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    उस लिबास के पहनने का बयान जो औरतों और काफ़िरों के लिये मख़सूस है

    Rate this post मर्दों के लिये औरतों का मख़सूस लिबास जैसे मक़ना, महरम (अंगिया) बुरक़ा वग़ैरह पहनना हराम है इसी तरह औरतों के लिये मर्दों का मख़सूस लिबास पहनना हराम है जैसे टोपी, अम्मामा, क़बा वग़ैरह और काफ़िरों का मख़सूस लिबास जैसे जुन्नार या अंग्रेज़ी टोपियाँ वग़ैरह मर्द औरत किसी के लिये जायज़ नही है। […]

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    छंटवा हिस्सा – नमाज़ के आदाब

    Rate this post 108- नमाज़ और लिबास रिवायात मे मिलता है कि आइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम नमाज़ का लिबास अलग रखते थे। और अल्लाह की खिदमत मे शरफ़याब होने के लिए खास तौर पर ईद व जुमे की नमाज़ के वक़्त खास लिबास पहनते थे। बारिश के लिए पढ़ी जाने वाली नमाज़ (नमाज़े इस्तसक़ा) के लिए ताकीद […]

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    पाँचवा हिस्सा – नमाज़ के समाजी पहलू

    Rate this post 66-नमाज़ और शहादतैन हर नमाज़ की दूसरी रकत मे तशःहुद पढ़ा जाता है। जिसमे हम अल्लाह की वहदानियत (उसके एक होने) और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की रिसालत की गवाही देते हैं। हर रोज़ इंसान पर वाजिब है कि वह पाँच मर्तबा अल्लाह की तौहीद व हज़रत मुहम्मद […]

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    चौथा हिस्सा – नमाज़ के तरबीयती पहलू

    Rate this post 47-नमाज़ और तबीअत (प्रकृति) नमाज़ फ़क़त एक क़लबी (दिली) राबते का नाम नही है। बल्कि यह एक ऐसा अमल है जो लोगों के साथ मिल कर तबीअत(प्रकृति) से फ़ायदा हासिल करते हुए अंजाम दिया जाता है। जैसे नमाज़ के वक़्त को जानने के लिए आसमान की तरफ़ देखना चाहिए। क़िबले की सिम्त […]

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    तीसरा हिस्सा – नमाज़ के मानवी पहलु और मतालिब

    Rate this post 37- नमाज़ और सच्चाई अगर कोई इंसान किसी को पसंद करता है, तो उससे बात करना भी पसंद करता है। बस वह लोग जो अल्लाह से दोस्ती का दावा तो करते हैं, मगर नमाज़ मे दिल चस्पी नही रखते वह अपने दावे मे सच्चे नहीँ हैं। नमाज़ उन बातों के आज़माने का […]

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    दूसरा हिस्सा- नमाज़ का फ़लसफ़ा

    Rate this post 26 नमाज़ अल्लाह की याद है। अल्लाह ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रमाया कि मेरी याद के लिए नमाज़ क़ाइम करो। एक मख़सूस तरीक़े से अल्लाह की याद जिसमे इंसान के बदन के सर से पैर तक के तमाम हिस्से शामिल होते हैं।वज़ू के वक़्त सर का भी मसाह करते हैं और […]

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    पहला हिस्सा-नमाज़ की अहमियत

    Rate this post 1-नमाज़ सभी उम्मतों मे मौजूद थी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स. अ.) से पहले हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की शरीअत मे भी नमाज़ मौजूद थी। क़ुरआन मे इस बात का ज़िक्र सूरए मरियम की 31 वी आयत मे मौजूद है कि हज़रत ईसा (अ.स.) ने कहा कि अल्लाह ने मुझे नमाज़ के लिए वसीयत […]

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    ज़ुबैर और ज़ुल्फ़ा

    Rate this post कितना अच्छा होता अगर तुम शादी कर लेते और अपना घर बसा लेते इस तरह तन्हाई की ज़िन्दगी से निजात मिल जाती और तुम्हारी शादी की ख़्वाहिश भी पूरी हो जाती और वही औरत दुनिया और आख़िरत के कामों में तुम्हारी मददगार साबित होती। या रसूल अल्लाह (स.) न मेरे पास माल […]

  • (2) जिमाअ-
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    (2) जिमाअ-

    (2) जिमाअ-5 (100%) 1 vote[s] जिमाअ रोज़े को बातिल कर देता है चाहे अज़वे तनासुल(लिंग) सुपारी तक ही दाखिल हो और मनी(वीर्य) भी ख़ारिज न होई हो। (1594) अगर आला-ए-तनासुल(लिंग) सुपारी से कम दाखिल हो और मनी भी खारिज न हो तो रोज़ा बातिल नही होता लेकिन जिस शख़्स कि सुपारी कटी हुई हो अगर […]

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