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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 38-41, (कार्यक्रम 287)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 38 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لِلَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ يَنْتَهُوا يُغْفَرْ لَهُمْ مَا قَدْ سَلَفَ وَإِنْ يَعُودُوا فَقَدْ مَضَتْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ (38)(हे पैग़म्बर!) काफ़िरों से कह दीजिए कि यदि वे (बुरे कर्म) छोड़ दें तो उनके पिछले पापों को क्षमा कर दिया जाएगा और यदि वे […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 34-37, (कार्यक्रम 286)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 34 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا لَهُمْ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللَّهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُوا أَوْلِيَاءَهُ إِنْ أَوْلِيَاؤُهُ إِلَّا الْمُتَّقُونَ وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (34)और ईश्वर उन्हें क्यों दंडित न करे जबकि वे लोगों को मस्जिदुल हराम (में जाने) से रोकते हैं और वे […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 30-33, (कार्यक्रम 285)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 30 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ أَوْ يَقْتُلُوكَ أَوْ يُخْرِجُوكَ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللَّهُ وَاللَّهُ خَيْرُ الْمَاكِرِينَ (30)और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब काफ़िर आपको बंदी बनाने या आपकी हत्या करने या आपको मक्के से निकाल देने की युक्तियां […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 26-29, (कार्यक्रम 284)

    Rate this post आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 26 की तिलावत सुनते हैं।وَاذْكُرُوا إِذْ أَنْتُمْ قَلِيلٌ مُسْتَضْعَفُونَ فِي الْأَرْضِ تَخَافُونَ أَنْ يَتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَآَوَاكُمْ وَأَيَّدَكُمْ بِنَصْرِهِ وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (26)और याद करो उस समय को जब तुम (मक्के की) धरती में बड़ी कम संख्या में थे और तुमको कमज़ोर बना दिया […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 22-25, (कार्यक्रम 283)

    Rate this post आइये सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 22 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِنْدَ اللَّهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ (22)ईश्वर के निकट धरती पर चलने वाले सबसे बुरे (जीव) वे बहरे और गूंगे हैं जो चिंतन नहीं करते। (8:22)मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता जो उसे अन्य जीवों से भिन्न करती है, […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 15-21, (कार्यक्रम 282)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 15 और 16 की तिलावत सुनते हैं। يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِذَا لَقِيتُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا زَحْفًا فَلَا تُوَلُّوهُمُ الْأَدْبَارَ (15) وَمَنْ يُوَلِّهِمْ يَوْمَئِذٍ دُبُرَهُ إِلَّا مُتَحَرِّفًا لِقِتَالٍ أَوْ مُتَحَيِّزًا إِلَى فِئَةٍ فَقَدْ بَاءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ وَمَأْوَاهُ جَهَنَّمُ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ (16) हे ईमान वालों जब […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 10-14, (कार्यक्रम 281)

    Rate this post आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की दसवीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَمَا جَعَلَهُ اللَّهُ إِلَّا بُشْرَى وَلِتَطْمَئِنَّ بِهِ قُلُوبُكُمْ وَمَا النَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِنْدِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (10)और ईश्वर ने (बद्र के युद्ध में) फ़रिशतों द्वारा सहायता को केवल शुभ सूचना और तुम्हारे हृदयों को निश्चित करने के लिए भेजा था […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 5-9, (कार्यक्रम 280)

    Rate this post आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या पांच और छह की तिलावत सुनते हैं।كَمَا أَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقًا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ لَكَارِهُونَ (5) يُجَادِلُونَكَ فِي الْحَقِّ بَعْدَمَا تَبَيَّنَ كَأَنَّمَا يُسَاقُونَ إِلَى الْمَوْتِ وَهُمْ يَنْظُرُونَ (6)(बद्र के युद्ध में माल के बंटवारे पर कुछ मुसलमानों की अप्रसन्नता) उस समय की भांति […]

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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 1-4, (कार्यक्रम 279)

    Rate this post पिछले कार्यक्रम में हमने सूरए आराफ़ की आयतों की व्याख्या समाप्त की। आज के कार्यक्रम से हम क़ुरआने मजीद के आठवें सूरे, सूरए अन्फ़ाल की आयतों की व्याख्या आरंभ करेंगे। यह सूरा मदीने में पैग़म्बर के पास आया और इसमें पचहत्तर आयतें हैं। अन्फ़ाल का अर्थ होता है सार्वजनिक माल। तो आइये […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 203-206, (कार्यक्रम 278)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 203 की तिलावत सुनते हैंوَإِذَا لَمْ تَأْتِهِمْ بِآَيَةٍ قَالُوا لَوْلَا اجْتَبَيْتَهَا قُلْ إِنَّمَا أَتَّبِعُ مَا يُوحَى إِلَيَّ مِنْ رَبِّي هَذَا بَصَائِرُ مِنْ رَبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (203)और जब आप उनके लिए कोई आयत अर्थात निशानी नहीं लाते तो वे कहते हैं कि आप स्वयं क्यों […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 197-202, (कार्यक्रम 277)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 197 और 198 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ (197) وَإِنْ تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَى لَا يَسْمَعُوا وَتَرَاهُمْ يَنْظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ (198)और जिन्हें तुम ईश्वर के स्थान पर पुकारते हो वे न तो तुम्हारी सहायता कर सकते हैं […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 193-196, (कार्यक्रम 276)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 193 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَى لَا يَتَّبِعُوكُمْ سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنْتُمْ صَامِتُونَ (193)और यदि आप उन्हें मार्गदर्शन की ओर बुलाएं तो वे आप का अनुसरण नहीं करेंगे। आप के लिए एक समान है कि उन्हें निमंत्रण दें अथवा चुप रहें। (7:193)इससे पहले […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 188-192, (कार्यक्रम 275)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 188 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لَا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ وَلَوْ كُنْتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (188)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मुझे न तो अपने भले का अधिकार है और […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 184-187, (कार्यक्रम 274)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 184 की तिलावत सुनते हैं।أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا مَا بِصَاحِبِهِمْ مِنْ جِنَّةٍ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ مُبِينٌ (184)क्या मक्के के लोगों ने यह विचार नहीं किया कि उनके साथी अर्थात पैग़म्बर में किसी प्रकार का उन्माद नहीं है? वे तो केवल स्पष्ट रूप से ईश्वरीय दंड से डराने […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 179-183, (कार्यक्रम 273)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 179 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ ذَرَأْنَا لِجَهَنَّمَ كَثِيرًا مِنَ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ لَهُمْ قُلُوبٌ لَا يَفْقَهُونَ بِهَا وَلَهُمْ أَعْيُنٌ لَا يُبْصِرُونَ بِهَا وَلَهُمْ آَذَانٌ لَا يَسْمَعُونَ بِهَا أُولَئِكَ كَالْأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ أُولَئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ (179)और हमने जिन्नों और मनुष्यों की एक बड़ी संख्या को नरक के […]

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    सूरए आराफ़ आयतें 175-178 (कार्यक्रम 272)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 175 की तिलावत सुनते हैं।وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ الَّذِي آَتَيْنَاهُ آَيَاتِنَا فَانْسَلَخَ مِنْهَا فَأَتْبَعَهُ الشَّيْطَانُ فَكَانَ مِنَ الْغَاوِينَ (175)और (हे पैग़म्बर!) इन्हें उस व्यक्ति का हाल पढ़कर सुनाइए जिसे हमने अपनी (शक्ति की) निशानियां दी थीं परंतु उसने उन्हें छोड़ दिया तो शैतान ने उसे अपने पीछे […]

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    सूरए आराफ़ आयतें 170-174 (कार्यक्रम 271)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 170 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ يُمَسِّكُونَ بِالْكِتَابِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُصْلِحِينَ (170)और जो लोग आसमानी किताब से जुड़े रहते हैं (अर्थात उसके आदेशों का पालन करते हैं) और उन्होंने नमाज़ भी स्थापित की है तो निसंदेह हम भले कर्म वालों के प्रतिफल को […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 167-169, (कार्यक्रम 270)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 167 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكَ لَيَبْعَثَنَّ عَلَيْهِمْ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ يَسُومُهُمْ سُوءَ الْعَذَابِ إِنَّ رَبَّكَ لَسَرِيعُ الْعِقَابِ وَإِنَّهُ لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (167)और (याद करो) उस समय जब तुम्हारे पालनहार ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि वह प्रलय तक के लिए उस (अत्याचारी गुट) […]

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    सूरए आराफ़, आयतें 163-166, (कार्यक्रम 269)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 163 की तिलावत सुनते हैं।وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ لَا تَأْتِيهِمْ كَذَلِكَ نَبْلُوهُمْ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ (163)(हे पैग़म्बर!) यहूदियों से उस बस्ती के बारे में पूछिए जो समुद्र के किनारे स्थित […]

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    सूरए आराफ़ आयतें 160-162, (कार्यक्रम 268)

    Rate this post आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 160 की तिलावत सुनते हैं।وَقَطَّعْنَاهُمُ اثْنَتَيْ عَشْرَةَ أَسْبَاطًا أُمَمًا وَأَوْحَيْنَا إِلَى مُوسَى إِذِ اسْتَسْقَاهُ قَوْمُهُ أَنِ اضْرِبْ بِعَصَاكَ الْحَجَرَ فَانْبَجَسَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًا قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍ مَشْرَبَهُمْ وَظَلَّلْنَا عَلَيْهِمُ الْغَمَامَ وَأَنْزَلْنَا عَلَيْهِمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَى كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ […]

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