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    सूरए तौबा, आयतें 48-51, (कार्यक्रम 307)

    Rate this post आइये पहले सूरए तौबा की 48वीं आयत की तिलावत सुनें।لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِنْ قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ حَتَّى جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ كَارِهُونَ (48)निश्चित रूप से मिथ्याचारियों ने इससे पूर्व भी बिगाड़ और विवाद उत्पन्न करने का प्रयास किया था और (हे पैग़म्बर!) वे आपके समक्ष बातों को उलटा दर्शाते […]

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    सूरए तौबा, आयतें 43-47, (कार्यक्रम 306)

    Rate this post आइये पहले सूरए तौबा की 43वीं आयत की तिलावत सुनें।عَفَا اللَّهُ عَنْكَ لِمَ أَذِنْتَ لَهُمْ حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكَ الَّذِينَ صَدَقُوا وَتَعْلَمَ الْكَاذِبِينَ (43) हे पैग़म्बर! ईश्वर ने आपको क्षमा किया, कि क्यों आपने उन्हें पीछे रह जाने की अनुमति दे दी बिना यह स्पष्ट हुए कि कौन लोग सच्चे हैं और कौन […]

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    सूरए तौबा, आयतें 40-42, (कार्यक्रम 305)

    Rate this post आइये पहले सूरए तौबा की 40वीं आयत की तिलावत सुनें।إِلَّا تَنْصُرُوهُ فَقَدْ نَصَرَهُ اللَّهُ إِذْ أَخْرَجَهُ الَّذِينَ كَفَرُوا ثَانِيَ اثْنَيْنِ إِذْ هُمَا فِي الْغَارِ إِذْ يَقُولُ لِصَاحِبِهِ لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللَّهَ مَعَنَا فَأَنْزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَيْهِ وَأَيَّدَهُ بِجُنُودٍ لَمْ تَرَوْهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ الَّذِينَ كَفَرُوا السُّفْلَى وَكَلِمَةُ اللَّهِ هِيَ الْعُلْيَا وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ […]

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    सूरए तौबा, आयतें 36-39, (कार्यक्रम 304)

    Rate this post आइये पहले सूरए तौबा की 36वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِنْدَ اللَّهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا فِي كِتَابِ اللَّهِ يَوْمَ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ مِنْهَا أَرْبَعَةٌ حُرُمٌ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ فَلَا تَظْلِمُوا فِيهِنَّ أَنْفُسَكُمْ وَقَاتِلُوا الْمُشْرِكِينَ كَافَّةً كَمَا يُقَاتِلُونَكُمْ كَافَّةً وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ (36)निश्चित रूप से ईश्वर के निकट, ईश्वर […]

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    सूरए तौबा, आयतें 31-35, (कार्यक्रम 303)

    Rate this post आइये पहले सूरत तौबा की आयत क्रमांक 31 की तिलावत सुनें।اتَّخَذُوا أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ أَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللَّهِ وَالْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا إِلَهًا وَاحِدًا لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ سُبْحَانَهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ (31)आसमानी किताब वालों ने ईश्वर को छोड़ कर धर्म के ज्ञानियों, बैरागियों और मरयम के पुत्र (ईसा) मसीह को […]

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    सूरए तौबा, आयतें 28-30, (कार्यक्रम 302)

    Rate this post आइये पहले सूरए तौबा की 28वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ فَلَا يَقْرَبُوا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هَذَا وَإِنْ خِفْتُمْ عَيْلَةً فَسَوْفَ يُغْنِيكُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ إِنْ شَاءَ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (28) हे ईमान वालो! निश्चित रूप से अनेकेश्वरवादी अपवित्र हैं तो इस वर्ष के बाद […]

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    सूरए तौबा, आयतें 23-27, (कार्यक्रम 301)

    Rate this post आइये पहले सूरए तौबा की 23वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا آَبَاءَكُمْ وَإِخْوَانَكُمْ أَوْلِيَاءَ إِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْإِيمَانِ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَأُولَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ (23)हे ईमान वालो! यदि तुम्हारे पिताओं और भाइयों ने कुफ़्र को ईमान पर प्राथमिकता दी तो तुम उन्हें अपना अभिभावक न बनाओ। और […]

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    सूरए तौबा, आयतें 17-22, (कार्यक्रम 300)

    Rate this post आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 17 और 18 की तिलावत सुनते हैं।مَا كَانَ لِلْمُشْرِكِينَ أَنْ يَعْمُرُوا مَسَاجِدَ اللَّهِ شَاهِدِينَ عَلَى أَنْفُسِهِمْ بِالْكُفْرِ أُولَئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ وَفِي النَّارِ هُمْ خَالِدُونَ (17) إِنَّمَا يَعْمُرُ مَسَاجِدَ اللَّهِ مَنْ آَمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآَتَى الزَّكَاةَ وَلَمْ يَخْشَ إِلَّا اللَّهَ فَعَسَى أُولَئِكَ أَنْ […]

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    सूरए तौबा, आयतें 12-16, (कार्यक्रम 299)

    Rate this post आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 12 और 13 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ نَكَثُوا أَيْمَانَهُمْ مِنْ بَعْدِ عَهْدِهِمْ وَطَعَنُوا فِي دِينِكُمْ فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ إِنَّهُمْ لَا أَيْمَانَ لَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَنْتَهُونَ (12) أَلَا تُقَاتِلُونَ قَوْمًا نَكَثُوا أَيْمَانَهُمْ وَهَمُّوا بِإِخْرَاجِ الرَّسُولِ وَهُمْ بَدَءُوكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ أَتَخْشَوْنَهُمْ فَاللَّهُ أَحَقُّ أَنْ تَخْشَوْهُ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ […]

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    सूरए तौबा, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 298)

    Rate this post आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 7 की तिलावत सुनते हैं।كَيْفَ يَكُونُ لِلْمُشْرِكِينَ عَهْدٌ عِنْدَ اللَّهِ وَعِنْدَ رَسُولِهِ إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدْتُمْ عِنْدَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ فَمَا اسْتَقَامُوا لَكُمْ فَاسْتَقِيمُوا لَهُمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ (7)(संधि तोड़ने वाले) अनेकेश्वरवादियों का कोई समझौता ईश्वर और उसके पैग़म्बर के निकट किस प्रकार बाक़ी रह सकता […]

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    सूरए तौबा, आयतें 4-6, (कार्यक्रम 297)

    Rate this post आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या चार की तिलावत सुनते हैं।إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدْتُمْ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ثُمَّ لَمْ يَنْقُصُوكُمْ شَيْئًا وَلَمْ يُظَاهِرُوا عَلَيْكُمْ أَحَدًا فَأَتِمُّوا إِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ إِلَى مُدَّتِهِمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ (4)सिवाय उन अनेकेश्वरवादियों के, जिनसे तुम ने समझौता कर रखा है और उन्होंने (समझौते के पालन में) तुम्हारे प्रति […]

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    सूरए तौबा, आयतें 1-3, (कार्यक्रम 296)

    Rate this post पिछले कार्यक्रम में सूरए अन्फ़ाल की व्याख्या समाप्त हुई। आज हम क़ुरआने मजीद के नवें सूरे अर्थात तौबा की व्याख्या आरंभ कर रहे हैं। सूरए तौबा को सूरए बराअत भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है विरक्तता। क्योंकि इस सूरे का आरंभ, अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता की घोषणा से हो रहा है, […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 73-75, (कार्यक्रम 295)

    Rate this post आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 73 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ إِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِي الْأَرْضِ وَفَسَادٌ كَبِيرٌ (73)और जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया वे एक दूसरे के मित्र व समर्थक हैं और यदि तुम (काफ़िरों के संबंध में ईश्वर के आदेशों का) पालन न करो […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 70-72, (कार्यक्रम 294)

    Rate this post आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 70 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ فِي أَيْدِيكُمْ مِنَ الْأَسْرَى إِنْ يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّا أُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (70) हे पैग़म्बर! जो युद्ध के बंदी आपके नियंत्रण में हैं उनसे कह दीजिए कि यदि […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 65-69, (कार्यक्रम 293)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 65 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ حَرِّضِ الْمُؤْمِنِينَ عَلَى الْقِتَالِ إِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ عِشْرُونَ صَابِرُونَ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِ وَإِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِئَةٌ يَغْلِبُوا أَلْفًا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ (65)हे पैग़म्बर, आप ईमान वालों को जेहाद के लिए तैयार करें। यदि आप में […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 60-64, (कार्यक्रम 292)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 60 की तिलावत सुनते हैं।وَأَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ وَمِنْ رِبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِهِ عَدُوَّ اللَّهِ وَعَدُوَّكُمْ وَآَخَرِينَ مِنْ دُونِهِمْ لَا تَعْلَمُونَهُمُ اللَّهُ يَعْلَمُهُمْ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ فِي سَبِيلِ اللَّهِ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ (60)और तुम लोग शत्रुओं से मुक़ाबले के लिए […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 55-59, (कार्यक्रम 291)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 55 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِنْدَ اللَّهِ الَّذِينَ كَفَرُوا فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (55)निसंदेह, धरती पर चलने वालों में सबसे बुरे वे हैं जिन्होंने कुफ़्र अपनाया तो (अब) वे ईमान वाले नहीं हैं। (8:55)पिछले कार्यक्रमों में पैग़म्बरों की सच्ची बातों के प्रति काफ़िरों के […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 50-54, (कार्यक्रम 290)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 50 और 51 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ تَرَى إِذْ يَتَوَفَّى الَّذِينَ كَفَرُوا الْمَلَائِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَأَدْبَارَهُمْ وَذُوقُوا عَذَابَ الْحَرِيقِ (50) ذَلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِلْعَبِيدِ (51)और (हे पैग़म्बर!) यदि आप देखते कि जब फ़रिशते उनकी जान निकाल रहे थे और उनके […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 46-49, (कार्यक्रम 289)

    Rate this post आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 46 की तिलावत सुनते हैं।وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ رِيحُكُمْ وَاصْبِرُوا إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ (46)और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन करो और आपस में न झगड़ो कि तुम कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी और धैर्य से काम लो […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 42-45, (कार्यक्रम 288)

    Rate this post आइये सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 42 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ أَنْتُمْ بِالْعُدْوَةِ الدُّنْيَا وَهُمْ بِالْعُدْوَةِ الْقُصْوَى وَالرَّكْبُ أَسْفَلَ مِنْكُمْ وَلَوْ تَوَاعَدْتُمْ لَاخْتَلَفْتُمْ فِي الْمِيعَادِ وَلَكِنْ لِيَقْضِيَ اللَّهُ أَمْرًا كَانَ مَفْعُولًا لِيَهْلِكَ مَنْ هَلَكَ عَنْ بَيِّنَةٍ وَيَحْيَا مَنْ حَيَّ عَنْ بَيِّنَةٍ وَإِنَّ اللَّهَ لَسَمِيعٌ عَلِيمٌ (42)(याद करो) उस समय (को) जब तुम […]

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