आइये पहले सूरए अम्बिया की 38वीं और 39वीं आयतों की तिलावत सुनें। وَيَقُولُونَ مَتَى هَذَا الْوَعْدُ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (38) لَوْ يَعْلَمُ الَّذِينَ كَفَرُوا حِينَ لَا يَكُفُّونَ عَنْ وُجُوهِهِمُ النَّارَ وَلَا عَنْ ظُهُورِهِمْ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ (39) और काफ़िर कहते हैं कि यदि तुम सच्चे हो तो (प्रलय का) यह वादा […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 34-37, (कार्यक्रम 575)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 34वीं और 35वीं आयतों की तिलावत सुनें। وَمَا جَعَلْنَا لِبَشَرٍ مِنْ قَبْلِكَ الْخُلْدَ أَفَإِنْ مِتَّ فَهُمُ الْخَالِدُونَ (34) كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ وَنَبْلُوكُمْ بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ (35) और (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पहले भी किसी मनुष्य के लिए अमर जीवन नहीं रखा है। तो क्या […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 30-33, (कार्यक्रम 574)

    Rate this post   आइये पहले सूरए अम्बिया की 30वीं आयत की तिलावत सुनें। أَوَلَمْ يَرَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ كَانَتَا رَتْقًا فَفَتَقْنَاهُمَا وَجَعَلْنَا مِنَ الْمَاءِ كُلَّ شَيْءٍ حَيٍّ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ (30) क्या काफ़िरों ने नहीं देखा कि ये आकाश और धरती बन्द थे तो हमने उन्हें खोल दिया? और हमने पानी से हर […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 25-29, (कार्यक्रम 573)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 25वीं आयत की तिलावत सुनें। وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ (25) (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पहले जो भी पैग़म्बर भेजा अवश्य ही उसकी ओर अपना विशेष संदेश वहि भेज कर कहा कि मेरे अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 21-24, (कार्यक्रम 572)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की 21वीं और 22वीं आयतों की तिलावत सुनें। أَمِ اتَّخَذُوا آَلِهَةً مِنَ الْأَرْضِ هُمْ يُنْشِرُونَ (21) لَوْ كَانَ فِيهِمَا آَلِهَةٌ إِلَّا اللَّهُ لَفَسَدَتَا فَسُبْحَانَ اللَّهِ رَبِّ الْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ (22) या अनेकेश्वरवादियों ने धरती से कुछ पूज्य बना लिए हैं जो उन्हें जीवित करते हैं?(21:21) यदि आकाशों और […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 16-20, (कार्यक्रम 571)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की सोलहवीं और सत्रहवीं आयतों की तिलावत सुनें। وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاءَ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَاعِبِينَ (16) لَوْ أَرَدْنَا أَنْ نَتَّخِذَ لَهْوًا لَاتَّخَذْنَاهُ مِنْ لَدُنَّا إِنْ كُنَّا فَاعِلِينَ (17) और हमने आकाश और धरती को और जो कुछ उनके मध्य है, खेल-तमाशे के लिए नहीं बनाया है। (21:16) यदि […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 11-15, (कार्यक्रम 570)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की ग्यारहवीं और बारहवीं आयतों की तिलावत सुनें। وَكَمْ قَصَمْنَا مِنْ قَرْيَةٍ كَانَتْ ظَالِمَةً وَأَنْشَأْنَا بَعْدَهَا قَوْمًا آَخَرِينَ (11) فَلَمَّا أَحَسُّوا بَأْسَنَا إِذَا هُمْ مِنْهَا يَرْكُضُونَ (12) और कितनी ही बस्तियों को, जो अत्याचारी थीं, हमने विनष्ट कर दिया और उनके बाद हमने दूसरी जातियों को पैदा किया। […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 569)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की सातवीं और आठवीं आयतों की तिलावत सुनें। وَمَا أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (7) وَمَا جَعَلْنَاهُمْ جَسَدًا لَا يَأْكُلُونَ الطَّعَامَ وَمَا كَانُوا خَالِدِينَ (8) और (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पहले भी जिन लोगों को पैग़म्बर बनाकर भेजा है वे […]

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    सूरए अम्बिया, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 568)

    Rate this post आइये पहले सूरए अम्बिया की पहली आयत की तिलावत सुनें। بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ اقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ مُعْرِضُونَ (1) अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। लोगों का हिसाब उनके निकट आ गया और वे हैं कि निश्चेतना में (डूबे हुए) मुंह मोड़े चले जा रहे […]

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